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Mirra Andreeva clinches maiden French Open title: रूस की 19 वर्षीय सनसनी मिरा एंड्रीवा ने माजा च्वालिंस्का को सीधे सेटों में 6-3, 6-2 से हराकर फ्रेंच ओपन का महिला एकल खिताब जीत लिया. यह एंड्रीवा का पहला ग्रैंड स्लैम है. इस ऐतिहासिक जीत के साथ ही आठवीं रैंक वाली एंड्रीवा 1992 में मोनिका सेलेस (18 वर्ष) के बाद रोलां गैरो जीतने वाली सबसे कम उम्र की खिलाड़ी बन गई हैं. दो साल पहले सेमीफाइनल तक पहुंचने वाली एंड्रीवा ने अपनी परिपक्वता और दमदार बेसलाइन खेल के दम पर यह खिताबी सफर तय किया.
19 की उम्र में रूसी टेनिस खिलाड़ी ने जीता महिला फ्रेंच ओपन खिताब.
नई दिल्ली. टेनिस की दुनिया को एक नया चैंपियन मिल गया है. रूस की 19 वर्षीय सनसनी मिरा एंड्रीवा ने शनिवार को इतिहास रचते हुए पोलैंड की माजा च्वालिंस्का को सीधे सेटों में हराकर फ्रेंच ओपन का महिला एकल खिताब अपने नाम कर लिया. यह एंड्रीवा के करियर का पहला ग्रैंड स्लैम खिताब है. इस खिताबी जीत के साथ ही एंड्रीवा ने टेनिस जगत में अपनी बादशाहत का बिगुल फूंक दिया है. लगभग डेढ़ घंटे तक चले इस एकतरफा फाइनल मुकाबले में आठवीं वरीयता प्राप्त एंड्रीवा ने अपनी प्रतिद्वंद्वी च्वालिंस्का को 6-3, 6-2 से शिकस्त दी. पूरे मैच के दौरान रूसी खिलाड़ी ने अपनी ताकतवर बेसलाइन हिटिंग और आक्रामक खेल से विरोधी खिलाड़ी को वापसी का कोई मौका नहीं दिया.
सिर्फ 19 साल की उम्र में फ्रेंच ओपन की चमचमाती ट्रॉफी उठाने वाली मिरा एंड्रीवा पिछले तीन दशकों से भी अधिक समय में पेरिस में खिताब जीतने वाली सबसे कम उम्र की खिलाड़ी बन गई हैं. उनसे पहले साल 1992 में महान टेनिस खिलाड़ी मोनिका सेलेस ने महज 18 वर्ष की उम्र में अपना लगातार तीसरा फ्रेंच ओपन खिताब जीता था. इतने सालों बाद एंड्रीवा ने इस कारनामे को दोहराकर यह साबित कर दिया है कि वे महिला टेनिस का भविष्य हैं.
19 की उम्र में रूसी टेनिस खिलाड़ी ने जीता महिला फ्रेंच ओपन खिताब.
दूसरी ओर, क्वालीफायर के रूप में टूर्नामेंट में जगह बनाकर फाइनल तक का सफर तय करने वाली माजा च्वालिंस्का के पास भी इतिहास रचने का मौका था. वे रोलां गैरो के इतिहास में खिताब जीतने वाली पहली क्वालीफायर बनने की कोशिश में थीं, लेकिन फाइनल में एंड्रीवा के प्रचंड फॉर्म के सामने उनका यह सपना टूट गया. हालांकि, उपविजेता रहने के बावजूद च्वालिंस्का ने इस टूर्नामेंट में अपने प्रदर्शन से सबका दिल जीत लिया.
पूरे टूर्नामेंट में रहा एंड्रीवा का ‘बुलडोजर’ अवतार
शनिवार को हुए इस खिताबी मुकाबले में एंड्रीवा को जीत का सबसे बड़ा दावेदार माना जा रहा था. उन्होंने पूरे टूर्नामेंट में जिस तरह का खेल दिखाया, उसे ‘बुलडोजर’ प्रदर्शन कहा जाए तो गलत नहीं होगा. फाइनल से पहले अपने आखिरी तीन मैचों में एंड्रीवा ने सिर्फ 12 गेम गंवाए थे. उनके कोर्ट पर उतरते ही साफ दिख रहा था कि वे एक भावी ग्रैंड स्लैम चैंपियन की तरह खेल रही हैं.
फाइनल मैच में भी कहानी कुछ अलग नहीं थी. च्वालिंस्का ने शुरुआत में टक्कर देने की कोशिश की, लेकिन एंड्रीवा के बेसलाइन शॉट्स की रफ्तार और रैलियों को अपने नियंत्रण में रखने की क्षमता के सामने वे बेबस नजर आईं. एंड्रीवा ने मैच पर अपनी पकड़ इतनी मजबूत रखी कि च्वालिंस्का को दबाव से उबरने का कोई रास्ता नहीं मिला.
दो साल की तपस्या और परिपक्वता का फल
मिरा एंड्रीवा दो साल पहले भी सुर्खियों में आई थीं, जब उन्होंने महज 17 साल की उम्र में रोलां गैरो के सेमीफाइनल में जगह बनाई थी. उस समय दुनिया ने उनकी प्रतिभा को पहचाना था, लेकिन वे खिताब तक नहीं पहुंच सकी थीं. दो साल बाद, उसी लाल मिट्टी (क्ले कोर्ट) पर उन्होंने अपनी अधूरी कहानी को पूरा किया. अपनी इस ऐतिहासिक जीत के बाद एंड्रीवा ने माना कि पिछले दो वर्षों में उनके खेल और मानसिक दृष्टिकोण में काफी बदलाव आया है.
दबाव को बनाया अपनी ताकत
जैसे-जैसे कोई खिलाड़ी तेजी से सफलता की सीढ़ियां चढ़ता है, उम्मीदों का बोझ भी बढ़ता जाता है. एंड्रीवा के साथ भी ऐसा ही था. लेकिन इस रूसी खिलाड़ी की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने इन उम्मीदों और दबाव को खुद पर हावी नहीं होने दिया. टूर्नामेंट के दौरान वे लगातार शांत और आत्मविश्वास से भरी दिखीं. उनकी इस खिताबी जीत ने यह साफ कर दिया है कि वे न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को टक्कर देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं. मिरा एंड्रीवा का यह पहला ग्रैंड स्लैम खिताब है, लेकिन उनके खेल के स्तर को देखकर टेनिस विशेषज्ञों का मानना है कि यह तो बस एक महान करियर की शुरुआत है.
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कमलेश राय वर्तमान में News18 इंडिया में बतौर चीफ सब-एडिटर कार्यरत हैं. 17 वर्षों से अधिक के अपने सुदीर्घ पत्रकारीय सफर में उन्होंने डिजिटल मीडिया की बारीकियों और खबरों की गहरी समझ के साथ एक विशिष्ट पहचान बनाई ह…और पढ़ें






