नई दिल्ली. देश के गांवों की पहचान अक्सर खेती-किसानी से होती है, लेकिन गुजरात का एक छोटा-सा गांव इस सोच को बदल रहा है. महज 100 घरों की आबादी वाला रातूसिंह ना मुवाड़ा गांव अब खेती से ज्यादा शतरंज की बिसात के लिए जाना जा रहा है. यहां के बच्चों के हाथों में खिलौनों से ज्यादा चेस के मोहरे नजर आते हैं और यही वजह है कि चार साल के भीतर इस गांव ने 17 FIDE रेटेड खिलाड़ी, 120 ट्रॉफियां और 179 मेडल दे दिए हैं. सबसे खास बात यह है कि इस सफलता की कहानी किसी नामी अकेडमी या करोड़ों की सुविधाओं से नहीं, बल्कि एक सरकारी स्कूल और एक टीचर के जज्बे से लिखी गई है. चलिए आपको बताते इस दिलचस्प कहानी के बारे में विस्तार से बताते हैं.
100 घरों का गांव बना मिसाल
दरअसल, गुजरात के महिसागर जिले का रातूसिंह ना मुवाड़ा एक छोटा-सा गांव है, जहां करीब 100 परिवार रहते हैं. अधिकांश परिवार खेती या दिहाड़ी मजदूरी करके जीवनयापन करते हैं. आर्थिक चुनौतियों के बावजूद यहां के बच्चों ने चेस में ऐसी सफलता हासिल की है कि आज यह गांव देशभर में चर्चा का विषय बन गया है. सिर्फ चार वर्षों में गांव के 17 बच्चों ने FIDE रेटिंग हासिल की है. इतना ही नहीं, गांव के खिलाड़ी अब तक 120 ट्रॉफियां और 179 मेडल जीत चुके हैं. यह उपलब्धि किसी भी छोटे गांव के लिए असाधारण से कम नहीं है.
एक टीचर ने बदल दी पूरे गांव की तस्वीर
इस बदलाव के सूत्रधार हैं 45 साल के मैथ्स टीचर संदीप उपाध्याय. वह सरकारी बाल वाटिका स्कूल में पढ़ाते हैं. 2021 में उन्होंने बच्चों को चेस सिखाने की शुरुआत की. उनका मानना था कि शतरंज केवल खेल नहीं, बल्कि सोचने, निर्णय लेने और धैर्य विकसित करने का सबसे प्रभावी माध्यम है. दिलचस्प बात यह है कि जिस स्कूल से यह अभियान शुरू हुआ, वहां सिर्फ पांच ही कमरे हैं और तो और उनसे से केवल दो ही इस्तेमाल करने लायक हैं. करीब 200 छात्रों में कई बच्चों की पढ़ाई खुले मैदान में होती है. सीमित संसाधनों के बावजूद संदीप ने हार नहीं मानी और गांव में चेस की ऐसी अलख जगाई कि आज वहीं से निकले खिलाड़ी दुनिया में भारत का डंका बजा रहे हैं.
अपनी जेब से उठाते हैं बच्चों का खर्च
संदीप उपाध्याय सिर्फ पढ़ाने तक सीमित नहीं हैं. उन्होंने बच्चों की टूर्नामेंट फीस, यात्रा खर्च, चेस की किताबें और चेस किट खरीदने में भी अपनी सैलेरी का बड़ा हिस्सा खर्च किया. धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई. कई लोगों ने आर्थिक मदद की, उपकरण उपलब्ध कराए और ग्रैंडमास्टर अंकित राजपारा जैसे खिलाड़ी भी हर महीने बच्चों को फ्री ट्रेनिंग देने लगे.
लगातार मिल रही कामयाबी
गांव के खिलाड़ियों ने अब तक 24 राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और इनमें से 22 में टॉप-3 स्थान हासिल किए. दिसंबर 2025 में गांधीनगर में आयोजित स्टूडेंट्स चेस फेस्टिवल में बाल वाटिका को सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाला संस्थान चुना गया. यही नहीं, गांव के 21 बच्चों का चयन जिला स्तरीय स्पोर्ट्स स्कूल में भी हुआ है, जहां उन्हें फ्री शिक्षा, हॉस्टल और प्रोफेशनल ट्रेनिंग मिल रही है.
मजदूर की बेटी को बनना है ग्रैंडमास्टर
गांव की सबसे होनहार खिलाड़ियों में आठवीं कक्षा की छात्रा दिव्या चौहान भी शामिल हैं. उनके पिता खेतों में मजदूरी करते हैं, लेकिन बेटी के सपनों की उड़ान इससे कहीं बड़ी है. दिव्या लगातार दो साल तक तालुका स्तर की प्रतियोगिताओं में अजेय रहीं. उन्होंने राज्य महिला रैपिड चैंपियनशिप में तीसरा स्थान भी हासिल किया और अब गुजरात के स्पोर्ट्स स्कूल में ट्रेनिंग ले रही हैं. उनका सपना है कि वह ग्रैंडमास्टर बनकर भारत का प्रतिनिधित्व करें और गांव की दूसरी बेटियों के लिए भी प्रेरणा बनें.
सबसे बड़ा सरकारी चेस स्कूल बनाने का सपना
संदीप उपाध्याय का सपना केवल अपने गांव तक सीमित नहीं है. वह चाहते हैं कि देशभर के ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के प्रतिभाशाली बच्चों के लिए यहां एक आवासीय चेस स्कूल बनाया जाए. जहां उन्हें विश्वस्तरीय ट्रेनिंग के साथ-साथ यूपीएससी और जीपीएससी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कराई जाए. उनकी इस पहल को अब प्रशासन का भी समर्थन मिलने लगा है. गांव में मौजूदा स्कूल से करीब साढ़े आठ गुना बड़ा नया स्कूल बनाने की योजना तैयार की जा रही है, जिसमें शतरंज के लिए अलग हॉल भी होगा.








