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मुख्यालय. मोबाइल की बढ़ती लत बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास के लिए खतरा: डॉ. जितेश गुप्ता

JK Gupta by JK Gupta
May 24, 2026
in सोनभद्र
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संवाददाता@विशाल टंडन…..


आधुनिक तकनीक के इस दौर में मोबाइल फोन बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। पढ़ाई, मनोरंजन, ऑनलाइन क्लास, गेम और सोशल मीडिया के कारण बच्चे पहले की तुलना में अधिक समय मोबाइल पर बिताने लगे हैं। हालांकि तकनीक ने शिक्षा और जानकारी के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोली हैं, लेकिन मोबाइल का अत्यधिक उपयोग अब बच्चों के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास पर गंभीर असर डाल रहा है। इस विषय पर जिला अस्पताल के मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. जितेश गुप्ता ने विस्तार से अपनी राय साझा करते हुए अभिभावकों और विद्यालयों को सतर्क रहने की सलाह दी है।

डॉ. जितेश गुप्ता ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में बच्चों में मोबाइल की लत तेजी से बढ़ी है। छोटे बच्चे भी घंटों मोबाइल पर गेम खेलने, वीडियो देखने और सोशल मीडिया इस्तेमाल करने में समय बिता रहे हैं। इसका सीधा असर उनके व्यवहार, स्वास्थ्य और पढ़ाई पर दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि लगातार मोबाइल स्क्रीन देखने से बच्चों में आंखों की कमजोरी, सिरदर्द, गर्दन और पीठ दर्द जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।

देर रात तक मोबाइल चलाने के कारण नींद पूरी नहीं हो पाती, जिससे बच्चे मानसिक रूप से थकान और तनाव महसूस करने लगते हैं। उन्होंने बताया कि मोबाइल की लत बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डाल रही है। कई बच्चे मोबाइल न मिलने पर चिड़चिड़े और गुस्सैल हो जाते हैं। धीरे-धीरे उनका ध्यान पढ़ाई और अन्य जरूरी गतिविधियों से हटने लगता है। बच्चों में एकाग्रता की कमी, याददाश्त कमजोर होना और पढ़ाई में रुचि कम होना जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। कुछ बच्चे परिवार और दोस्तों से दूरी बनाकर अकेले रहना पसंद करने लगते हैं, जो भविष्य में गंभीर मानसिक समस्याओं का कारण बन सकता है।

डॉ. गुप्ता ने कहा कि मोबाइल का अत्यधिक उपयोग बच्चों की सामाजिक जिंदगी को भी प्रभावित कर रहा है। पहले बच्चे मैदानों में खेलते थे, दोस्तों के साथ समय बिताते थे और परिवार के साथ बातचीत करते थे, लेकिन अब अधिकांश समय मोबाइल स्क्रीन पर बीत रहा है। इससे बच्चों में सामाजिक व्यवहार और संवाद क्षमता कमजोर हो रही है। उन्होंने कहा कि वास्तविक जीवन के अनुभवों की कमी बच्चों के व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करती है।

उन्होंने यह भी बताया कि कई बच्चे मोबाइल गेम और सोशल मीडिया के इतने आदी हो जाते हैं कि उनका आत्मविश्वास और भावनात्मक संतुलन प्रभावित होने लगता है। सोशल मीडिया पर लगातार दूसरों की जिंदगी देखकर बच्चे खुद की तुलना करने लगते हैं, जिससे तनाव और मानसिक दबाव बढ़ सकता है। कई बार बच्चे हिंसक गेम और गलत इंटरनेट सामग्री के संपर्क में आकर आक्रामक व्यवहार भी अपनाने लगते हैं।

डॉ. गुप्ता ने कहा कि इस समस्या के समाधान के लिए परिवार और विद्यालय दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। अभिभावकों को बच्चों के साथ समय बिताना चाहिए और उन्हें मोबाइल से हटाकर रचनात्मक गतिविधियों की ओर प्रेरित करना चाहिए। बच्चों को खेलकूद, पुस्तक पढ़ने, चित्रकला, संगीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना जरूरी है। इससे बच्चों का मानसिक विकास बेहतर होगा और उनका ध्यान मोबाइल से हटेगा।

उन्होंने सुझाव दिया कि माता-पिता बच्चों के लिए मोबाइल उपयोग का समय तय करें और स्वयं भी बच्चों के सामने मोबाइल का अत्यधिक उपयोग करने से बचें। परिवार में एक ऐसा माहौल बनाया जाए, जहां बच्चे खुलकर बातचीत कर सकें। बच्चों को मोबाइल के फायदे और नुकसान दोनों के बारे में सरल भाषा में समझाया जाना चाहिए। उन्हें बताया जाए कि मोबाइल नई जानकारी और पढ़ाई का अच्छा माध्यम है, लेकिन उसका संतुलित उपयोग ही सुरक्षित है।

विद्यालयों की भूमिका पर जोर देते हुए डॉ. गुप्ता ने कहा कि स्कूलों में डिजिटल जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। शिक्षकों को बच्चों को इंटरनेट और सोशल मीडिया के सुरक्षित उपयोग के बारे में जानकारी देनी चाहिए। समय-समय पर समूह चर्चा, कार्यशाला और परामर्श सत्र आयोजित कर बच्चों को तकनीक के सही उपयोग के लिए प्रेरित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यदि बच्चा मोबाइल न मिलने पर अत्यधिक गुस्सा करे, पढ़ाई से दूरी बनाने लगे, नींद कम हो जाए, सामाजिक गतिविधियों से अलग रहने लगे या अकेले रहना पसंद करने लगे, तो इसे सामान्य बात समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

ऐसे संकेत मोबाइल की गंभीर लत की ओर इशारा कर सकते हैं। इस स्थिति में अभिभावकों को विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए, ताकि समय रहते बच्चे को सही दिशा दी जा सके। अंत में डॉ. जितेश गुप्ता ने कहा कि तकनीक से पूरी तरह दूरी बनाना संभव नहीं है, लेकिन उसका संतुलित और सही उपयोग बेहद जरूरी है। परिवार, विद्यालय और समाज यदि मिलकर बच्चों को सही दिशा दें, तो मोबाइल का उपयोग उनके विकास के लिए लाभकारी साबित हो सकता है, अन्यथा इसकी लत आने वाली पीढ़ी के भविष्य के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।

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