नई दिल्ली: स्कॉटलैंड के ग्लासगो में जारी कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत की महिला एथलीटों ने धूम मचा दी है. मीराबाई चानू और शर्मिला धनखड़ ने भारत के लिए सोने का तमगा जीता. इसके अलावा अन्य महिला एथलीटों ने भी मेडल जीतकर देश का मान बढ़ाया है, लेकिन इन उपलब्धियों के पीछे उनके संघर्षों की ऐसी कहानी छिपी है, जिसे जानकर आपकी आंखों से आंसू छलक पड़ेंगे. आइए जानते हैं भारत की उन पांच बेटियों के बारे में, जो तमाम मुश्किलों और बाधाओं को पार कर आज दुनिया के लिए मिसाल बनी हैं.
मीराबाई चानू (वेटलिफ्टर)
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में मीराबाई चानू ने 48 किलोग्राम भारवर्ग में गोल्ड मेडल अपने नाम किया है. मेडल के लिए मीराबाई जब पोडियम पर आईं, तो राष्ट्रगान बजते ही उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े. मीरा के वे आंसू इस बात की गवाह थी कि उन्होंने यहां तक पहुंचने के लिए कितने संघर्ष और दुख सहे हैं. मीराबाई मणिपुर के इंफाल पूर्व के नोंगपोक काकचिंग गांव की रहने वाली हैं. बेहद साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाली मीराबाई बचपन में ही लकड़ी के भारी गट्ठर उठाकर पहाड़ों पर चढ़ती थीं, जिससे उनकी ताकत का अंदाजा लगा.
नेशनल लेवल पर दमदार प्रदर्शन करने के बाद मीराबाई ने 2016 रियो ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया था, लेकिन उनके तीनों प्रयास असफल रहे. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और पीठ के गंभीर दर्द व चोटों से उबरते हुए शानदार वापसी की. उन्होंने टोक्यो ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीतकर सबको गलत साबित कर दिया कि मीराबाई लूजर नहीं बल्कि चैंपियन हैं. इसके बाद अब उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में लगातार दूसरी बार गोल्ड मेडल जीता है, जिससे यह साबित होता है कि कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प के आगे कोई भी बाधा टिक नहीं सकती.
शर्मिला धनखड़ (पैरा एथलीट)
इस लिस्ट में दूसरा नाम पैरा एथलीट शर्मिला धनखड़ का है. शर्मिला ने शॉट पुट में F57 कैटेगरी में भारत को गोल्ड दिलाया है. शर्मिला ने 9.81 मीटर थ्रो कर अपना बेस्ट परफॉर्मेंस दिया. शर्मिला के लिए भी यहां तक पहुंचना आसान नहीं था. हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के चित्रौली गांव की रहने वाली शर्मिला जब दो साल की थीं, तभी पोलियो से ग्रस्त हो गई थीं. पिता एक गरीब किसान थे और मां आंखों से देख नहीं पाती थीं. जीवन बेहद मुश्किलों में गुजर रहा था फिर किसी तरह उनकी शादी हुई, लेकिन पति उनके साथ मारपीट करता था.
शर्मिला धनखड़
तंग आकर शर्मिला ने अपनी दो बेटियों के साथ पति का घर छोड़ दिया. कुछ समय बाद उनके पिता ने शर्मिला की दूसरी शादी करा दी. इसके बाद उनकी किस्मत पलटी. शर्मिला के दूसरे पति काफी सपोर्टिव थे. उन्होंने ही शर्मिला को पैरा एथलेटिक्स में आने के लिए प्रेरित किया. शर्मिला ने 34 साल की उम्र में कोच टेकचंद और देवेंद्र के मार्गदर्शन में शॉट पुट की शुरुआत की और सालों की कड़ी मेहनत के बाद आखिरकार उन्हें उनकी मेहनत का फल मिला.
