नई दिल्ली. यह कहानी सिर्फ एक पेनल्टी मिस करने की नहीं है. यह कहानी है उस बोझ की, जिसे एक इंसान ने बत्तीस सालों तक अपने कंधों पर ढोया. यह कहानी है उस ‘दिव्य दैवीय चोटी’ वाले जादूगर की, जिसने एक पूरे देश को मुकम्मल ख्वाब दिखाया, लेकिन खुद अधूरेपन के एक अंतहीन समंदर में डूब गया. साल 1994, अमेरिका की तपती गर्मी. फुटबॉल का महाकुंभ यानी फीफा वर्ल्ड कप अपने पूरे शबाब पर था. इटली की टीम लड़खड़ा रही थी. ग्रुप स्टेज में उनका प्रदर्शन ऐसा नहीं था कि कोई उन पर दांव लगा सके. लेकिन नॉकआउट स्टेज शुरू होते ही नीली जर्सी में नंबर 10 का एक जादूगर जागा. नाम था रॉबर्टो बैजियो. जो अपनी एक गलती के लिए आज भी वर्ल्ड कप में अपने देशवासियों और फैंस से मांफी मांगते हैं.
राउंड ऑफ 16 में नाइजीरिया के खिलाफ जब इटली हार की कगार पर था, तब 88वें मिनट में रॉबर्टो बैजियो (Roberto baggio) का वह गोल आज भी इतिहास की किताबों में दर्ज है. इसके बाद क्वार्टर फाइनल में स्पेन और सेमीफाइनल में बुल्गारिया के खिलाफ बैजियो के पैर नहीं, बल्कि उनका आत्मबल बोल रहा था. नॉकआउट स्टेज में अकेले 5 गोल दागकर उन्होंने पूरी इटली को अपने कंधों पर उठा लिया था. वह सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं थे. वह इटली के लिए एक मसीहा, एक उम्मीद और साक्षात चमत्कार बन चुके थे।.उनके जादुई खेल के दम पर इटली फाइनल में पहुंच चुका था, जहां उनका सामना था ताकतवर ब्राजील से.
रॉबर्टो बैजियो आज भी विश्व कप में लोगों से माफी मांगते हैं.
17 जुलाई 1994, कैलिफोर्निया का रोज़ बाउल स्टेडियम. करीब 94 हजार दर्शकों से खचाखच भरा मैदान और दुनिया भर में टीवी स्क्रीन से चिपके करोड़ों लोग. मुकाबला सिर्फ दो टीमों का नहीं था, मुकाबला था दो फुटबॉल संस्कृतियों का. 90 मिनट का नियमित समय और उसके बाद 30 मिनट का एक्स्ट्रा टाइम. दोनों टीमों के डिफेंडर्स ने अपनी जान लगा दी। स्कोर बोर्ड पर 0-0 का सन्नाटा पसरा रहा। धूप ढल रही थी, और उसके साथ ही बढ़ रही थी धड़कनें. फुटबॉल इतिहास में पहली बार वर्ल्ड कप के विजेता का फैसला ‘पेनल्टी शूटआउट’ से होना था. शूटआउट का रोमांच अपनी चरम सीमा पर था. इटली की तरफ से कुछ चूकें हो चुकी थीं, और ब्राजील बढ़त बना चुका था. अब पूरा दारोमदार इटली के अंतिम पेनल्टी टेकर पर था.
वो एक पल… जिसने वक्त को रोक दिया
मैदान पर सन्नाटा छा गया. रोबर्टो बैजियो ने गेंद उठाई, उसे चूमा और स्पॉट पर रख दिया. उनके चेहरे पर थकान साफ दिख रही थी, लेकिन आंखों में एक पूरे देश की उम्मीदें तैर रही थीं. अगर वह गोल करते, तो इटली की उम्मीदें जिंदा रहतीं. अगर चूके, तो ब्राजील विश्व विजेता बन जाता. बैजियो ने गहरी सांस ली. वह पीछे हटे. रेफरी की सीटी बजी. बैजियो दौड़ पड़े. उन्होंने अपने दाहिने पैर से गेंद को हिट किया. लेकिन… यह क्या हुआ? वह गेंद, जो पूरे टूर्नामेंट में बैजियो के इशारों पर नाचती थी, इस बार हवा में बहुत ऊपर उठ गई. वह रोज बाउल स्टेडियम की सूखी घास को छोड़ती हुई, ब्राजीलियाई गोलकीपर ताफारेल के हाथों से बहुत दूर, सीधे क्रॉसबार के ऊपर से आसमान में खो गई.
