नई दिल्ली. 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स 23 जुलाई से स्कॉटलैंड के खूबसूरत शहर ग्लासगो में शुरू होने जा रहे हैं. भारतीय खेल प्रेमियों के मन में उत्साह तो है, लेकिन इस बार एक अजीब सी खामोशी और निराशा भी छिपी हुई है. अमूमन जब भी कॉमनवेल्थ गेम्स करीब आते हैं, तो भारत में मेडल टैली के टॉप चार में रहने और 60 से अधिक पदक जीतने के दावे गूंजने लगते हैं. नीरज चोपड़ा के जैवलीन की गूंज हो या मीराबाई चानू का भारोत्तोलन में जलवा प्रशंसक हर बार एक सुनहरे सफर की उम्मीद करते हैं. हालांकि, ग्लासगो में सब कुछ वैसा नहीं होगा जैसा हम सालों से देखते आ रहे हैं. इस बार भारत का 125 एथलीटों का दल तो मैदान में उतरेगा, लेकिन मेडल की बरसात की उम्मीदों पर बहुत बड़ा ग्रहण लग चुका है. खेलप्रेमी इस बार न तो पीवी सिंधु के स्मैश देख पाएंगे, न मनु भाकर की सटीक निशानेबाजी, न हरमनप्रीत सिंह की ड्रैग-फ्लिक और न ही अमन सहरावत की कुश्ती के दांव-पेच. आखिर क्यों इस बार का कॉमनवेल्थ गेम्स भारतीय खेल प्रेमियों के लिए पूरी कहानी बदल चुका है, आइए जानते हैं.
अगर हम पिछले 2022 के बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स की बात करें, तो वहां 19 खेल शामिल थे. एथलीटों का मेला लगा था और खेल का दायरा काफी बड़ा था. लेकिन ग्लासगो में यह प्रतियोगिता पूरी तरह से बदल गई है. इस बार केवल 10 खेलों को ही जगह मिली है. ग्लासगो के रोस्टर में जो खेल जगह बना पाए हैं, वे हैं एथलेटिक्स, स्विमिंग , ट्रैक साइक्लिंग, वेटलिफ्टिंग, 3×3 बास्केटबॉल, लॉन बॉल्स, नेटबॉल, आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक, जूडो और बॉक्सिंग. इनमें से छह खेलों में पैरा-एथलीटों की प्रतियोगिताएं भी साथ-साथ आयोजित की जाएंगी. पर सबसे चौंकाने वाली बात वह लिस्ट है जिसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. ऐसे खेल जो भारत की रीढ़ की हड्डी माने जाते हैं बैडमिंटन, क्रिकेट, हॉकी, स्क्वैश, टेबल टेनिस, ट्रायथलॉन, कुश्ती, बीच वॉलीबॉल और रग्बी सेवन्स वे इस बार खेलों का हिस्सा ही नहीं हैं.
भारत के मेडल पर सीधा असर
भारत के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह खेलों का सिर्फ एक छोटा संस्करण नहीं है, बल्कि यह भारत के सबसे मजबूत ‘मेडल बैंक’ पर सीधी सर्जिकल स्ट्राइक जैसा है. आंकड़ों की कहानी बयां करती है कि बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत ने 210 एथलीटों का एक बड़ा दल 16 अलग-अलग खेलों में भेजा था. भारत ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल 61 पदक अपने नाम किए थे और तालिका में चौथे स्थान पर रहा था. लेकिन ग्लासगो की कड़वी सच्चाई यह है कि बर्मिंघम में जीते गए उन 61 में से सीधे-सीधे 30 पदक उन खेलों से आए थे, जिन्हें इस बार ग्लासगो से बाहर कर दिया गया है. यानी पिछले कुल पदकों का लगभग आधा हिस्सा (करीब 49 प्रतिशत) तो खेल शुरू होने से पहले ही हमारी झोली से बाहर हो चुका है. इतना ही नहीं, 2022 में भारत का 47 प्रतिशत एथलीट दल उन्हीं खेलों का प्रतिनिधित्व कर रहा था जो अब इस आयोजन का हिस्सा ही नहीं हैं.
अगर इसे और गहराई से समझें, तो 2022 में भारत को कुश्ती से अकेले 12 मेडल मिले थे, टेबल टेनिस से 7 पदक आए थे, बैडमिंटन से 6 पदक हासिल हुए थे, स्क्वैश और हॉकी ने मिलकर 4 पदक दिए थे और महिला क्रिकेट टीम ने एक रजत पदक जीता था. यह कुल मिलाकर 30 पदकों की एक ऐसी इमारत थी जो भारत की रैंकिंग को हमेशा शीर्ष में बनाए रखती थी. 2022 में तो पहले ही निशानेबाजी और तीरंदाजी जैसे भारत के पारंपरिक रूप से मजबूत खेल गायब थे. अब कुश्ती, बैडमिंटन, टेबल टेनिस और हॉकी के भी हट जाने से भारत के लिए मेडल की गारंटी लगभग खत्म जैसी हो गई है.
आखिर क्यों हुआ खेलों का इतना बुरा हाल?
