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मशहूर एक्ट्रेस संध्या ने वी. शांताराम की फिल्म ‘अमर भूपाली’ से डेब्यू किया था, जिनकी फिल्मी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सराही गई. उन्होंने फिल्मों में किसी बॉडी डबल के खतरनाक सीन भी किए. उन्होंने निर्देशक वी. शांताराम से शादी के बाद सिर्फ उनके ही विजन पर काम किया. उन्होंने 1970 के दशक के अंत में एक्टिंग से संन्यास ले लिया. आइए, एक्ट्रेस की पुण्यतिथि पर उनकी जिंदगी को थोड़ा और करीब से जानें.
नई दिल्ली: एक्ट्रेस संध्या का असली नाम विजया देशमुख था. वे 27 सितंबर 1938 को कोच्चि में जन्मी थीं. उनका परिवार थिएटर से ताल्लुक रखता था, जिसने उनके भीतर कला के बीज बोए. बेहतर करियर अवसरों की तलाश में वह अपनी बहन वत्सला देशमुख के साथ बंबई आ गईं. उनका सिनेमाई सफर तब शुरू हुआ, जब उन्होंने मशहूर फिल्म निर्माता वी. शांताराम की 1951 की मराठी फिल्म ‘अमर भूपाली’ के लिए एक समाचार पत्र के विज्ञापन का जवाब दिया. (फाइल फोटो)
ऑडिशन के वक्त शांताराम उनकी खास आवाज से बेहद प्रभावित हुए, जो उनकी दूसरी पत्नी और मशहूर अभिनेत्री जयश्री से काफी मिलती-जुलती थी. इसी फिल्म के साथ विजया को उनका नया सिनेमाई नाम ‘संध्या’ मिला. फिल्म में संध्या ने ‘गुणवती’ का किरदार निभाया और यह संगीतमय फिल्म इतनी सफल रही कि इसे 1952 के कान्स फिल्म फेस्टिवल में ‘पाल्मे डी ओर’ के लिए नॉमिनेट किया गया.
(फाइल फोटो)
संध्या अपने करियर की शुरुआत में कोई ट्रेंड डांसर नहीं थीं. उन्होंने साल 1955 की रंगीन फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ के लिए मशहूर नर्तक गोपी कृष्ण के साथ तालमेल बिठाने के लिए महीनों तक ट्रेनिंग ली. इस फिल्म में ‘नीला’ के रूप में उनका शिव तांडव और भावपूर्ण प्रदर्शन उनके असाधारण मेहनत का प्रमाण है. 1955 में हिंदी फिल्म झनक झनक पायल बाजे को नेशनल अवॉर्ड मिला. (फाइल फोटो)
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संध्या ने फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ में ‘चंपा’ नाम की एक खिलौने बेचने वाली महिला की भूमिका निभाई. यह फिल्म इतनी प्रभावशाली थी कि इसे बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सिल्वर बियर अवॉर्ड मिला. हॉलीवुड फॉरेन प्रेस ने उन्हें सैमुअल गोल्डविन अवॉर्ड से सम्मानित किया. (फाइल फोटो)
फिल्म के गीत ‘सैयां झूठों का बड़ा सरताज निकला’ में सिर पर टोकरी का संतुलन, हाथ में ‘रावणहत्था’ वाद्ययंत्र और चलते हुए जटिल भाव-भंगिमाएं उनके मल्टीटास्किंग स्किल को दर्शाती हैं. सिनेमा के प्रति संध्या का जुनून सिर्फ डांस मुद्राओं तक सीमित नहीं था. उन्होंने 1961 में आई फिल्म ‘स्त्री’ में असली शेरों के साथ अभिनय करने के लिए ट्रेनर्स के साथ रहकर उनकी एक्टिविटी को समझा और बिना किसी ‘बॉडी डबल’ के खतरनाक सीन फिल्माए.
(फाइल फोटो)
संध्या ने लगभग 40 साल की आयु में ‘चंद्रकला’ नाम की एक तमाशा नर्तकी की बोल्ड भूमिका निभाई, जो एक आदर्शवादी स्कूल मास्टर के पतन का कारण बनती है. फिल्म ने महाराष्ट्र के पारंपरिक ‘लावणी’ लोक डांस को दर्शकों तक पहुंचाया. गीत ‘मला लागली कुणाची उचकी’ में शानदार परफॉर्मेंस ने उन्हें बेस्ट एक्ट्रेस का फिल्मफेयर (मराठी) अवॉर्ड मिला. 1975 में ‘चंदनाची चोली अंग अंग जाली’ के लिए उन्हें दोबारा यह पुरस्कार मिला.
(फाइल फोटो)
संध्या और वी. शांताराम का विवाह 22 दिसंबर 1956 को हुआ था. उन्होंने महबूब खान जैसे बड़े निर्देशकों के आकर्षक ऑफर भी ठुकरा दिए और अपना सारा करियर सिर्फ शांताराम के विजन को समर्पित किया. (फाइल फोटो)
संध्या ने 1970 के दशक के अंत में संन्यास लेने के बाद पब्लिक जीवन से लगभग पूरी तरह दूरी बना ली. 2009 में ‘नवरंग’ की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर वी. शांताराम अवॉर्ड सेरेमनी में उनकी मौजूदगी एक दुर्लभ घटना थी. उन्होंने जीवन के अंतिम सालों में राजकमल स्टूडियो में ही एक बेहद एकांत और शांत जीवन बिताया. 4 अक्टूबर 2025 को उम्र संबंधी बीमारियों के कारण उनका निधन हो गया और दादर के शिवाजी पार्क श्मशान घाट में उन्हें अंतिम विदाई दी गई. (फाइल फोटो)