ज्ञानेश्वरी यादव (वेटलिफ्टर)
ज्ञानेश्वरी यादव भी ऐसा ही एक नाम हैं, जिन्होंने तमाम बाधाओं को पार कर देश का मान बढ़ाया है. ज्ञानेश्वरी ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में 53 किग्रा वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में सिल्वर मेडल अपने नाम किया है. ज्ञानेश्वरी छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव के एक बेहद साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से आती हैं. उनके पिता दीपक यादव नामचीन पहलवान थे. ज्ञानेश्वरी के पिता टॉप लेवल एथलीट थे. लेकिन घर चलाने के लिए उन्हें इलेक्ट्रिशियन बनना पड़ा. शुरुआत में ज्ञानेश्वरी के पास ट्रेनिंग और डाइट तक के पैसे नहीं थे, लेकिन ये तमाम बाधाएं ज्ञानेश्वरी को आगे बढ़ने से नहीं रोक पाईं.
ज्ञानेश्वरी देवी
ज्ञानेश्वरी ने लोकल कोचों के मार्गदर्शन में बिना किसी बड़ी सुविधा के जिम और मैदान में घंटों पसीना बहाया. आर्थिक तंगी के बावजूद उनके परिवार ने उनके सपने को कभी टूटने नहीं दिया. यही कारण है कि जूनियर लेवल पर भी ज्ञानेश्वरी ने विश्व कप में पदक जीतकर अपनी एक अलग पहचान बनाई थी.
हरजिंदर कौर (वेटलिफ्टर)
हरजिंदर कौर ने भी कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के लिए वेटलिफ्टिंग में मेडल जीता है. हरजिंदर ने 69 किलोग्राम भारवर्ग में सिल्वर मेडल अपने नाम किया है. पंजाब के पटियाला की रहने वाली हरजिंदर की कहानी भी बेहद प्रेरणादायी है. हरजिंदर के पिता खेती-किसानी और मवेशी पालन कर परिवार चलाते थे. हरजिंदर भी अपने पिता के साथ खेतों के काम में हाथ बंटाया करती थीं. घर में वह मवेशियों के लिए चारा काटा करती थीं.
हरजिंदर कौर
बता दें कि शुरुआत में उन्होंने कबड्डी और रस्साकशी खेला, लेकिन बाद में उनके कोचों ने उनकी ताकत को देखते हुए वेटलिफ्टिंग में आने की सलाह दी. आर्थिक तंगी के कारण एक समय उनके पास ट्रेनिंग और सही खुराक के पैसे भी नहीं थे. परिवार पर कर्ज होने के बावजूद उन्होंने अपना ध्यान लक्ष्य से नहीं हटाया और अपनी मेहनत के दम पर आज देश का नाम रोशन किया.
बिंदियारानी देवी (वेटलिफ्टर)
बिंदियारानी देवी ने कॉमनवेल्थ गेम्स में 58 किलोग्राम भारवर्ग में वेटलिफ्टिंग में सिल्वर मेडल जीता है. बिंदियारानी भी मणिपुर से आती हैं और उन्होंने वहीं से ट्रेनिंग ली है, जहां से मीराबाई चानू ने वेटलिफ्टिंग के गुर सीखे हैं. यही कारण है कि उन्हें मीराबाई चानू 2.O भी कहा जाता है. बिंदियारानी भी बहुत मुश्किलों का सामना कर आज यहां तक पहुंची हैं. उनके पिता एक छोटी सी किराने की दुकान चलाते थे और परिवार का गुजारा मुश्किल से होता था. बचपन में बिंदियारानी ने ताइक्वांडो से अपने खेल सफर की शुरुआत की थी, लेकिन अपनी कम लंबाई और बेहतरीन शारीरिक संतुलन के कारण उन्होंने वेटलिफ्टिंग को अपनाया.
बिंदियारानी देवी
मणिपुर में अक्सर होने वाली नाकेबंदी, संसाधनों की कमी और सुविधाओं के अभाव के बावजूद उन्होंने अपनी ट्रेनिंग जारी रखी. गंभीर चोटों से जूझने के बावजूद बिंदियारानी ने बार-बार वापसी की और अपनी बेहतरीन क्लीन एंड जर्क तकनीक के दम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई मेडल हासिल किए हैं.






