कोटा. राजस्थान के कोटा की रहने वाली दिव्यांशी आज देश का एक चमकता हुआ नाम बन चुकी हैं. लगातार 12 नेशनल गोल्ड मेडल जीतने वाली और इंटरनेशनल स्तर पर ब्रॉन्ज व सिल्वर मेडल अपने नाम करने वाली दिव्यांशी का चयन अब एशियन गेम्स के लिए हो चुका है. लेकिन सफलता के इस मुकाम तक पहुंचने की उनकी कहानी जितनी प्रेरणादायक है, उतनी ही संघर्ष और त्याग से भरी हुई है.
दिव्यांशी के इस सफर की शुरुआत साल 2017 में हुई थी. उनकी मां पुलिस विभाग में कार्यरत हैं. अक्सर 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर उनकी वीआईपी ड्यूटी स्टेडियम में लगती थी. ऐसे में वह दिव्यांशी को भी अपने साथ ले जाती थीं. वहां वुशु कोच अशोक सर के मार्गदर्शन में कई बच्चे अभ्यास कर रहे थे. बच्चों को मार्शल आर्ट्स करते देख उनकी मां के मन में उत्सुकता जगी और उन्होंने कोच से पूछा कि क्या उनके बच्चे भी यह खेल सीख सकते हैं. सकारात्मक जवाब मिलने के बाद दिव्यांशी और उनके भाई ने भी इसकी शुरुआत कर दी. यहीं से उनके वुशु करियर की नींव पड़ी.
पिता ने करियर के लिए छोड़ दी नौकरी
इस पूरे सफर में दिव्यांशी के माता-पिता उनके सबसे बड़े सहारा बने. उनकी मां पुलिस विभाग में हैं, जबकि उनके पिता पूर्व सैनिक हैं. सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद उनका दूसरी नौकरी में चयन भी हो गया था, लेकिन उन्होंने वह नौकरी सिर्फ इसलिए नहीं की ताकि अपने बच्चों के खेल और करियर पर पूरा ध्यान दे सकें. उनका मानना है कि यदि उनके बच्चे जीवन में सफल हो जाते हैं, तो वही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी.
10 दिन में 14 किलो वजन घटाया
दिव्यांशी के खेल जीवन की सबसे कठिन परीक्षा तब आई, जब वे एशियन गेम्स के ट्रायल्स की तैयारी कर रही थीं. प्रतियोगिता की कैटेगरी के अनुसार उन्हें अपना वजन नियंत्रित करना था. उन्होंने महज 10 दिनों में कड़ी मेहनत के दम पर अपना वजन 74 किलोग्राम से घटाकर 60 किलोग्राम कर लिया. अचानक वजन कम होने से शरीर में आई कमजोरी के कारण वह पहला ट्रायल हार गईं. इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. दूसरे ट्रायल में दूसरा स्थान हासिल किया और आखिरकार फाइनल ट्रायल में पहला स्थान प्राप्त कर एशियन गेम्स के लिए भारतीय टीम में अपनी जगह पक्की कर ली.
लड़कियों को दिया आत्मरक्षा का संदेश
सीकर जिले के अपने पैतृक गांव के समाज से भी दिव्यांशी को हमेशा भरपूर प्यार और प्रोत्साहन मिला. लोगों ने कभी उनका मनोबल नहीं तोड़ा. मजाक और अपनत्व के साथ अक्सर यही कहते थे कि बच्ची को मार-धाड़ वाले खेल में डाल दिया है, अब ऐसे ही मुक्के-घूंसे चलाकर सबको हराकर आना. आज दिव्यांशी देश की सभी लड़कियों को संदेश देती हैं कि वर्तमान समय में हर लड़की को अपनी सुरक्षा के लिए आत्मरक्षा का कोई न कोई खेल जरूर सीखना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर वह खुद की रक्षा कर सके. फिलहाल उनका पूरा ध्यान आगामी एशियन गेम्स पर है. इसके लिए वे अगले दो महीने तक कड़ा अभ्यास करेंगी और भारत के लिए गोल्ड मेडल जीतकर अपने माता-पिता और कोच का नाम रोशन करना चाहती हैं.
दिव्यांशी की उपलब्धियां
साल 2018 में फगवाड़ा, पंजाब में आयोजित नेशनल प्रतियोगिता में पहला गोल्ड मेडल जीता.
साल 2019 में कोलकाता में आयोजित नेशनल टूर्नामेंट में लगातार दूसरा गोल्ड मेडल अपने नाम किया.
साल 2020 में रांची, झारखंड में आयोजित नेशनल प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर गोल्ड की हैट्रिक पूरी की.
साल 2021 में केरल में आयोजित जूनियर नेशनल प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल हासिल किया.
साल 2022 में तमिलनाडु में आयोजित नेशनल टूर्नामेंट में फिर गोल्ड मेडल जीता. इसी वर्ष पहली बार वर्ल्ड चैंपियनशिप में भी हिस्सा लिया.
साल 2024 में केरल और तमिलनाडु में आयोजित नेशनल प्रतियोगिताओं में एक बार फिर गोल्ड मेडल जीता. इसी वर्ष वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारत के लिए ब्रॉन्ज मेडल भी हासिल किया.
स्कूल गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SGFI) के तहत मणिपुर और रांची में आयोजित दोनों नेशनल प्रतियोगिताओं में गोल्ड मेडल जीते. वहीं मणिपुर के इम्फाल में आयोजित बॉक्सिंग नेशनल में सिल्वर मेडल अपने नाम किया.
साल 2025 की सीनियर कैटेगरी में सीनियर नेशनल और फेडरेशन कप सीनियर नेशनल, दोनों प्रतियोगिताओं में गोल्ड मेडल जीते.
शंघाई सहयोग संगठन (SCO) द्वारा हर चार साल में आयोजित होने वाले टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन करते हुए सिल्वर मेडल हासिल किया.
वर्तमान में दिव्यांशी का चयन भारतीय टीम में एशियन गेम्स के लिए हो चुका है.