‘मैं चूक गया, वह घाव आज भी हरा है’
ब्राजील की टीम खुशी से पागल होकर मैदान पर दौड़ पड़ी. ब्राजीलियाई प्रशंसक नाचने लगे. लेकिन उस शोर के बीच, समय जैसे रोबर्टो बैजियो के लिए वहीं ठहर गया. बैजियो हिले तक नहीं. वह अपने दोनों हाथों को कमर पर रखे, सिर झुकाए, वहीं खड़े रहे. उनके बाल हवा में उड़ रहे थे, लेकिन उनका वजूद जैसे सुन्न हो चुका था.वह छवि फुटबॉल के इतिहास की सबसे मार्मिक और दिल तोड़ देने वाली तस्वीरों में से एक बन गई एक ऐसा नायक, जो अपनी ही सफलता के बोझ तले ढह गया था. रॉबर्टो बैजियो ने कहा, ‘ मैंने अपने सपनों में कई बार इस पेनल्टी को मारा था, और हर बार मैंने गोल किया था.लेकिन हकीकत में, मैं चूक गया. वह घाव आज भी हरा है.’
32 साल बाद भीह बैजियो का वह दर्द आज भी वैसा ही है
आज इस घटना को तीन दशक से ज्यादा का समय बीत चुका है. 2026 की इस दुनिया में फुटबॉल बहुत बदल चुका है, लेकिन बैजियो का वह दर्द आज भी वैसा ही है. जब भी उनसे उस मैच के बारे में पूछा जाता है, उनकी आंखें नम हो जाती हैं. वह आज भी हर इतालवी प्रशंसक से माफी मांगते हैं. वह अपनी शानदार विरासत, अपनी जादुई ड्रिबलिंग, और उन अनगिनत खूबसूरत पलों को भूल जाते हैं, और खुद को सिर्फ उस एक ‘मिस’ के लिए दोषी मानते हैं. लेकिन फुटबॉल प्रेमी जानते हैं कि सच क्या है. फुटबॉल एक क्रूर खेल हो सकता है, लेकिन यह उन लोगों को कभी नहीं भूलता जिन्होंने इसके लिए अपना खून-पसीना बहाया. अगर बैजियो न होते, तो इटली कभी उस फाइनल तक पहुंच ही नहीं पाता. वह पांच गोल न होते, तो रोम की सड़कों पर कभी जश्न के गीत न गाए जाते. एक छूटी हुई पेनल्टी उस इंसान की महानता को कभी कम नहीं कर सकती जिसने करोड़ों दिलों को धड़कना सिखाया था.
‘फुटबॉल जिंदगी और मौत का मामला नहीं है’
लिवरपूल के महान मैनेजर बिल शैंकली ने कभी कहा था, ‘फुटबॉल जिंदगी और मौत का मामला नहीं है, यह उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. लेकिन बैजियो की कहानी हमें सिखाती है कि फुटबॉल इंसानी जज्बातों का आईना है. हम दिग्गजों को इसलिए याद नहीं रखते कि वे कभी हारे नहीं, बल्कि इसलिए याद रखते हैं क्योंकि उन्होंने हमें हार और जीत के परे जाकर जीना सिखाया.
‘वही गिरते हैं, जो आसमान छूने की हिम्मत रखते हैं’
रॉबर्टो बैजियो, आपने जो दर्द झेला है, वह आपकी कमजोरी नहीं, आपका ताज है. क्योंकि केवल वही गिरते हैं, जो आसमान छूने की हिम्मत रखते हैं. इटली और फुटबॉल की दुनिया आपको उस एक पेनल्टी के लिए नहीं, बल्कि उस असीम जादुई सफर के लिए ताउम्र याद रखेगी.






