संवाददाता@संदीप अग्रहरी..(एक्सक्लूसिव खबर)

क्या पत्थर भी मानसून के आने की खबर दे सकते हैं? म्योरपुर ब्लॉक क्षेत्र की रासपहरी और मधुबन की मुरगुड़ी पहाड़ियों पर स्थित प्राचीन मेगालिथ (महापाषाण) स्थल से जुड़ी आदिवासी परंपरा कुछ ऐसा ही दावा करती है। स्थानीय आदिवासी समुदाय का मानना है कि बारिश से पहले यहां मौजूद विशाल पत्थरों की सतह पर नमी उभरने लगती है और यही अच्छी वर्षा का संकेत होता है।
स्थानीय आदिवासी बुजुर्ग रामवृक्ष गोंड, बेचन, सूरजमन, धन सिंह और मोहर शाह बताते हैं कि मानसून आने से पहले सुबह के समय इन पत्थरों पर महीन जल-बूंदें, काई में बढ़ी नमी और रंग में हल्का बदलाव दिखाई देता है। ग्रामीण इसे पत्थरों का “पसीजना” कहते हैं। उनके अनुभव के अनुसार, ऐसा होने के कुछ दिनों के भीतर अच्छी बारिश होती है। यह पारंपरिक ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से सुरक्षित रखा गया है।
दिलचस्प बात यह है कि इस लोकविश्वास को वैज्ञानिक दृष्टि से भी पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। भू-विज्ञान विशेषज्ञों का मानना है कि वातावरण में नमी बढ़ने, स्थानीय सूक्ष्म जलवायु, तापमान में परिवर्तन और चट्टानों की संरचना के कारण उनकी सतह पर संघनन (कंडेनसेशन) की प्रक्रिया हो सकती है। यह मानसून के निकट आने का संकेत भी माना जा सकता है।

हालांकि, विशेषज्ञ इस विषय पर विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता भी बताते हैं। रासपहरी और मधुबन की मुरगुड़ी पहाड़ियों पर स्थित यह प्राचीन मेगालिथिक स्थल केवल पुरातात्विक धरोहर ही नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के प्रकृति-आधारित पारंपरिक ज्ञान का भी जीवंत उदाहरण है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी विरासत का संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन भविष्य में मौसम संबंधी स्थानीय ज्ञान को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।





