नई दिल्ली. भारत की महिला वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने कॉमनवेल्थ गेम्स में लगातार तीसरा गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया. मीराबाई ने एक बार फिर दुनिया के सामने साबित कर दिया है कि उन्हें इस खेल की सर्वकालिक महान एथलीटों में क्यों गिना जाता है. 23वें कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की उम्मीदों का पूरा भार अपने मजबूत कंधों पर उठाते हुए 31 वर्षीय मीराबाई ने महिलाओं की 48 किलोग्राम स्पर्धा में कुल 190 किलोग्राम वजन उठाकर देश की झोली में पहला स्वर्ण पदक डाल दिया. इस ऐतिहासिक जीत के साथ ही चानू ने राष्ट्रमंडल खेलों में लगातार तीन स्वर्ण पदक जीतने की अपनी शानदार हैट्रिक पूरी की.
प्रतियोगिता के इस खास दिन भारत का प्रदर्शन बेहतरीन रहा. जिस दिन मीराबाई चानू (Mirabai Chanu) ने पोडियम पर शीर्ष स्थान हासिल किया, उसी दिन भारोत्तोलक ऋषिकंत सिंह ने भी अपने शानदार प्रदर्शन से देश के लिए एक रजत पदक जीता. इन दो सफलताओं के साथ, 23वें राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के कुल पदकों की संख्या तीन तक पहुंच गई है.
उम्मीदों का भार और शानदार वापसी
राष्ट्रमंडल खेलों की शुरुआत से ही भारोत्तोलन (वेटलिफ्टिंग) को भारत का सबसे मजबूत पक्ष माना जा रहा था. भारतीय एथलीटों ने इस भरोसे को सही ठहराते हुए अब तक दो पदक अपने नाम कर लिए हैं. भारतीय दल के पास भारोत्तोलन में अपना दबदबा और बढ़ाने का बेहतरीन मौका है, जब एम राजा पुरुषों के 65 किलोग्राम वर्ग में पदक के लिए अपनी चुनौती पेश करेंगे.
महिलाओं की 48 किलोग्राम वर्ग की स्पर्धा में मीराबाई चानू स्वर्ण पदक की सबसे प्रबल दावेदार के रूप में उतरी थीं. हालांकि, प्रतियोगिता की शुरुआत वैसी नहीं रही जैसी उन्होंने सोची थी. स्नैच वर्ग के अपने पहले प्रयास में चानू 82 किलोग्राम का वजन उठाने में असफल रहीं. इस असफलता के बावजूद उन्होंने अपना आपा नहीं खोया. दूसरे प्रयास में उन्होंने 82 किलोग्राम का वजन आसानी से उठाकर शानदार वापसी की. इसके बाद, अपने तीसरे और अंतिम प्रयास में उन्होंने 85 किलोग्राम का भार उठाकर एक नया ‘राष्ट्रमंडल खेल रिकॉर्ड’ कायम कर दिया.
क्लीन एंड जर्क में सील किया गोल्ड
स्नैच में बढ़त बनाने के बाद चानू को क्लीन एंड जर्क वर्ग में स्वर्ण पदक पक्का करने के लिए सिर्फ एक बार 105 किलोग्राम वजन उठाने की आवश्यकता थी. यहां भी कहानी स्नैच जैसी ही रहीण् पहले प्रयास में चानू 105 किलोग्राम उठाने से चूक गईं, जिससे स्वर्ण पदक का इंतजार थोड़ा बढ़ गया. लेकिन दूसरे प्रयास में उन्होंने कोई गलती नहीं की और 105 किलोग्राम का भार सफलतापूर्वक उठाकर स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया. चूंकि स्वर्ण पदक पक्का हो चुका था और वह अपने इस प्रदर्शन से पूरी तरह संतुष्ट थीं, इसलिए उन्होंने अपने तीसरे और अंतिम प्रयास में न जाने का फैसला किया. इस स्पर्धा में नाइजीरिया की रूथ असुकवो न्योंग ने कुल वजन के साथ रजत पदक हासिल किया, जबकि मलेशिया की आइरीन जेन हेनरी को कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा.
चार राष्ट्रमंडल खेल, चार पदक
यह तीसरा मौका है जब मीराबाई चानू राष्ट्रमंडल खेलों से लगातार स्वर्ण पदक लेकर लौटी हैं. इससे पहले वह ग्लासगो और बर्मिंघम खेलों में भी पोडियम के शीर्ष पर खड़ी हो चुकी हैं. अब उनके नाम राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में कुल चार पदक दर्ज हो चुके हैं. मीराबाई चानू का राष्ट्रमंडल खेलों में यह स्वर्णिम सफर साल 2014 के ग्लासगो खेलों से शुरू हुआ था. तब एक युवा एथलीट के रूप में उन्होंने महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में रजत पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई थी. इसके चार साल बाद, 2018 के गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों में चानू ने एक नया कीर्तिमान रचा. उन्होंने कुल 196 किलोग्राम वजन उठाकर नए ‘गेम्स और कॉमनवेल्थ रिकॉर्ड्स’ के साथ अपना पहला स्वर्ण पदक जीता.
अपनी इस लय को बरकरार रखते हुए, 2022 के बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में उन्होंने महिलाओं के 49 किलोग्राम वर्ग में 201 किलोग्राम का कुल भार उठाया. इस प्रदर्शन के साथ उन्होंने अपने ही रिकॉर्ड को तोड़ते हुए प्रतियोगिता में भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाया था.
भारतीय खेल जगत की महानतम एथलीटों में शामिल
लगातार चार राष्ट्रमंडल खेलों (2014 ग्लासगो, 2018 गोल्ड कोस्ट, 2022 बर्मिंघम और 2026) में भाग लेते हुए तीन स्वर्ण और एक रजत पदक जीतना मीराबाई चानू को राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में भारत की सबसे सफल एथलीटों में से एक बनाता है. राष्ट्रमंडल खेलों की इस अभूतपूर्व सफलता के अलावा, मीराबाई चानू का अंतरराष्ट्रीय करियर उपलब्धियों से भरा रहा है. उनके पास ओलंपिक खेलों में जीता गया एक ऐतिहासिक रजत पदक भी है. इसके साथ ही, उन्होंने विश्व चैंपियनशिप (World Championships) के मंच पर भी भारत का नाम रोशन करते हुए एक स्वर्ण और दो रजत पदक अपने नाम किए हैं.
31 वर्ष की उम्र में भी मीराबाई चानू का यह समर्पण, संयम और बार-बार देश को गौरवान्वित करने का जज्बा आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महान प्रेरणा है. 2026 के इन खेलों में उनकी यह जीत भारतीय खेल इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गई है.







