सहारनपुर: सहारनपुर शहर जो कि उत्तर प्रदेश का अंतिम जनपद है और तीन राज्यों हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड की सीमा से लगता है, इस शहर को स्मार्ट सिटी में आए हुए 7 से 8 साल हो चुके हैं. स्मार्ट सिटी के चयन के आखिरी चरण में सहारनपुर स्मार्ट सिटी में चयनित किया गया था, उसके बाद से इसको लगातार स्मार्ट बनने का काम किया जा रहा है. लेकिन क्या स्मार्ट सिटी में आने के बाद सहारनपुर स्मार्ट हो पाया है. कई सवाल आज भी शहरवासियों की जुबान पर हैं. स्मार्ट सिटी के तहत सहारनपुर शहर में क्या विकास होना था और क्या वाकही में ये हो पाया है, इस चीज का सवाल भी यहां के लोग ढूंढ रहे हैं.
वहीं स्मार्ट सिटी में बहुत सारी ऐसी चीज हैं, जो यहां के लोगों को भी स्मार्ट बनने का काम करती हैं. आज तक यहां पर लोगों को उपलब्ध हो पाई है या नहीं, उसको लेकर भी लोगों ने अपनी अलग-अलग राय रखी है. मगर आखिर में सवाल यही उठता है कि क्या वाकई में स्मार्ट सिटी कहा जाने वाला सहारनपुर स्मार्ट हुआ है या नहीं, क्या यहां के लोग स्मार्ट हुए हैं या नहीं, उसी को लेकर के सहारनपुर की जनता क्या कुछ कहती है, जरा सुनिए.
मंत्री के आते ही चमक जाती है रोड
प्रदीप कुमार ने लोकल 18 से बात करते हुए बताया कि स्मार्ट सिटी जो है, सिर्फ कोर्ट रोड ही दिख रहा है. आज भी बहुत सारे मोहल्ले ऐसे हैं, ना तो वहां नालियां बनी हैं, न सीवर ही बने हैं. आज भी शहर के कई कोने विकास से वंचित हैं. स्मार्ट सिटी में कोई मंत्री आ जाए तो रोड एकदम से सज जाता है, बस कोर्ट रोड है स्मार्ट सिटी और कुछ भी नहीं है. कोर्ट रोड पर तो बहुत बढ़िया काम हुआ है, लेकिन इन्होंने हकीकत नगर का जो रोड बना दिया है, वहां इन्होंने फुटपाथ तो बड़ा कर दिया है, सड़क बहुत छोटी कर दी, जिसकी वजह से आए दिन जाम लग जाते हैं.
सड़क पर झूल रहे तार
रविंद्र तिवारी ने लोकल 18 से बात करते हुए बताया कि अभी तक तो मुझे स्मार्ट सिटी का डेफिनेशन ही नहीं समझ आया है. मुझे पता नहीं ये लोग कौन-सी योजना के तहत शहर को स्मार्ट बनाना चाहते हैं. स्मार्ट का मतलब हम समझते हैं कि बिना तार का शहर, लेकिन यहां तो सड़क तार झूली रहे, आप दिखाइए कैमरा घुमाके, हर पोल पर तार घूमा रहे हैं और झूल रहे हैं. कई बार तो लटके हुए तार गले में फंस जाते हैं. सिटी बस चलती है, तो वो तो अभी दूर की बात है. सड़कें अच्छी हो, तो सड़कों का हाल आप नीचे देख सकते हैं. स्मार्ट सिटी की अभी तक परिभाषा समझ नहीं आई है.
सुशील कुमार ने लोकल 18 से बात करते हुए बताया कि इन्होंने अपनी तरफ से बहुत कुछ करा, लेकिन अगर मेरे लिहाज से पूछो तो स्मार्ट नहीं बनाया, स्मार्ट सिटी से बदतर कर दिया है. जो भी इन्होंने काम किया, वो सब पैसा मिट्टी में जा रहा है. बिल्कुल फालतू पैसा खर्च किया है. स्मार्ट सिटी में अच्छी सड़कें चौड़ी होना, भीड़ कम करना, सिटी बसें चलना, इसे स्मार्ट कहते हैं और यहां एक भी काम अगर स्मार्ट वाला दिख रहा हो.
टाइल लगने के बाद याद आया काम
संजय तिवारी ने लोकल 18 से बात करते हुए बताया कि मैं जन्म से यहीं पर हूं. स्मार्ट तो कुछ नहीं हो पाया है, लेकिन हां काम हुआ है ये मानते हैं. लेकिन जिस तरीके से काम होना चाहिए था, वो उस तरीके से नहीं हुआ. कारण क्या है कि कोई भी विजन किसी के पास नहीं है कि हमें काम क्या करना है और किस तरीके से करना है. कहीं पर रोड खुद जाता है, फिर थोड़ी देर के बाद उसके ऊपर टाइलें बिछ जाती हैं, फिर उसके बाद टाइलें उखड़ भी जाती हैं, फिर उसके बाद फिर पाइप डालना शुरू कर देते हैं. ये काम एक बार में ही क्यों न हो जाए कि पहले जिसको जो करना है वो कर लो.
उन्होंने कहा कि अब हमारी ही दुकान के सामने ये टाइलें लगी हैं. टाइलें लगने के बाद उन्हें पता लगा कि भाई ये तो पाइप हमने कनेक्ट ही नहीं किया. फिर उन्होंने उसे खोदा. पहले उसे सिमेंट और कंक्रीट डालकर उसके ऊपर टाइलें लगा दीं, बहुत अच्छा लग रहा था. फिर उन्होंने उसकी खुदाई कर ली. खुदाई करने के बाद में फिर उसके बाद नॉर्मल टाइलें रख दी. बरसात आई, सारी दब गई हैं और वहां तक आप चेक कीजिए, एकदम हर जगह टाइलें दबी हुई हैं, लोग गिरकर चोटिल भी हो रहे हैं. धरातल पर कुछ नहीं हो रहा है. बस लोगों को लगता है कि काम हो रहा है.

