नई दिल्ली. जूडो के मैट पर जब दो योद्धा उतरते हैं, तो जीत और हार के बीच का फासला सिर्फ एक क्षण के फैसले और कुछ इंच के दांव का होता है. ऐसा ही एक सांसे रोक देने वाला मुकाबला देखने को मिला, जहां भारत की उभरती जूडो स्टार यामिनी मौर्य कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में स्वर्ण पदक के बेहद करीब पहुंचकर चूक गईं. महिलाओं के 57 किग्रा से कम भार वर्ग के फाइनल मुकाबले में इंग्लैंड की अनुभवी खिलाड़ी एसिल्या टॉपराक के खिलाफ यामिनी ने जो जुझारूपन दिखाया, उसने भले ही उन्हें रजत पदक तक सीमित रखा हो, लेकिन उन्होंने दुनिया भर के खेल प्रेमियों का दिल जीत लिया.
फाइनल मुकाबला शुरुआत से ही बेहद आक्रामक और बराबरी का रहा. एक तरफ बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेल 2022 की रजत पदक विजेता 28 वर्षीय अनुभवी टॉपराक थीं, तो दूसरी तरफ अपने अटूट हौसले के दम पर मैट पर उतरीं भारतीय खिलाड़ी यामिनी. मैच के शुरुआती मिनटों से ही दोनों खिलाड़ियों के बीच एक-एक अंक के लिए कड़ा संघर्ष देखने को मिला. टॉपराक ने यामिनी को जमीन पर गिराकर अंक हासिल करने (पिन डाउन) की कई कोशिशें कीं, लेकिन यामिनी ने अपनी शानदार रक्षात्मक तकनीक का परिचय देते हुए हर हमले को नाकाम कर दिया. हालांकि, टॉपराक के लगातार तेज हमलों के कारण यामिनी पर दबाव बढ़ा और इस बीच रेफरी ने यामिनी को एक पेनल्टी भी दे दी.
यामिनी मौर्य ने 9 साल की उम्र से जूडो में कदम रखा था
निर्धारित समय तक जब कोई भी खिलाड़ी अंक हासिल नहीं कर सकी, तो मुकाबला ‘गोल्डन स्कोर’ (अतिरिक्त समय) में चला गया. अतिरिक्त समय में लगभग तीन मिनट तक चले इस कड़े मुकाबले में टॉपराक ने अपने हमलों की धार कम नहीं होने दी. इस लगातार दबाव के चलते यामिनी से एक छोटी सी चूक हुई और टॉपराक ने ‘इप्पोन’ (जूडो में पूर्ण अंक/निर्णायक जीत) हासिल कर स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया. यामिनी को रजत पदक से संतोष करना पड़ा, लेकिन उनका खेल किसी स्वर्ण से कम नहीं था.
तानों से ताली तक: समाज के विरोध से शुरू हुआ सफर
मध्य प्रदेश के सागर जिले की रहने वाली यामिनी मौर्य का आज का यह सफर रातों-रात तय नहीं हुआ है. जब महज 9 साल की उम्र में इस छोटी सी बच्ची ने जूडो जैसे कठिन और आक्रामक खेल में कदम रखा था, तो राहें आसान नहीं थीं. उस दौर में परिवार, रिश्तेदारों और समाज के कई लोगों को एक लड़की का जूडो खेलना रास नहीं आया. कई तरह के ताने दिए गए और तरह-तरह की बातें बनाई गईं.
लेकिन यामिनी ने किसी की बातों का जवाब जुबान से देने के बजाय अपनी मेहनत से देने का फैसला किया. जूडो सीखने के कुछ ही महीनों के भीतर उन्होंने स्टेट चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर उन सभी आलोचकों के मुंह बंद कर दिए. इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. आज उनके खाते में 35 से भी ज्यादा नेशनल और इंटरनेशनल गोल्ड मेडल दर्ज हैं.
सर्जरी, दर्द और वापसी की बेमिसाल कहानियां
यामिनी की सफलता की कहानी सिर्फ जीतों की नहीं, बल्कि मुश्किलों से बाउंस बैक करने की है. साल 2017 में एक मुकाबले के दौरान उनका घुटना बुरी तरह टूट गया था. बड़ा ऑपरेशन हुआ और डॉक्टरों ने लंबे समय तक आराम की सलाह दी. करीब एक साल तक वे खेल से दूर रहीं. किसी भी एथलीट के लिए ऐसे गंभीर ब्रेक के बाद मानसिक और शारीरिक रूप से वापसी करना सबसे कठिन होता है. लेकिन यामिनी ने अपनी ट्रेनिंग दोबारा शुरू की और मैट पर लौटते ही फिर से गोल्ड मेडल जीता.
किस्मत ने उनकी परीक्षा यही खत्म नहीं की. कुछ महीनों पहले उनके दूसरे घुटने में भी चोट आई और सर्जरी करानी पड़ी. लेकिन सागर की इस बेटी का हौसला घुटनों के दर्द से कहीं ज्यादा मजबूत था. केवल तीन महीने के रेस्ट के बाद वे फिर से प्रैक्टिस में जुट गईं और नेशनल चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर यह साबित कर दिया कि असली चैंपियन कभी हार नहीं मानेंगे.
लगातार सफलताएं और अब ओलंपिक का सपना
दो बार की सीनियर राष्ट्रीय चैंपियन यामिनी 2022 से लगातार भारतीय सीनियर टीम का प्रतिनिधित्व कर रही हैं. उन्होंने 2022 के राष्ट्रीय खेलों के अलावा 2025 हांगकांग एशियाई ओपन और 2026 डकार अफ्रीका ओपन में देश को स्वर्ण पदक दिलाए हैं. पिछले 17 सालों से मध्य प्रदेश का नाम रोशन कर रही यामिनी को राज्य के प्रतिष्ठित ‘एकलव्य’ और ‘विक्रम’ अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है.
गोल्डन स्कोर में मिली यह हार यामिनी के लिए अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है. इस रजत पदक ने उनके इरादों को और मजबूत कर दिया है. अब इस फौलादी खिलाड़ी की नजरें एशियाई खेलों और ओलंपिक के मंच पर तिरंगा लहराने और देश के लिए गोल्ड मेडल जीतने पर टिकी हैं.






