ग्रेटर नोएडा: भारत की पहली पैरालंपिक रजत पदक विजेता महिला खिलाड़ी दीपा मलिक का जीवन साहस, संघर्ष और आत्मविश्वास की ऐसी मिसाल है, जो लाखों लोगों को प्रेरित करती है. एक समय ऐसा था जब उनकी छाती के नीचे का पूरा हिस्सा काम करना बंद कर चुका था और डॉक्टरों ने उन्हें व्हीलचेयर पर जीवन बिताने की बात कही थी. लेकिन दीपा ने अपनी परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया. उन्होंने हर चुनौती का सामना किया और खेल जगत में ऐसा इतिहास रच दिया, जिस पर पूरे देश को गर्व है.
ग्रेटर नोएडा वेस्ट स्थित गौड़ इंटरनेशनल स्कूल में महिला सशक्तिकरण थीम शक्ति सेलिब्रेटिंग एम्पावरमेंट और ‘मैं शक्ति हूं, कर सकती हूं’ पर आधारित वार्षिक उत्सव 8.0 का आयोजन किया गया, जिसमें पैरालंपिक दीपा मलिक बतौर मुख्य अतिथि के तौर पर पहुंची. इस दौरान उन्होंने local 18 से बताया कि वह बचपन से ही खेलों में रुचि रखती थीं. स्कूल के दिनों में वह विभिन्न खेल गतिविधियों में हिस्सा लेती थीं, लेकिन उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन खेल ही उनकी पहचान बनेंगे.
रीढ़ की हड्डी में ट्यूमर की समस्या
उन्होंने बताया कि 19 वर्ष की उम्र में उनकी शादी हो गई और उनका जीवन सामान्य रूप से आगे बढ़ रहा था. इसी दौरान दूसरे बच्चे के जन्म के बाद उन्हें कमर में लगातार दर्द और पैरों में अकड़न की समस्या होने लगी. शुरुआती जांच के बाद पता चला कि उनकी रीढ़ की हड्डी में ट्यूमर है, जिसका इलाज जटिल और लंबा था.
नए सिरे से की शुरुआत
दीपा ने आगे बताया कि इलाज के दौरान दीपा को कई सर्जरी से गुजरना पड़ा. उनकी तीन बड़ी सर्जरी हुई और कमर से नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया. इस वजह से उन्हें व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ा. यह किसी भी व्यक्ति के लिए बेहद कठिन स्थिति हो सकती थी, लेकिन दीपा ने हार नहीं मानी. उन्होंने अपनी जिंदगी को नए सिरे से जीने का फैसला किया और सकारात्मक सोच को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया.
उन्होंने कहा कि उन्होंने निराशा के बजाय सकारात्मकता को चुना. उनका मानना है कि जीवन में आने वाली कठिनाइयां हमें कमजोर नहीं, बल्कि और मजबूत बनाती हैं. परिवार के सहयोग और अपने दृढ़ संकल्प के बल पर उन्होंने खुद को संभाला और नई राह तलाशनी शुरू की.
एथलेटिक्स में लगातार मिली सफलताएं
उन्होंने देश की सबसे कठिन कार रैलियों में हिस्सा लेकर यह साबित किया कि दृढ़ इअपच्छाशक्ति के सामने कोई चुनौती बड़ी नहीं होती. शून्य से नीचे तापमान और दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर उन्होंने हजारों किलोमीटर की यात्रा पूरी कर लोगों को हैरान कर दिया.
उन्होंने बताया कि उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि वर्ष 2016 के रियो पैरालंपिक में आई, जब उन्होंने शॉट पुट स्पर्धा में रजत पदक जीतकर इतिहास रच दिया. वह पैरालंपिक में पदक जीतने वाली भारत की पहली महिला खिलाड़ी बनीं. इस उपलब्धि ने न केवल उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज किया, बल्कि देश की लाखों बेटियों को भी बड़े सपने देखने का साहस दिया.
अब लोगों को कर रही प्रेरित
उन्होंने बताया कि वह आज भी लोगों को प्रेरित करने का काम कर रही हैं. वह सामाजिक कार्यों, लेखन और जागरूकता अभियानों से जुड़ी हुई हैं. उन्होंने लड़कियों को सन्देश दिया कि कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि इंसान में आत्मविश्वास, मेहनत और सकारात्मक सोच है तो वह हर बाधा को पार कर सकता है.






