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Arundhati Choudhary: अरुंधति चौधरी ने महिलाओं की 70 किग्रा कैटेगरी के फाइनल में इंग्लैंड की चैंटेल रीड को हराकर गोल्ड मेडल जीत लिया है. 23 साल की अरुधंती ने कॉमनवेल्थ गेम्स में अपना पहला मेडल जीता है. अरंधति राजस्थान के कोटा की रहने वाली हैं.
अरुंधति चौधरी ने कॉमनवेल्थ गेम्स में जीता सोना.
नई दिल्ली. ग्लासगो में चल रहे राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय मुक्केबाजों का धमाकेदार प्रदर्शन जारी है. इस शानदार अभियान में एक और स्वर्णिम अध्याय जोड़ते हुए भारत की युवा मुक्केबाज अरुंधति चौधरी ने महिलाओं की 70 किलोग्राम भारवर्ग स्पर्धा में स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया है. अरुंधति की इस ऐतिहासिक जीत के साथ ही प्रतियोगिता की पदक तालिका में भारत की स्थिति और मजबूत हो गई है. भारत कुल 34 पदकों के साथ अब चौथे स्थान पर पहुंच गया है, जिसमें 11 स्वर्ण, 15 रजत और 8 कांस्य पदक शामिल हैं.
रिंग में उतरीं अरुंधति चौधरी (Arundhati Choudhary) ने शुरुआत से ही आक्रामक और सटीक खेल दिखाया. फाइनल मुकाबले में उनका सामना इंग्लैंड की मजबूत दावेदार चैंटल रीड से था. हालांकि, अरुंधति के बेहतरीन फुटवर्क, जबरदस्त पंच और अचूक रणनीति के आगे विरोधी मुक्केबाज पूरी तरह पस्त नजर आईं. तीसरे दौर को 5-0 से अपने नाम करते हुए अरुंधति ने सर्वसम्मति से यह मुकाबला जीता और भारत की झोली में एक और चमकदार सोना डाल दिया.
अरुंधति चौधरी ने कॉमनवेल्थ गेम्स में जीता सोना.
शाम के सत्र में भारत का जलवा कायम रहा, जहां तीन मुकाबलों में से तीनों में भारतीय खिलाड़ियों ने बाजी मारी. इस सत्र में मुक्केबाजी प्रतियोगिता के पहले छह फाइनल मुकाबलों में से भारत ने पांच स्वर्ण और एक रजत पदक जीतकर रिंग में अपना एकाधिकार स्थापित कर दिया है.
बास्केटबॉल से मुक्केबाजी के रिंग तक का सफर
अरुंधति की इस सफलता के पीछे उनकी कड़ी मेहनत, लगन और सही मार्गदर्शन की एक दिलचस्प कहानी है. उनके पिता सुरेश का कहना है कि अरुंधति बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में बेहद होशियार थीं और खेलकूद में उनकी गहरी रुचि थी. ‘जब अरुंधति कोटा के स्प्रिंग डेल स्कूल में छठी कक्षा में पढ़ती थी, तब वह स्कूल की बास्केटबॉल टीम की कप्तान थी. उसकी कप्तानी में स्कूल टीम ने जिला और राज्य स्तरीय स्कूली खेलों में बेहतरीन प्रदर्शन किया और कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया.’
हालांकि, बास्केटबॉल जैसे टीम गेम में सफलता हासिल करने के बाद अरुंधति के मन में कुछ अलग करने की चाह जगी. उन्होंने एक दिन अपने पिता से व्यक्तिगत खेल चुनने की इच्छा जताई. पिता की सलाह पर उन्होंने मुक्केबाजी को अपने करियर के रूप में चुना.
चुनौतियों को पार कर हासिल की सफलता
जब अरुंधति ने बॉक्सिंग चुनने का फैसला किया, तब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती उनके अपने शहर की परिस्थितियां थीं. उन्होंने अपने पिता से साफ कहा, ‘पापा, मुझे बस बॉक्सिंग का एक अच्छा कोच ला दो.’ उस समय राजस्थान के कोटा शहर में मुक्केबाजी का कोई खास माहौल नहीं था और न ही कोई स्थापित कोचिंग की सुविधा उपलब्ध थी. लेकिन अरुंधति के मजबूत इरादों और उनके परिवार के अटूट समर्थन ने इस कमी को आड़े नहीं आने दिया. शुरुआती बाधाओं को पार करते हुए अरुंधति ने दिन-रात पसीना बहाया और अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का नाम रोशन किया.
आज ग्लासगो के मुक्केबाजी रिंग में अरुंधति चौधरी का लहराता तिरंगा इस बात का प्रमाण है कि अगर इरादे बुलंद हों, तो शून्य से शुरू करके भी विश्व पटल पर इतिहास रचा जा सकता है.
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कमलेश राय वर्तमान में News18 इंडिया में बतौर चीफ सब-एडिटर कार्यरत हैं. 17 वर्षों से अधिक के अपने सुदीर्घ पत्रकारीय सफर में उन्होंने डिजिटल मीडिया की बारीकियों और खबरों की गहरी समझ के साथ एक विशिष्ट पहचान बनाई ह…
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