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देश की सेवा करते हुए 2006 में सर्च अभियान के दौरान जम्मू कश्मीर के पुंछ इलाके में आतंकियों के द्वारा बिछाए गए लैंड माइंस ब्लास्ट में वो गंभीर रूप से घायल हो गए थे. इस घटना में उन्हें अपना दाहिना पैर गंवाना पड़ा था. एक पैर नहीं होने के बावजूद उन्होंने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दी बल्कि साहस वीरता का परिचय देते हुए सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचे.

बिहार के गया जिले के सोमन राणा ग्लासगो 2026 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय टीम की ओर से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे. इस उपलब्धि से पूरे राज्य में खुशी और गर्व का माहौल है. 23 जुलाई से 3 अगस्त 2026 तक स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों में सोमन राणा पैरा एथलेटिक्स में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे.

44 साल के सोमन राणा भारतीय सेना में सूबेदार हैं. देश की सेवा करते हुए 2006 में सर्च अभियान के दौरान जम्मू कश्मीर के पुंछ इलाके में आतंकियों के द्वारा बिछाए गए लैंड माइंस ब्लास्ट में वो गंभीर रूप से घायल हो गए थे. इस घटना में उन्हें अपना दाहिना पैर गंवाना पड़ा था, इस घटना के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और देश सेवा के लिए फिर से कैंप लौट आए थे.

एक पैर नहीं होने के बावजूद उन्होंने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दी बल्कि साहस वीरता का परिचय देते हुए सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचे. खेल में उन्होंने बड़ी उपलब्धि प्राप्त की, वह भारत के सीटिंग पैरा शॉट पुट थ्रो खिलाड़ी हैं और अब उनका कॉमनवेल्थ गेम 2026 के लिए चयन हुआ है.
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सोमन राणा का संबंध गयाजी के लक्खीबाग मोहल्ले से है, पिता सोन बहादुर राणा एक किसान हैं. घर की आर्थिक स्थिति एक साधारण किसान परिवार के ही तरह थी, जब तक खेती बाड़ी नहीं होती घर परिवार के लालन-पालन में कठिनाई होती थी, सोमन राणा ने शिक्षा गया से ही प्राप्त की थी.

पिता का सपना था कि बेटा पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी प्राप्त करे. उनकी तरफ से कोई जोर नहीं था कि वह किस कार्य क्षेत्र में जाएं. बस इतना था कि वह सरकारी नौकरी ही हासिल करें और उन्होंने ने अपनी मेहनत से कर भी दिखाया था, वो भारतीय सेना में सिपाही के पद पर बहाल हुए थे.

उन्होंने पहली बड़ी उपलब्धि 2023 में चीन में आयोजित एशिया पैरालंपिक गेम्स में हासिल की, तब चीन में सिल्वर मेडल जीत कर देश का नाम रोशन किया था. जबकि 2025 में खेलो इंडिया गेम्स में उन्होंने गोल्ड मेडल अपने नाम किया था. इससे पहले 2024 पेरिस पैरालंपिक में वे पांचवें स्थान पर थे.

सोमन बताते हैं कि बचपन से खेल में कोई दिलचस्पी नहीं थी, पढ़ाई के साथ माता-पिता के लिए खेती किसानी के कार्यों में मदद करते थे, मगर जब देशसेवा के दौरान घायल हो कर एक पैर खोना पड़ा तब साल 2012 में भारतीय सेना के कुछ पैरा खिलाड़ियों से हमारी मुलाकात हुई, उन पैरा खिलाड़ियों ने मेरे जोश जज्बे को देख लिया था. उन पैरा खिलाड़ियों ने मुझे पैरा प्लेयर्स बनने के लिए प्रेरित किया. जिसके बाद उन्होंने अपने बटालियन के अधिकारियों और हेडक्वार्टर के सहयोग से पुणे में स्थित आर्मी पैरालंपिक नोड से संपर्क करके वहां प्रशिक्षण के लिए गए. वहां की ट्रेनिंग से आज इस मुकाम पर पहुंचे.






