मुख्यालय संवाददाता@विशाल टंडन…
..पितरों की आत्मशांति और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से लोगों ने किया तर्पण, पिंडदान व दान-पुण्य

पितृपक्ष के दूसरे दिन सोमवार को घरों में पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध और तर्पण किया गया। लोगों ने सुबह स्नान आदि के बाद विधि-विधान से पितरों का स्मरण करते हुए जल, काले तिल और कुश से तर्पण किया। जिन परिवारों में सोमवार को पूर्वजों की मृत्यु तिथि पड़ी, वहां उनके निमित्त श्राद्ध कर्म, पिंडदान और पूजन किया गया। कई लोगों ने ब्राह्मणों को भोजन कराने के साथ जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और अन्य सामग्री का दान भी किया।

ज्योतिष एवं व्याकरण आचार्य डॉ. जीतेन्द्र पाल त्रिपाठी,राजा तारा छोटी काशी ने बताया कि पितृपक्ष में कुल 16 तिथियां होती हैं। इन तिथियों में लोग अपने पूर्वजों के लिए श्रद्धा, स्नेह और उत्साहपूर्वक पितृदान करते हैं। उन्होंने कहा कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार पितरों का तर्पण, श्राद्ध और दान-पुण्य करना परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृपक्ष में पूर्वजों का श्रद्धापूर्वक स्मरण और उनके निमित्त किए गए तर्पण, श्राद्ध व दान-पुण्य से पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त होती है। इन कर्मकांडों का उद्देश्य दिवंगत परिजनों की आत्मशांति की कामना करना और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना माना जाता है। इसी विश्वास के चलते लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्राद्ध कर्म करते हैं।

श्राद्ध के दौरान पितरों के निमित्त भोजन निकालने और गाय, कौआ आदि को भोजन कराने की भी परंपरा है। लोगों का विश्वास है कि पितरों का विधि-विधान से स्मरण करने और दान-पुण्य करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है तथा पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। ये फल और प्रभाव धार्मिक मान्यताओं एवं परंपराओं पर आधारित हैं।

