हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि दूसरी शादी नहीं करने वाली तलाकशुदा महिला को भी पूर्व पति से भरण-पोषण पाने का अधिकार है। विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ें यह रिपोर्ट…
हिमाचल हाई कोर्ट ने तलाक के एक मामले में बेहद महत्वपूर्ण फैसला दिया है। अदालत ने कहा है कि तलाक के साथ रिश्ता खत्म हो सकता है, लेकिन पत्नी का गुजारा भत्ता पाने का अधिकार हर स्थिति में खत्म नहीं होता। तलाकशुदा महिला को भी अपने पूर्व पति से भरण-पोषण पाने का अधिकार है, अगर उसने दूसरी शादी नहीं की है। अदालत ने साफ किया कि केवल तलाक हो जाने से पति अपनी कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाता।
याचिका खारिज, क्या था निचली अदालत का आदेश?
जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने हमीरपुर की फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली सुरजीत की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। फैमिली कोर्ट ने सुरजीत को अपनी पूर्व पत्नी सावित्री देवी को 18 मई 2019 से हर महीने 4,000 रुपये भरण-पोषण देने का आदेश दिया था।
क्या था पूरा मामला?
मामले के अनुसार, सुरजीत और सावित्री देवी की शादी 21 दिसंबर 1997 को हुई थी। सावित्री देवी ने आरोप लगाया कि वैवाहिक जीवन में उन्हें प्रताड़ना और क्रूरता का सामना करना पड़ा। साल 2009 में उन्हें घर से निकाल दिया गया। इसके बाद उन्होंने फैमिली कोर्ट हमीरपुर में तलाक और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण के लिए याचिका दायर की।
पति ने दी थी फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती
फैमिली कोर्ट ने 22 नवंबर 2021 को क्रूरता के आधार पर सावित्री देवी को तलाक की डिक्री दे दी। इसके बाद 23 जनवरी 2024 को अदालत ने भरण-पोषण के मामले में सुरजीत को आदेश दिया कि वह सावित्री देवी को याचिका दायर करने की तारीख यानी 18 मई 2019 से हर महीने 4,000 रुपये दे। सुरजीत ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
तलाक होने की दी थी दलील
पति की दलील थी कि तलाक के बाद दोनों के बीच पति-पत्नी का कानूनी रिश्ता खत्म हो गया है। इसलिए अब वह सावित्री देवी को गुजारा भत्ता देने के लिए जिम्मेदार नहीं है। उसने यह भी कहा कि वह एक साधारण दिहाड़ी मजदूर है, उम्र बढ़ चुकी है और खराब स्वास्थ्य के कारण कमाने की स्थिति में नहीं है। उसका दावा था कि सावित्री देवी सिलाई का काम करके अच्छी कमाई करती हैं।
दूसरी शादी नहीं की, इसलिए गुजारा-भात्ता का अधिकार
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि धारा 125 में ‘पत्नी’ की परिभाषा में ऐसी महिला भी शामिल है जिसका तलाक हो चुका है, लेकिन उसने दोबारा शादी नहीं की है। इस मामले में सावित्री देवी ने दूसरी शादी नहीं की है। इसलिए उन्हें भरण-पोषण पाने का कानूनी अधिकार है।
पत्नी केवल दिहाड़ी मजदूर
अदालत ने पति की आर्थिक स्थिति से जुड़ी दलील पर भी गौर किया। सुरजीत ने खुद को दिहाड़ी मजदूर बताया था, लेकिन रिकॉर्ड में उसके नाम पर एक बिजनेस लोन होने की जानकारी सामने आई। अदालत ने इसे उसके इस दावे के विपरीत माना कि वह केवल दिहाड़ी मजदूर है। पति की ओर से ऐसा कोई पुख्ता सबूत भी पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि वह खराब स्वास्थ्य के कारण कमाने में पूरी तरह असमर्थ है।
कानूनी दायित्व से मुक्त नहीं हो सकता पति
पत्नी के सिलाई से अच्छी कमाई करने के दावे पर भी पति कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका। अदालत ने कहा कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि पत्नी कुछ काम करती है या उसकी आय है। इस आधार पर पति को अपने कानूनी दायित्व से मुक्त नहीं किया जा सकता।
कर्ज का हवाला देकर बच नहीं सकते
हाईकोर्ट ने कहा कि स्वस्थ और सक्षम व्यक्ति अपने भरण-पोषण की जिम्मेदारी से केवल आर्थिक परेशानी, कर्ज या दूसरी वित्तीय जिम्मेदारियों का हवाला देकर बच नहीं सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भरण-पोषण से जुड़े कानून का उद्देश्य ऐसी महिलाओं को बेसहारा होने से बचाना है, जो अपने पति पर निर्भर रही हैं और उन्हें सम्मान के साथ जीवन जीने का अवसर देना है।
फैमिली कोर्ट का फैसला उचित
अदालत ने फैमिली कोर्ट की ओर से तय 4,000 रुपये प्रतिमाह की राशि को भी उचित माना और कहा कि यह राशि मामले की परिस्थितियों में न्यायसंगत और संतुलित है। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार करते हुए पति की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।









