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Para Powerlifter Jhandu Kumar: गरीबी, पोलियो और कोविड की दुश्वारियों को मात देकर नालंदा के झंडू कुमार ने संघर्ष की नई मिसाल कायम की है. कभी परिवार चलाने के लिए सब्जी बेचने और ई-रिक्शा चलाने वाले झंडू ने अपने पावरलिफ्टिंग के सपने को जिंदा रखने के लिए ई-रिक्शा तक बेच दिया. कोच राजिंदर सिंह रहेलू के मार्गदर्शन में गांधीनगर साई केंद्र पहुंचे झंडू ने 72kg वर्ग में 206kg लिफ्ट कर राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया. बैंकॉक में कांस्य पदक जीतकर कॉमनवेल्थ गेम्स तक पहुंचे झंडू की यह कहानी अटूट आत्मविश्वास और फौलादी इरादों का प्रतीक है.
झंडू कुमार से कॉमनवेल्थ गेम्स में मेडल की उम्मीद है.
नई दिल्ली. यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है, जहां संघर्ष की हर एक पराकाष्ठा पर एक इंसान की बेजोड़ इच्छाशक्ति भारी पड़ती है. बिहार के एक छोटे से गांव से निकलकर इंटरनेशनल स्टेज पर देश का नाम रोशन करने वाले झंडू कुमार की जीवन यात्रा जुनून, त्याग और अटूट आत्मविश्वास की एक मिसाल है. बिहार के नालंदा जिले के हरनौत बाजार के रहने वाले 29 वर्षीय झंडू कुमार का जीवन कभी आसान नहीं रहा. महज पांच साल की उम्र में वे पोलियो की चपेट में आ गए थे. इस शारीरिक बाधा और पारिवारिक आर्थिक तंगहाली के बावजूद, उन्होंने कभी अपने सपनों से समझौता नहीं किया. वे बचपन से ही पावरलिफ्टिंग के प्रति जुनूनी थे और पैरा तथा सक्षम दोनों तरह की प्रतियोगिताओं में राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके थे.
झंडू कुमार (Jhandu Kumar) के परिवार का गुजारा हरनौत बाजार में सब्ज़ी की दुकान से चलता था. उनका दिन सुबह-सवेरे ही शुरू हो जाता था. झंडू बताते हैं, हर दिन मैं लगभग 20 किलोमीटर दूर बिहार शरीफ जाता था ताकि ताजी सब्ज़ियां खरीद सकूं. फिर उन्हें बाजार लाकर बेचता था. शाम करीब 4 बजे काम खत्म करने के बाद ही मैं जिम में ट्रेनिंग के लिए जा पाता था.’ वे ‘रॉकस्टार जिम’ में अपने कोच गौतम सिंह के मार्गदर्शन में कड़ी मेहनत करते थे. लेकिन एक एथलीट के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है सही पोषण. झंडू की दैनिक कमाई लगभग 400 से 500 ही हो पाती थी, जबकि एक एथलीट के प्रोटीन सप्लीमेंट्स का ख़र्च ही करीब 1,000 रोजाना आता था. आहार और प्रशिक्षण के बीच तालमेल बिठाना उनके लिए एक रोज की लड़ाई थी।
कोविड 19 का दौर और ई-रिक्शा का सहारा
साल 2021 में कोविड-19 महामारी के दौरान झंडू पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. हरनौत बाजार में एक ओवरब्रिज के निर्माण कार्य के चलते उनकी पारिवारिक सब्ज़ी की दुकान को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा. परिवार को आर्थिक तंगी से उबारने के लिए झंडू ने ई-रिक्शा चलाना शुरू कर दिया. ई-रिक्शा चलाने से घर का ख़र्च तो चलने लगा, लेकिन सड़कों पर घंटों बिताने के कारण वे शारीरिक रूप से इस कदर थक जाते थे कि अभ्यास के लिए समय और ऊर्जा ही नहीं बचती थी. यह दौर उनके खेल करियर के लिए एक बहुत बड़ा झटका साबित हो रहा था.
ई-रिक्शा बेचना और करारा झटका
जब स्थिति थोड़ी सामान्य हुई और परिवार की सब्ज़ी की दुकान दोबारा शुरू हो सकी, तो झंडू ने अपने खेल के सपने को जिंदा रखने के लिए एक बड़ा साहसिक कदम उठाया. उन्होंने 2023 में अपना ई-रिक्शा बेच दिया ताकि वे नई दिल्ली में आयोजित होने वाली राष्ट्रीय पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में हिस्सा लेने की फीस और यात्रा का खर्च उठा सकें. यह उनके जीवन का सबसे बड़ा दांव था. शुरुआत में ऐसा लगा जैसे यह फैसला उन पर भारी पड़ गया. नई दिल्ली में प्रतियोगिता के दौरान वे एक भी सफल लिफ्ट दर्ज नहीं कर सके. हार और निराशा का साया गहराने लगा था, लेकिन उनकी इस असफलता के पीछे छिपे समर्पण और जिद ने एक पारखी नजर को आकर्षित कर लिया.
मोड़ और स्वर्णिम सफलता का सफर
प्रतियोगिता स्थल पर मौजूद पैरा पावरलिफ्टिंग कोच राजिंदर सिंह रहेलू ने झंडू के भीतर के जज्बे को पहचाना. उन्होंने झंडू को गांधीनगर स्थित स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) के ‘नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ में प्रशिक्षण के लिए आमंत्रित किया. यह आमंत्रण उनके जीवन का सबसे बड़ा ‘ब्रेकथ्रू’ साबित हुआ. उचित मार्गदर्शन और विश्वस्तरीय सुविधाओं के मिलते ही झंडू की किस्मत बदल गई. उसी वर्ष नई दिल्ली में आयोजित पहले खेलो इंडिया पैरा गेम्स में उन्होंने रजत पदक (Silver Medal) हासिल किया. उन्होंने 72 किग्रा वर्ग में 206 किग्रा की लिफ्ट के साथ एक नया नेशनल रिकॉर्ड अपने नाम किया. बैंकॉक में आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में उन्होंने 191 किग्रा का भार उठाकर कांस्य पदक (Bronze Medal) जीता और सीधे कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए क्वालिफ़ाई कर लिया.
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कमलेश राय वर्तमान में News18 इंडिया में बतौर चीफ सब-एडिटर कार्यरत हैं. 17 वर्षों से अधिक के अपने सुदीर्घ पत्रकारीय सफर में उन्होंने डिजिटल मीडिया की बारीकियों और खबरों की गहरी समझ के साथ एक विशिष्ट पहचान बनाई ह…
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