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कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 भारत के लिए सिर्फ मेडल्स का टूर्नामेंट नहीं, बल्कि संघर्ष, जज्बे और जीत की अनगिनत कहानियों का मंच भी बना. जिन 8 खिलाड़ियों ने अब तक देश के लिए गोल्ड मेडल जीते, उनमें से कई का सफर कठिनाइयों से भरा रहा. बावजूद इसके उन्होंने हार नहीं मानी और कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे बड़े मंच पर देश की शान बढ़ाई. किसी ने आर्थिक तंगी झेली तो किसी ने सेना में ड्यूटी के दौरान अपना पैर खोने के बाद इतिहास रचा. आइए जानते हैं भारत के इन आठ गोल्ड मेडलिस्ट खिलाड़ियों के बारे में.
सबसे पहला गोल्ड मेडल मीराबाई चानू ने दिलाया. चानू ने वेटलिफ्टिंग के महिला 48 किग्रा वर्ग में शुरुआत से ही अपना दबदबा बनाए रखा. स्नैच और क्लीन एंड जर्क दोनों में कुल मिलाकर 190 किलो वजन उठाकर उन्होंने भारत का गोल्ड का खाता खोला. मणिपुर के एक साधारण परिवार से आने वाली मीराबाई बचपन में घर के लिए जंगल से लकड़ियां ढोती थीं. आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को नहीं छोड़ा. रियो ओलंपिक की निराशा के बाद टोक्यो ओलंपिक में सिल्वर जीतकर उन्होंने शानदार वापसी की. कई चोटों से उबरने के बाद भी उन्होंने खुद को फिट रखा और अब एक बार फिर कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतकर अपनी काबिलियत साबित की.
दूसरा गोल्ड मेडल आया महिला शॉट पुट F57 स्पर्धा में, जहां शर्मिला धनकर ने अपने सर्वश्रेष्ठ थ्रो के दम पर मेडल पक्का किया. पूरे मुकाबले में उन्होंने बढ़त बनाए रखी और भारत को पैरा एथलेटिक्स में पहला गोल्ड दिलाया. शर्मिला ने 9.81 मीटर के सीजन बेस्ट थ्रो के साथ मेडल जीता. शारीरिक चुनौती के बावजूद शर्मिला ने कभी हार नहीं मानी. उन्होंने लगातार अभ्यास और आत्मविश्वास के दम पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई. उनका सफर उन खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा है, जो मुश्किल हालात के बावजूद बड़े सपने देखते हैं.
पुरुष 100 मीटर T47 स्पर्धा में दिलीप गावित ने शानदार दौड़ लगते हुए भारत के लिए गोल्ड मेडल सुनिश्चित किया. उन्होंने 10.71 सेकंड्स के गेम्स रिकॉर्ड समय के साथ यह मेडल अपने नाम किया. महाराष्ट्र के रहने वाले दिलीप ने शारीरिक चुनौती को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया. सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने लगातार मेहनत की और आज भारत के सबसे सफल पैरा धावकों में गिने जाते हैं.
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अस्मिता डे ने जूडो में महिला 48 किग्रा वर्ग के फाइनल में शानदार तकनीक का प्रदर्शन करते हुए गोल्ड पर कब्जा जमाया. वह कॉमनवेल्थ गेम्स में जूडो में गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली भारतीय भी बनीं. पश्चिम बंगाल की अस्मिता ने कम उम्र में जूडो शुरू किया. सीमित सुविधाओं और कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच उन्होंने लगातार मेहनत की. कई राष्ट्रीय खिताब जीतने के बाद उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में भी भारत का नाम रोशन किया.
जूडो में पुरुष 60 किग्रा वर्ग में हर्ष सिंह ने शानदार रणनीति और बेहतरीन तकनीक के दम पर फाइनल जीता. वह जूडो में कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतने वाले पहले भारतीय पुरुष बने. हर्ष ने अपने करियर में कई बार चोटों का सामना किया, लेकिन कभी हार नहीं मानी. लगातार मेहनत और अनुशासन ने उन्हें भारत का कॉमनवेल्थ चैंपियन बना दिया.
प्रीति पवार ने कनाडा की स्कारलेट सवाना डेलगाडो को हराकर बॉक्सिंग में महिला 54 किग्रा वर्ग का गोल्ड जीता. उन्होंने पहले दो राउंड में शानदार बढ़त बनाई और तीसरे राउंड में संयम दिखाते हुए मुकाबला जीत लिया. तीनों ही राउंड में उनका दबदबा देखने को मिला. यह कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का पहला बॉक्सिंग गोल्ड था. महाराष्ट्र की रहने वाली 22 वर्षीय प्रीति ने कम उम्र से ही बॉक्सिंग में अपना भविष्य देखा. कठिन ट्रेनिंग, अनुशासित दिनचर्या और लगातार मेहनत के दम पर उन्होंने जूनियर स्तर से सीनियर टीम तक का सफर तय किया. आज वह भारतीय महिला बॉक्सिंग की नई स्टार बन चुकी हैं.
जैस्मिन लंबोरिया ने नॉर्दर्न आयरलैंड की माइकेला वॉल्श को हराकर बॉक्सिंग में महिला 57 किग्रा वर्ग का गोल्ड जीता. उन्होंने पहले दो राउंड में बढ़त बनाने के बाद आखिरी राउंड में भी शानदार डिफेंस से जीत सुनिश्चित की. हरियाणा के भिवानी की रहने वाली जैसिमीन ऐसे इलाके से आती हैं, जिसे भारत की बॉक्सिंग की नर्सरी कहा जाता है. कड़ी प्रतिस्पर्धा और कई उतार-चढ़ाव के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी. उनकी मेहनत ने उन्हें कॉमनवेल्थ चैंपियन बना दिया.
सोमन राणा ने 13.40 मीटर का सर्वश्रेष्ठ थ्रो करते हुए पुरुष शॉट पुट F57 स्पर्धा में गोल्ड अपने नाम किया. भारत के शुभम जुयाल ने इसी स्पर्धा में सिल्वर जीतकर देश को डबल पोडियम दिलाया. 43 वर्षीय सोमन राणा कभी राष्ट्रीय स्तर के बॉक्सर थे और भारतीय सेना में सूबेदार के पद पर तैनात थे. 2006 में जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन के दौरान लैंडमाइन विस्फोट में उन्होंने अपना दाहिना पैर गंवा दिया. बॉक्सिंग करियर खत्म हो गया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. करीब 10 साल बाद पैरा शॉट पुट से नई शुरुआत की. दो पैरालंपिक खेले, विश्व चैंपियनशिप में मेडल जीता और अब कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतकर करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा बन गए.






