नई दिल्ली. हिंदी सिनेमा में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिन्हें देखते ही चेहरे पर अपने आप एक सुकून भरी मुस्कान आ जाती है. अभिनेता संजय मिश्रा इसी फेहरिस्त में एक ऐसा नाम हैं, जिनकी मौजूदगी मात्र से फिल्म में एक अलग ही जान आ जाती है. ‘गोलमाल’, ‘धमाल’, ‘वध’, ‘भूल भुलैया’ और ‘आंखों देखी’ जैसी शानदार फिल्मों में एक से बढ़कर एक किरदार निभाने वाले संजय मिश्रा आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. उनका किरदार चाहे पर्दे पर कुछ मिनटों का ही क्यों न हो, वह अपनी बेजोड़ अदाकारी से उस रोल को हमेशा के लिए अमर बना देते हैं. लेकिन, उनका यह मुकाम हासिल करना और इस मुकाम तक पहुंचना किसी फिल्मी कहानी से कम रोमांचक नहीं रहा है.
संजय मिश्रा का जन्म 6 अक्टूबर 1963 को हुआ था और उनका शुरुआती जीवन उत्तर प्रदेश के धार्मिक शहर वाराणसी में बीता. कला के प्रति उनका रुझान उन्हें देश के प्रतिष्ठित संस्थान, दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) तक ले गया. यहां उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखीं और साल 1989 में अपना ग्रेजुएशन पूरा किया. इसके बाद उन्होंने थिएटर और छोटे पर्दे के जरिए अपनी अभिनय के सफर की शुरुआत की.
संजय मिश्रा ने दी कई क्लासिक फिल्में
सिल्वर स्क्रीन पर उनका सफर फिल्म ‘ओह डार्लिंग! ये है इंडिया!’ से शुरू हुआ था. इसके बाद वह ‘सत्या’, ‘दिल से..’, ‘वजूद’ और ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ जैसी फिल्मों में छोटे-छोटे किरदारों में नजर आए. धीरे-धीरे इंडस्ट्री में उनकी पहचान एक ऐसे मंजे हुए अभिनेता के रूप में बनने लगी, जो हरफनमौला अंदाज में किसी भी किरदार को जी सकता है.
निजी जिंदगी में आ गया था भूचाल
करियर की गाड़ी जब तेजी से पटरी पर दौड़ रही थी, तभी संजय मिश्रा की निजी जिंदगी में एक ऐसा भूचाल आया जिसने उन्हें अंदर से पूरी तरह तोड़ कर रख दिया. उनके पिता का निधन हो गया, जिनका उनके जीवन में बहुत बड़ा स्थान था. पिता के जाने के गहरे सदमे को वो सहन नहीं कर पाए और उन्होंने अभिनय की दुनिया से हमेशा के लिए किनारा करने का फैसला कर लिया.
एक्टिंग छोड़ ढाबे पर करने लगे थे काम
मुंबई की चकाचौंध, फिल्मों की चकाचौंध और ग्लैमर की दुनिया से दूर वो सीधे ऋषिकेश चले गए. यहां उन्होंने अपनी पहचान को पीछे छोड़ दिया और जीवनयापन के लिए एक साधारण ढाबे पर काम करना शुरू कर दिया. इस ढाबे पर वह आम लोगों के लिए ऑमलेट बनाने का काम करते थे. वह दौर उनके लिए बेहद कठिन और संघर्षपूर्ण था, जहां वह भीड़भाड़ और इंडस्ट्री के शोर से दूर गुमनाम जिंदगी जी रहे थे.
इस दौरान एक दिलचस्प वाकया यह भी हुआ कि उस ढाबे पर आने वाले कुछ लोग उन्हें पहचान लेते थे. लोग उनसे हैरानी से पूछते थे कि क्या आप वही अभिनेता हैं जिन्होंने ‘गोलमाल’ में काम किया है? हालांकि, संजय मिश्रा अपनी असली पहचान उजागर नहीं करना चाहते थे, इसलिए वह बात टाल देते थे और मजाक में कहते थे कि वह उस मशहूर अभिनेता के हमशक्ल भर हैं. वह खुद को उस चकाचौंध से पूरी तरह काट चुके थे.
रोहित शेट्टी ने चमकाई किस्मत
संजय मिश्रा ने भले ही खुद को एक्टिंग से अलग कर लिया था, लेकिन शायद उनकी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. कहते हैं न कि प्रतिभा कभी छिप नहीं सकती. फिल्म डायरेक्टर रोहित शेट्टी ने उन्हें एक बार फिर फिल्मों में लौटने के लिए मनाया और उन्हें फिल्म ‘ऑल द बेस्ट’ में काम करने का मौका दिया. इस एक फैसले ने संजय मिश्रा की जिंदगी की गाड़ी को एक बार फिर से ट्रैक पर ला खड़ा किया.
30 साल में जीता पहला नेशनल अवॉर्ड
संजय मिश्रा को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में हिंदी फिल्म ‘भक्षक’ के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है. फिल्म में उन्होंने फोटो जर्नलिस्ट का किरदार अदा किया था. 30 साल के लंबे करियर में ये संजय मिश्रा का पहला नेशनल अवॉर्ड है.

