नई दिल्ली. 14 अक्टूबर 2002… जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर एक जोरदार धमाका हुआ. कुछ ही सेकंड में एक जवान का पैर उसके शरीर से अलग हो चुका था. किसी के लिए भी यह जिंदगी का अंत साबित हो सकता था, लेकिन होकातो सेमा ने इसे नई शुरुआत बना दिया. उस दिन किसी ने, शायद खुद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि यही सैनिक एक दिन पैरालंपिक में भारत के लिए मेजल जीतेगा और दुनिया की नंबर-1 रैंकिंग हासिल कर इतिहास भी रचेगा. जिसने कभी हाथ में बंदूक लेकर देश की सरहद की रक्षा की, आज वही होकातो सेमा पुरुषों की F57 शॉटपुट स्पर्धा में दुनिया के नंबर-1 खिलाड़ी हैं. 2024 पेरिस पैरालंपिक में उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल जीता. वह पहले पैरालंपियन बने, जिन्हें भारतीय सेना में उत्कृष्ट सेवा के लिए अति विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया. एक इंटरव्यू में होकातो ने सूबेदार से लेकर वर्ल्ड नंबर-1 पैरा शॉट पुट एथलीट बनने तक की अपनी साहस भरी कहानी के बारे में बताया. चलिए जानते हैं.
‘बॉर्डर’ फिल्म देखकर सेना में जाने का सपना
नागालैंड के रहने वाले होकातो सेमा बचपन से ही सेना की वर्दी के दीवाने थे. फिल्म ‘बॉर्डर’ ने उनके मन में देश सेवा की ऐसी लौ जलाई कि उन्होंने तय कर लिया कि जिंदगी सेना को ही समर्पित करेंगे. फिर कारगिल युद्ध हुआ और उनका यह इरादा और मजबूत हो गया. साल 2000 में उन्होंने भारतीय सेना की असम रेजिमेंट जॉइन कर ली. पहली पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर में मिली, लेकिन किस्मत ने उनके लिए कुछ और ही लिख रखा था.
वो धमाका जिसने सब कुछ बदल दिया
14 अक्टूबर 2002. एलओसी पर ऑपरेशन के दौरान अचानक बारूदी सुरंग में विस्फोट हुआ. धमाका इतना भीषण था कि उनका एक पैर हमेशा के लिए चला गया. उन्हें गंभीर हालत में श्रीनगर के सैन्य अस्पताल ले जाया गया, जहां आपातकालीन सर्जरी हुई. इसके बाद पुणे के आर्टिफिशियल लिम्ब सेंटर में इलाज शुरू हुआ. डॉक्टरों को आर्टिफिसियल पैर लगाना पड़ा, लेकिन असली चुनौती तो अब शुरू हुई थी.
जो हर कोई बचपन में सीख लेता है, होकातो को दोबारा सीखना पड़ा
Rediff से बातचीत में होकातो ने बताया, ‘शुरुआत में ऐसा लगता था जैसे शरीर चलना ही भूल गया हो. हर कदम दर्द देता था, घाव सूज जाते थे और कई बार मन भी टूट जाता था. लेकिन अस्पताल में दूसरे घायल सैनिकों को संघर्ष करते देखकर उन्हें हिम्मत मिलती रही. करीब डेढ़ महीने बाद उन्होंने फिर से अपने पैरों पर खड़ा होना सीख लिया.
हथियार छूटा, लेकिन वर्दी नहीं
चोट इतनी गंभीर थी कि अब वह हथियार लेकर ऑपरेशन में हिस्सा नहीं ले सकते थे. सेना चाहती तो उनकी सेवा यहीं खत्म हो सकती थी, लेकिन भारतीय सेना ने उन्हें नई जिम्मेदारी दी. वह प्रशासनिक कार्यों में लौटे और पश्चिम बंगाल व शिलॉन्ग में कई वर्षों तक सेवा करते रहे. वर्दी उनके शरीर पर पहले की तरह थी, लेकिन दिल के किसी कोने में खिलाड़ी बनने का सपना अब भी जिंदा था.
