नई दिल्ली. भारतीय मेंस हॉकी टीम ने एफआईएच हॉकी विश्व कप 2026 के अपने पहले मुकाबले में वेल्स के खिलाफ मैदान पर उतरते ही इतिहास रच दिया. भारत विश्व कप के इतिहास में लगातार और सभी 16 एडिशन में हिस्सा लेने वाली दुनिया की पहली टीम बन गया है. वैसे तो जर्मनी, नीदरलैंड्स और स्पेन भी पिछले सभी 15 संस्करणों का हिस्सा रहे हैं और इस बार भी टूर्नामेंट का हिस्सा हैं, लेकिन भारत का मुकाबला समय-सारणी के अनुसार उनसे पहले आयोजित हुआ. इस तरह मैदान पर पहला कदम रखते ही भारत ने आधिकारिक तौर पर यह ऐतिहासिक कीर्तिमान अपने नाम दर्ज कर लिया. बेल्जियम के वावरे और नीदरलैंड्स के अमस्टेलवीन में संयुक्त रूप से आयोजित हो रहे इस महाकुंभ में भारत का यह मुकाम हर भारतीय प्रशंसक के लिए गर्व का क्षण है.
भारतीय हॉकी का विश्व कप सफर साल 1971 में स्पेन के बार्सिलोना से शुरू हुआ था. अपने पहले ही विश्व कप में भारत ने शानदार प्रदर्शन करते हुए तीसरा स्थान हासिल किया और कांस्य पदक पर कब्जा जमाया. इसके दो साल बाद, 1973 में नीदरलैंड्स के अमस्टेलवीन में ही आयोजित दूसरे विश्व कप में भारतीय टीम खिताबी मुकाबले तक पहुंची, हालांकि उसे उपविजेता (दूसरे स्थान) से संतोष करना पड़ा. यह वह दौर था जब भारतीय हॉकी अपनी पुरानी चमक को विश्व कप के मंच पर स्थापित करने की जद्दोजहद में थी, और वह पल 1975 में आया.
भारतीय हॉकी टीम ने विश्व कप में रचा इतिहास.
जब रचा गया स्वर्णिम इतिहास
मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर के ऐतिहासिक स्टेडियम मर्डेका में 1975 का खिताबी मुकाबला भारतीय हॉकी के स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है. इस महामुकाबले में भारत के सामने उसका पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान था. मैच की शुरुआत भारत के लिए अच्छी नहीं रही और टीम ने पहला गोल खाकर पिछड़ना स्वीकार किया. लेकिन हाफ टाइम के बाद भारतीय खिलाड़ियों ने जिस जीवटता और आक्रामकता का परिचय दिया, उसने मैच का पासा पलट दिया. दूसरे हाफ में दो बेहतरीन गोल दागकर भारत ने पाकिस्तान को 2-1 से शिकस्त दी और पहली बार विश्व कप की ट्रॉफी उठाकर इतिहास रच दिया. 1975 की वह जीत आज भी भारतीय हॉकी विश्व कप इतिहास की एकमात्र खिताबी सफलता बनी हुई है.
उतार-चढ़ाव भरा दौर और विश्व कप की दूरियां
1975 की खिताबी जीत के बाद के दशकों में भारतीय हॉकी को विश्व कप में कई उतार-चढ़ाव देखने पड़े. अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स में आयोजित 1978 के विश्व कप में भारत छठे स्थान पर रहा. इसके बाद 1982 में जब मुंबई (तब बॉम्बे) ने पहली बार विश्व कप की मेजबानी की, तो घरेलू परिस्थितियों में भारत पांचवें स्थान पर रहा.
1986 का लंदन विश्व कप भारतीय टीम के लिए काफी निराशाजनक साबित हुआ, जहाँ टीम 12वें स्थान पर खिसक गई. इसके बाद 1990 के लाहौर विश्व कप में भारतीय टीम 10वें स्थान पर रही. 1994 में सिडनी की धरती पर भारत ने सुधार करते हुए 5वां स्थान हासिल किया, लेकिन 1998 में नीदरलैंड्स के उट्रेच में टीम 9वें स्थान पर रही.
