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उनके द्वारा शारीरिक प्रशिक्षण पाए पचास से अधिक अभ्यर्थी बिहार पुलिस, आर्मी सहित विभिन्न सेवाओं में अपनी जगह बना चुके हैं. बिना किसी बड़े संसाधन या सरकारी सहयोग के अरुण अपने खेल को आगे बढ़ा रहे हैं. उनकी मेहनत अब आसपास के खिलाड़ियों के लिए एक मिसाल बन गया है. अरुण का कहना है कि उनका सपना एशियाड और ओलंपिक में पदक जीतकर देश और राज्य का नाम रोशन करना है, लेकिन इसके लिए उन्हें उचित सहयोग और संसाधनों की जरूरत है.
जमुई. जिले के खैरा प्रखंड क्षेत्र के खैरा बाजार निवासी महेश प्रसाद मोदी के 22 वर्षीय पुत्र अरुण कुमार मोदी ने एक बार फिर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हुए झारखंड की राजधानी रांची स्थित बिरसा मुंडा स्टेडियम में आयोजित इंडियन एथलेटिक्स सीरीज 4 में कांस्य पदक हासिल किया है. जैवलिन थ्रो प्रतियोगिता में अरुण ने 64.22 मीटर भाला फेंक कर यह उपलब्धि अपने नाम की. इस प्रतियोगिता में देशभर से कई दिग्गज खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था, लेकिन सीमित संसाधनों के बावजूद अरुण ने शानदार प्रदर्शन कर अपनी अलग पहचान बना ली. उनकी इस सफलता से परिवार में खुशियों का माहौल है.
अरुण कुमार मोदी केवल एक खिलाड़ी ही नहीं बल्कि एक प्रेरणास्रोत भी हैं. खैरा बाजार में वह खुद का ट्रेनिंग सेंटर चलाते हैं, जहां से प्रशिक्षण प्राप्त कर आधा दर्जन से अधिक खिलाड़ी नेशनल और अन्य स्तर की प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन कर चुके हैं. इसके अलावा उनके द्वारा शारीरिक प्रशिक्षण पाए पचास से अधिक अभ्यर्थी बिहार पुलिस, आर्मी सहित विभिन्न सेवाओं में अपनी जगह बना चुके हैं. बिना किसी बड़े संसाधन या सरकारी सहयोग के अरुण अपने खेल को आगे बढ़ा रहे हैं. उनकी मेहनत अब आसपास के खिलाड़ियों के लिए एक मिसाल बन गया है.
बचपन से ही रही है कई सारी मुश्किलें
हालांकि, इतनी उपलब्धियों के बावजूद अरुण की राह आसान नहीं रही है. अरुण बताते हैं कि उनका जन्म एक बेहद सामान्य परिवार में हुआ. जहां आर्थिक तंगी उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आई. अरुण साल 2011 से एथलेटिक्स के क्षेत्र में सक्रिय हैं. अरुण अब तक नेशनल गेम्स, ईस्ट जोन गेम्स सहित कई नेशनल और राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में दो दर्जन से अधिक मेडल जीत चुके हैं. उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन को देखते हुए बिहार सरकार के खेल मंत्रालय ने साल 2013 में उन्हें बिहार खेल सम्मान से भी नवाजा था. बावजूद इसके खेल सामग्री और संसाधनों की कमी के कारण उन्हें आज अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए दुकान चलानी पड़ रही है.
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