14 साल बाद जिंदगी ने दिया नया मौका
2016 में होकातो नया आर्टिफिशियल पैर बनवाने पुणे के उसी आर्टिफिशियल लिम्ब सेंटर पहुंचे, जहां कभी उन्होंने चलना सीखा था. यहीं इंतजार के दौरान उन्होंने एक दोस्त के साथ टेबल टेनिस खेलना शुरू किया. उनकी फिटनेस देखकर अस्पताल के अधिकारियों ने सलाह दी कि वह पैरा स्पोर्ट्स में हाथ आजमाएं. उनकी मुलाकात सेना के पैरा एथलीट कार्यक्रम से जुड़े अधिकारियों से हुई. उन्होंने होकातो को शॉटपुट आजमाने की सलाह दी. बस, यहीं से जिंदगी ने नया मोड़ ले लिया.
पहली ही टूर्नामेंट और जीत लिया गोल्ड
होकातो ने कुछ ही महीनों की ट्रेनिंग के बाद 2017 के राष्ट्रीय पैरा खेलों में हिस्सा लिया. उनके सामने एशियन गेम्स के मेडल विजेता खिलाड़ी थे, लेकिन अनुभव की कमी उनके आत्मविश्वास पर भारी नहीं पड़ी. पहली ही प्रतियोगिता में उन्होंने गोल्ड जीत लिया. इसके बाद चीन में पहला इंटरनेशनल टूर्नामेंट खेला और वहां भी ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम कर लिया. इसके बाद तो जैसे मेडल्स का सिलसिला शुरू हो गया. चीन, मोरक्को, जापान, फ्रांस और दुनिया के कई देशों में उन्होंने भारत का तिरंगा लहराया. 2022 पैरा एशियन गेम्स में ब्रॉन्ज, 2024 पेरिस पैरालंपिक में ब्रॉन्ज और अब विश्व रैंकिंग में नंबर-1. आज उनके नाम 25 से ज्यादा इंटरनेशनल मेडल हैं.
सेना को देते हैं अपनी सफलता का पूरा श्रेय
होकातो सेमा मानते हैं कि अगर भारतीय सेना उनका साथ नहीं देती तो शायद वह यहां तक कभी नहीं पहुंच पाते. उन्होंने बताया, ‘सेना ने उन्हें विश्वस्तरीय ट्रेनिंग, महंगे उपकरण और हर जरूरी सुविधा उपलब्ध कराई. परिवार ने भी हर कदम पर उनका साथ दिया. यही वजह है कि वह पूरी तरह अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर सके. उनकी पत्नी और तीनों बच्चे हमेशा उनके सबसे बड़े हौसला बने रहे.’
अब नजर अगले गोल्ड पर
पेरिस पैरालंपिक में ब्रॉन्ज जीतने के बाद अब उनका अगला लक्ष्य पैरा एशियन गेम्स का गोल्ड है. दुनिया के नंबर-1 पैरा शॉट पुट एथलीट बनने के बावजूद उनके भीतर वही सैनिक आज भी जिंदा है, जो कभी देश की सीमाओं की रक्षा करता था. फर्क सिर्फ इतना है कि पहले वह दुश्मनों से लड़ते थे, आज अपनी सीमाओं से लड़ते हैं. होकातो सेमा की कहानी मेडल या रैंकिंग से कहीं बड़ी है. यह उस जिंदादिल इंसान की कहानी है जिसने अपना पैर खो दिया, लेकिन अपने इरादों को कभी टूटने नहीं दिया. उन्होंने दिखाया कि जिंदगी कभी भी किसी हादसे से खत्म नहीं होती. कई बार वही हादसा इंसान को वहां पहुंचा देता है, जहां तक पहुंचने का सपना उसने खुद भी नहीं देखा होता. शायद इसलिए राष्ट्रपति भवन में जब उनका सम्मान हुआ तो तालियां किसी पद के लिए नहीं, बल्कि उस अदम्य हौसले के लिए बजीं, जो उनकी सबसे बड़ी ताकत बना.