21वीं सदी की शुरुआत भी चुनौतीपूर्ण रही. 2002 में कुआलालंपुर में भारत 10वें और 2006 में जर्मनी के मोएनचेनग्लैडबैक में 11वें स्थान पर रहा. 2010 में नई दिल्ली ने विश्व कप की मेजबानी की, जहाँ भारत 8वें स्थान पर रहा. इसके बाद 2014 में नीदरलैंड्स के द हेग में 9वां स्थान, 2018 में भुवनेश्वर में छठा स्थान और 2023 में ओडिशा (भुवनेश्वर-राउरकेला) में आयोजित पिछले विश्व कप में भारत को 9वें स्थान से संतोष करना पड़ा था.
कप्तान हरमनप्रीत और टीम का संतुलन
इतिहास के इन पन्नों को पीछे छोड़ते हुए, वर्तमान भारतीय टीम 2026 के इस संस्करण में एक नए जुनून के साथ उतरी है. स्टार ड्रैग-फ्लिकर और रक्षापंक्ति के धुरंधर हरमनप्रीत सिंह टीम की कमान संभाल रहे हैं. टीम में अनुभव और युवा ऊर्जा का बेहतरीन मिश्रण देखने को मिल रहा है. पूर्व कप्तान मनप्रीत सिंह, अनुभवी अमित रोहिदास और मिडफील्ड के रणनीतिकार विवेक सागर प्रसाद जैसे खिलाड़ी टीम की मुख्य रीढ़ हैं.
गोलकीपिंग का जिम्मा मोहित एचएस और सूरज करकेरा के मजबूत हाथों में है. रक्षापंक्ति में कप्तान हरमनप्रीत के साथ जर्मनप्रीत सिंह, अमित रोहिदास, जुगराज सिंह, संजय, सुमित और यशदीप सिवाच विपक्षी फॉरवर्ड्स को रोकने के लिए तैयार हैं. मिडफील्ड को संभालने की जिम्मेदारी राजिंदर सिंह, आदित्य अर्जुन लालागे, हार्दिक सिंह, मनप्रीत सिंह, नीलकंठ शर्मा और विवेक सागर प्रसाद के कंधों पर है. वहीं, गोल करने का मुख्य दारोमदार दिलप्रीत सिंह, शिलानंद लाकड़ा, सुखजीत सिंह, मनदीप सिंह और अभिषेक जैसे आक्रामक फॉरवर्ड्स पर है.
कठिन मुकाबले और पुरानी प्रतिद्वंद्विता
पूल डी में वेल्स के खिलाफ इस ऐतिहासिक शुरुआत के बाद भारत की राह आसान नहीं होने वाली है. टीम को अपना दूसरा मुकाबला सोमवार, 17 अगस्त को इंग्लैंड के खिलाफ खेलना है, जो हमेशा से एक कड़ा प्रतिद्वंद्वी रहा है. इसके बाद बुधवार, 19 अगस्त को पूरे खेल जगत की निगाहें अमस्टेलवीन पर होंगी, जब भारत का सामना अपने चिर-प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान से होगा. 1975 के फाइनल की यादें ताजा करने वाले इस मुकाबले पर न केवल दोनों देशों बल्कि दुनिया भर के हॉकी प्रेमियों की नजरें टिकी होंगी. सोलहवीं बार विश्व कप के मंच पर कदम रखकर भारत ने निरंतरता की जो मिसाल कायम की है, अब पूरी देशवासी उम्मीद कर रहे हैं कि हरमनप्रीत की यह सेना 51 साल के खिताबी सूखे को खत्म कर इतिहास को एक बार फिर से दोहराए.





