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शर्मिला धनकर ने जो मेहनत की है, वह काबिले-तारीफ है. उनके लिए यह सफर बिल्कुल आसान नहीं रहा. उनके व्यक्तिगत जीवन में ज्यादा विस्तार में नहीं जाना चाहिए, क्योंकि शायद वह खुद भी ऐसा नहीं चाहेंगी लेकिन इतना कहना काफी है कि उनके लिए यह बेहद कठिन रहा है. हर मुश्किल के खिलाफ लड़ते हुए विजेता बनना आसान नहीं होता.
शर्मिला धनकर का ग्लागो में गोल्ड जीतना और उससे पहले की कहानी आपको रुला देगी
नई दिल्ली. ग्लासगो में तिरंगा जिस खिलाड़ी की वजह से शान से आसमान में लहराया, जसकी वजह से हर भारतीय फैन का सिर गर्व से ऊंचा हो गया उसका मेडल तक सफर जानेंगे तो आपके आंखों में भी आंसुओं का सलाब आ जाएगा. सिर्फ दो साल की उम्र में पोलियो से प्रभावित हो गई थीं और उनका बचपन बिल्कुल आसान नहीं रहा. 19 साल की उम्र में शादी हुई, लेकिन उन्हें एक हिंसक और प्रताड़नापूर्ण रिश्ते का सामना करना पड़ा. आखिरकार 26 साल की उम्र में उन्हें दो छोटी बेटियों के साथ उस रिश्ते को छोड़ना पड़ा. ज़रा ठहरकर उस हकीकत की कल्पना कीजिए एक अत्याचारी पति, घरेलू हिंसा और दो मासूम बेटियों की ज़िम्मेदारी. ऐसी परिस्थितियों में केवल जीना ही मुश्किल होता है, खेल में करियर बनाना तो बहुत दूर की बात है लेकिन शर्मिला धनकर ने कभी हार नहीं मानी.
शर्मिला धनकर ने 26 साल की उम्र में घर छोड़ने के बाद, कुछ सालों बाद उन्होंने अजीत सिंह से शादी की. दोनों ने मिलकर धीरे-धीरे अपनी ज़िंदगी को फिर से खड़ा किया. अजीत ने तो उनकी खेल की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अपनी संपत्ति तक बेच दी. यही वह मोड़ था, जहां से सब कुछ बदल गया. कुछ ही वर्षों में शर्मिला भारतीय पैरा एथलेटिक्स टीम की नियमित सदस्य बन गईं.
बर्मिघंम से ग्लासगो
शर्मिला धनकर 2022 में बर्मिंघम में भी थीं, लेकिन वहां पदक से चूक गईं. एशियन पैरा गेम्स में भी उन्होंने हिस्सा लिया, पर फिर से पदक नहीं मिल सका. हालात आसान नहीं थे, लेकिन उनका हौसला कभी नहीं टूटा. ग्लासगो में, ठंडी और तेज़ हवाओं वाले दिन में, थ्रो इवेंट के लिए परिस्थितियां बिल्कुल अनुकूल नहीं थीं. कोच सत्यानारायण और डिप्टी शेफ डी मिशन राहुल स्वामी ने कई बार इस खिलाड़ी की प्रतिभा का जिक्र किया और फिर वो हुआ जो दुनिया ने देखा. यह पदक उनके लिए पूरी दुनिया जैसा मायने रखता है और उनकी ज़िंदगी बदल सकता है. अब सरकारी पुरस्कार भी करीब हैं और वर्षों की मेहनत का फल उन्हें मिलने वाला है.
चुनौतियों से पार पाना और मेडल लाना
शर्मिला की कहानी संघर्ष और साहस की मिसाल है. यह अनुशासन, उम्मीद, सकारात्मकता और पहचान बनाने की जिद की कहानी है. उनकी ज़िंदगी हम सभी के लिए एक प्रेरणा है. शर्मिला की ये कहानी भले ही रोहित शर्मा या विराट कोहली जैसी लोकप्रियता ना पाए हर कोई शायद शर्मिला के बारे में पढ़ना भी न चाहे लेकिन खेल सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है; यह जीवन के सबक सिखाता है. शर्मिला इस सच्चाई की मिसाल हैं, और उनका यह पदक सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि पूरे भारत की जीत है. हर उस महिला के लिए, जिसने घरेलू हिंसा या अत्याचार झेला है, यह एक मजबूत संदेश है वे अपनी आवाज उठा सकती हैं, अपनी ज़िंदगी फिर से बना सकती हैं और पहले से ज्यादा मजबूत बनकर उभर सकती हैं.
शर्मिला धनकर ने जो मेहनत की है, वह काबिले-तारीफ है. उनके लिए यह सफर बिल्कुल आसान नहीं रहा. उनके व्यक्तिगत जीवन में ज्यादा विस्तार में नहीं जाना चाहिए, क्योंकि शायद वह खुद भी ऐसा नहीं चाहेंगी लेकिन इतना कहना काफी है कि उनके लिए यह बेहद कठिन रहा है. हर मुश्किल के खिलाफ लड़ते हुए विजेता बनना आसान नहीं होता. यह कोई फिल्म नहीं, बल्कि असल ज़िंदगी है, जहां ज्यादातर लोग हार मान लेते हैं लेकिन शर्मिला ने संघर्ष जारी रखा और अपनी पहचान बनाई.
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मैं, राजीव मिश्रा, वर्तमान में नेटवर्क 18 में एसोसिएट स्पोर्ट्स एडिटर के रूप में कार्यरत हूँ. इस भूमिका में मैं डिजिटल स्पोर्ट्स कंटेंट की योजना, संपादकीय रणनीति और एंकरिंग की जिम्मेदारी निभाता हूँ. खेल पत्रका…
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