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Gomti River Flood: सुल्तानपुर में लगातार बारिश और गोमती नदी का जलस्तर बढ़ने से सीताकुंड परिसर का कुछ हिस्सा जलमग्न हो गया है. इससे स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ गई है. इतिहास में 1977, 1983 और 1995 में भी भीषण बाढ़ आ चुकी है, जिसको स्थानीय आज भी याद करते हैं. 1995 के बाढ़ से शहर का पहिया पूरी तरह ठप्प हो गया है. इससे पहले 1864 में भी सुल्तानपुर क्षेत्र में बाढ़ का उल्लेख मिलता है. यानी गोमती की बाढ़ का इतिहास काफी पुराना है और इसका असर समय-समय पर लोगों के जीवन पर पड़ता रहा है.
सुल्तानपुरः लगातार बारिश और गोमती नदी के बढ़ते जलस्तर का असर अब सीताकुंड पर भी दिखाई देने लगा है. नदी का पानी बढ़ने से सीताकुंड परिसर का कुछ हिस्सा जलमग्न हो गया है, जिससे लोगों की चिंता बढ़ गई है. गोमती का बढ़ता जलस्तर सुल्तानपुर के लिए कोई नई बात नहीं है. इतिहास के पन्नों में शहर में कई बार भीषण बाढ़ आने का उल्लेख मिलता है, जब नदी का पानी रिहायशी इलाकों और आसपास के क्षेत्रों तक पहुंच गया था. ऐसे में मौजूदा हालात के बीच यह जानना भी दिलचस्प है कि सुल्तानपुर में पहले कब-कब बाढ़ ने तबाही मचाई और उसका क्या असर रहा.
गोमती के बढ़ते जलस्तर से डूबा सीताकुंड
सुल्तानपुर के वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह लोकल 18 से बताते हैं कि सुल्तानपुर में लगातार बारिश और गोमती नदी के बढ़ते जलस्तर का असर अब सीताकुंड पर भी दिखाई देने लगा है. नदी का पानी बढ़ने से सीताकुंड परिसर का कुछ हिस्सा जलमग्न हो गया है. इससे आसपास के लोगों की चिंता बढ़ गई है. गोमती नदी का बढ़ता जलस्तर सुल्तानपुर के लिए कोई नई बात नहीं है. इतिहास के पन्नों में शहर और आसपास के इलाकों में कई बार बाढ़ आने का उल्लेख मिलता है. कई बार हालात इतने गंभीर हुए कि नदी का पानी रिहायशी इलाकों और गांवों तक पहुंच गया.
जब बाढ़ से उजड़ गए थे कई गांव
सुल्तानपुर में बाढ़ आने की प्रमुख वजहों में लगातार और अत्यधिक बारिश के साथ गोमती नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ना रहा है. बारिश के दिनों में नदी का पानी बढ़ने के बाद निचले इलाकों में जलभराव की स्थिति पैदा हो जाती थी. कई मौकों पर बाढ़ ने लोगों की मुश्किलें इतनी बढ़ा दीं कि उन्हें अपने घर और गांव तक छोड़ने पड़े. ग्रामीण इलाकों में फसलें बर्बाद होने के साथ पशुओं और लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा. बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी लंबे समय तक जनजीवन सामान्य नहीं हो पाता था.
1977, 1983 और 1995 में दिखा कहर
सुल्तानपुर के बाढ़ इतिहास में कई ऐसे साल दर्ज हैं, जब गोमती नदी ने अपना रौद्र रूप दिखाया. 1977, 1983 और 1995 जैसे साल बाढ़ की त्रासदी के लिए याद किए जाते हैं. इन वर्षों में भारी बारिश और नदी के बढ़ते जलस्तर के कारण कई क्षेत्रों में पानी पहुंच गया था. खेतों में खड़ी फसलें प्रभावित हुईं और ग्रामीण इलाकों में लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा. इससे पहले 1864 में भी सुल्तानपुर क्षेत्र में बाढ़ का उल्लेख मिलता है. यानी गोमती की बाढ़ का इतिहास काफी पुराना है और इसका असर समय-समय पर लोगों के जीवन पर पड़ता रहा है.
आज हालात बदले, लेकिन खतरा बरकरार
इस साल भले ही बारिश पहले के कई वर्षों की तुलना में कम हो रही हो, लेकिन गोमती नदी का जलस्तर बढ़ने से सीताकुंड का जलमग्न होना यह याद दिलाता है कि नदी का पानी बढ़ने पर खतरा आज भी बना रहता है. सुल्तानपुर के इतिहास में बाढ़ सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी और शहर के जनजीवन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अध्याय रही है. यही वजह है कि गोमती का जलस्तर बढ़ते ही प्रशासन और स्थानीय लोगों की निगाहें नदी पर टिक जाती हैं. सीताकुंड में बढ़ता पानी भी इसी पुराने इतिहास की याद दिला रहा है.
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Rajnish Kumar Yadav is a digital journalist and content publisher with over seven years of experience in print and digital media. He is currently working with News18 Digital (Local18) as a Content Publisher, wh…
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