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आयोजकों ने एक झटके में इतने सारे लोकप्रिय खेलों को बाहर क्यों कर दिया? इसका सीधा जवाब है अर्थशास्त्र यानी पैसों का भारी दबाव. इस पूरी कहानी की शुरुआत साल 2023 में हुई. मूल रूप से 2026 के कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य को मिली थी. लेकिन खेल आयोजन से ठीक तीन साल पहले, विक्टोरिया सरकार ने अचानक अपने हाथ पीछे खींच लिए. उनका कहना था कि खेलों को आयोजित करने का खर्च उनके अनुमान से कहीं ज्यादा बढ़ रहा है और वे इतना भारी आर्थिक बोझ नहीं उठा सकते.
ऐसी स्थिति में इतने कम समय (महज तीन साल) में किसी भी देश या शहर के लिए इतने बड़े बहु-खेल आयोजन की मेजबानी करना लगभग असंभव सा था.74 राष्ट्रमंडल देशों और क्षेत्रों के हजारों खिलाड़ियों के रहने, खाने और सुरक्षा का इंतजाम करना कोई मामूली बात नहीं होती. ऊपर से अधिकांश पूर्व मेजबान देश भी अब इस आयोजन में बड़ा निवेश करने से कतराते हैं, क्योंकि उन्हें इससे आर्थिक रूप से कोई खास फायदा (‘रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट’) नजर नहीं आता. ऐसे मुश्किल वक्त में स्कॉटलैंड का शहर ग्लासगो मसीहा बनकर आगे आया. ग्लासगो ने 2014 में ही बहुत सफलतापूर्वक इन खेलों की मेजबानी की थी. उनके पास पहले से ही विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा तैयार था. हालांकि, ग्लासगो ने साफ शर्त रखी कि तीन साल का समय एक विशालकाय आयोजन के लिए बहुत कम है, इसलिए वे केवल एक ‘दुबला-पतला’ या बेहद सीमित संस्करण ही आयोजित कर सकते हैं.
इसी बजटीय और ढांचागत सीमा के कारण ग्लासगो को बहुत ही छोटे पैमाने पर समेट दिया गया है. इस बार कोई नया ‘खेल गांव’ (Games Village) नहीं बनाया गया है. एथलीटों और अधिकारियों को मौजूदा होटलों में ठहराया जाएगा. पूरा खेल आयोजन चार मौजूदा स्टेडियमों/स्थानों के भीतर ही पूरा कर लिया जाएगा, जो एक-दूसरे के बेहद करीब हैं. इसी आर्थिक खींचतान की गाज उन खेलों पर गिरी जिन्हें आयोजित करने के लिए अलग-अलग महंगे इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत पड़ती.
क्या बचे हुए खेलों से उम्मीदें बची हैं?
जब आधे पदक देने वाले खेल बाहर हो चुके हैं, तो क्या बचे हुए 10 खेलों में भारत अपना परचम लहरा पाएगा? यहां भी तस्वीर बहुत ज्यादा गुलाबी नजर नहीं आती. जो 10 खेल इस बार ग्लासगो में शामिल हैं, उनमें से कई में भारत का हालिया प्रदर्शन बहुत ही उतार-चढ़ाव भरा रहा है. 2022 में भारत ने मुक्केबाजी में 7 पदक, भारोत्तोलन में 10 पदक और जूडो (Judo) में 3 पदक जीते थे. लेकिन 2024 के पेरिस ओलंपिक में हमने देखा कि इन खेलों में भारतीय स्टार्स का प्रदर्शन काफी निराशाजनक रहा. मीराबाई चानू, लवलीना बोरगोहेन और निखत जरीन जैसे बड़े नाम पेरिस ओलंपिक में उम्मीद के मुताबिक पदक तालिका तक नहीं पहुंच सके थे. ऐसे में ग्लासगो में इन खेलों से पदकों की संख्या में बर्मिंघम जैसा दोहराव होना भी काफी चुनौतीपूर्ण लगता है.
भारतीय खेलों पर इसका दूरगामी असर
इस कटौती का सबसे ज्यादा नुकसान टेबल टेनिस, बैडमिंटन और कुश्ती जैसे खेलों को होगा. कॉमनवेल्थ गेम्स का मंच भारतीय पहलवानों और टेबल टेनिस खिलाड़ियों के लिए एक ऐसा मैदान होता था जहां उनका दबदबा लगभग तय माना जाता था. यहां पदक जीतकर खिलाड़ी आत्मविश्वास हासिल करते थे, जो उन्हें विश्व चैम्पियनशिप और ओलंपिक जैसी बड़ी प्रतियोगिताओं में काम आता था. हालांकि, भारतीय खेल प्रेमियों के लिए एक राहत की बात यह जरूर है कि इसी साल सितंबर में ‘एशियाई खेल’ (Asian Games) का आयोजन होने वाला है. यानी खेल प्रेमियों को अपने पसंदीदा सितारों जैसे पीवी सिंधु, मनु भाकर और भारतीय हॉकी टीम को एक्शन में देखने के लिए बहुत ज्यादा लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा.









