नई दिल्ली: सिंगर मुकेश ने 1968 की फिल्म ‘साथी’ के लिए एक गाना रिकॉर्ड किया था, जो असल में एक खूबसूरत गजल थी. इसे मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा था और नौशाद ने इसका संगीत तैयार किया था. नौशाद साहब जब फिल्म के संगीत पर काम कर रहे थे, तब उन्होंने इसके साथ सात और गाने भी रिकॉर्ड किए थे. मगर आखिर में सात गानों को तो रखा गया, मगर आखिरी गाने को निकाल दिया गया. दरअसल, फिल्म में गाने को ऐसी सिचुएशन में फिल्माना था, जब नायक अंधा हो जाता है, लेकिन किसी वजह से डायरेक्टर-प्रोड्यूसर गाने को फिल्म में लेने के पक्ष में नहीं हुए. जबकि इसे नौशाद ने बड़ी खूबसूरती से कंपोज किया था. गाने में मजरूह सुल्तानपुरी के शब्द भी गहरे और जानदार थे. वह गाना है- ‘आंखें खुली थीं आए थे वो भी’. इसे राजेंद्र कुमार पर फिल्माया गया था.
गाने के साथ बच्चे का बना खास कनेक्शन
किस्सा यह है कि गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी के एक परिचित थे, जिन्हें सब अहमद साहब कहते थे. नौशाद और बेटे भी उन्हें बड़े अच्छे से जानते थे. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अहमद साहब, नौशाद जी के घर जाते थे और उनके बेटों के साथ मिलकर उनके नए-पुराने गाने सुनते थे. अहमद साहब के साथ उनका दो साल का बच्चा भी रहता था जो बीमार था. वो बच्चा न ठीक से सुन पाता था, न बोल पाता था. उसका किसी चीज पर प्रतिक्रिया देना भी बड़ा दूभर था.
मुकेश के गाने पर जब बच्चे देने थे रिएक्शन
अहमद साहब अपने उस बच्चे और नौशाद के बेटों के साथ नए-पुराने गाने सुनते थे, तब उस गाने के आने पर बच्चा झूमने लगता था. सबको हैरानी होती थी कि जो बच्चा किसी चीज पर प्रतिक्रिया नहीं दे रहा, वह अचानक मुकेश के इस गाने पर रिएक्शन दे रहा है. जब भी वो गाना बजता, बच्चा झूमकर अपनी प्रतिक्रिया देता. दुर्भाग्यवश, बच्चा एक दिन कोमा में चला गया. उसे अस्पताल में भर्ती कराया जाता है. बच्चे के 15 दिन कोमा में गुजारने के बाद डॉक्टर भी हाथ खड़े कर देते हैं.
15 दिन तक कोमा में रहा बच्चा
अहमद साहब से डॉक्टर कहते हैं कि आप अपने बच्चे को घर ले जाएं, हम जितनी कोशिश कर सकते थे, वो हमने की. डॉक्टरों ने उस बच्चे के बचने की उम्मीद छोड़ दी थी. बच्चे को घर लाए, तो अहमद साहब के दिमाग में सूझी कि क्यों न मुकेश का वह गाना बजाया जाए, जिसे सुनकर बच्चा झूमने लगता था. वह बच्चा जो 15 दिन से कोमा में था, उसने गाना सुनने के बाद न सिर्फ आंखें खोलीं, बल्कि मुस्कुराता भी रहा.
गाना खत्म होने के बाद थम गईं सांसें
मुकेश का गाया वो गाना जब तक बजता रहा, तब तक बच्चा होश में रहा. मगर गाने के खत्म होते ही बच्चे ने भी हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद ली. मजरूह सुल्तानपुरी को जब इस वाकये के बारे में पता चला, तो वह नौशाद के पास पहुंचे. उन्होंने कहा कि यह आपके संगीत का असर था, जो बच्चा होश में आ गया. इस पर नौशाद ने कहा कि ऐसा नहीं है. आपके शब्दों, संगीत, मुकेश की आवाज ने मिलकर ऐसी फ्रीक्वेंसी पैदा की, जिससे बच्चे के दिमाग पर असर पड़ा और वह कुछ क्षण के लिए जाग गया.

