Haroda Assembly Seat: उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई ऐसी सीटें रही हैं जिन्होंने सूबे को मुख्यमंत्री दिए, लेकिन सहारनपुर की पुरानी हरोड़ा विधानसभा सीट का सियासी मिजाज बिल्कुल जुदा था. चुनावी सरगर्मियों के बीच प्रचार के दावों से परे जब भी बसपा के स्वर्णिम दौर का जिक्र होता है, तो हरोड़ा सीट का नाम सबसे ऊपर आता है. आज सहारनपुर देहात के नाम से पहचानी जाने वाली यह सीट कभी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के लिए सबसे ‘लकी’ मानी जाती थी. सियासी गलियारों में यह माना जाता था कि मायावती के लिए हरोड़ा की जीत सीधे लखनऊ की सत्ता की चाबी लेकर आती है. जब तक वह यहां से लड़ीं, अजेय रहीं और सत्ता के शीर्ष पर पहुंचीं. लेकिन जैसे ही इस सीट से उनकी सीधी चुनावी दूरी बनी, धीरे-धीरे पार्टी का जनाधार खिसकता गया और आज चार बार मुख्यमंत्री रहीं मायावती की पार्टी विधानसभा में शून्य पर सिमट गई है.
1996 और 2002: बिमला राकेश को 28 हजार वोटों से मात देकर बनीं मुख्यमंत्री
हरोड़ा और मायावती के चुनावी रिश्ते की शुरुआत बेहद असरदार रही. साल 1996 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने पहली बार हरोड़ा सीट से ताल ठोकी थी. वरिष्ठ पत्रकार सैयद मशकूर के अनुसार, इस चुनाव में मायावती को करीब 50 फीसदी वोट मिले थे. उन्होंने समाजवादी पार्टी की प्रत्याशी बिमला राकेश को करीब 28 हजार मतों के बड़े अंतर से पराजित किया था. इस ऐतिहासिक जीत के कुछ ही महीनों बाद मायावती गठबंधन सरकार के तहत उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. हालांकि बाद में सरकार गिरने पर मायावती ने विधानसभा से इस्तीफा दे दिया और उपचुनाव में उनके प्रतिनिधि के तौर पर जगपाल सिंह पहली बार बसपा के टिकट पर विधायक चुने गए.
इसके बाद साल 2002 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने दोबारा हरोड़ा का रुख किया. परिणाम फिर वही रहा बसपा सुप्रीमो ने एक बार फिर सपा उम्मीदवार बिमला राकेश को लगभग 28 हजार वोटों से शिकस्त दी और जीत के बाद दोबारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुईं. बाद में जब मायावती ने इस सीट से इस्तीफा दिया, तो वर्ष 2003 के उपचुनाव में जगपाल सिंह को हार का सामना करना पड़ा.
2007 का पूर्ण बहुमत और हरोड़ा से दूरी: यहीं से शुरू हुआ उतार-चढ़ाव
साल 2007 का चुनाव यूपी की सियासत में ऐतिहासिक माना जाता है, जब बसपा ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई. इस चुनाव में मायावती खुद विधानसभा चुनाव नहीं लड़ीं, बल्कि विधान परिषद (एमएलसी) के रास्ते मुख्यमंत्री बनीं. उस दौर में हरोड़ा सीट पर बसपा के टिकट पर जगपाल सिंह ने शानदार जीत दर्ज की और पार्टी का परचम लहराया. मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती का सहारनपुर से गहरा भावनात्मक लगाव रहा. उन्होंने सहारनपुर को कमिश्नरी का दर्जा दिलाया, मेडिकल कॉलेज की स्थापना की (जिसे उस समय मान्यवर कांशीराम मेडिकल कॉलेज के नाम से शुरू किया गया था) और स्पोर्ट्स कॉलेज की घोषणा की.
इसके अलावा सहारनपुर की सबसे विकराल समस्या बिजली संकट से शहर को काफी हद तक निजात दिलाई. इस मजबूत पकड़ का असर चुनावी नतीजों में दिखा, साल 2002 और 2007 में जिले में बसपा के तीन-तीन विधायक रहे, जबकि 2012 में जिले की सात में से पांच विधानसभा सीटों पर बसपा ने शानदार जीत दर्ज की. पार्टी का जिले से यह लगाव नया नहीं था, खुद बसपा संस्थापक स्वर्गीय कांशीराम ने वर्ष 1988 में सहारनपुर से लोकसभा चुनाव लड़ा था, हालांकि वे दूसरे स्थान पर रहे थे. बाद में 2019 के आम चुनाव में भी बसपा ने यहां लोकसभा सीट जीती थी.
‘हरोड़ा’ बनी ‘सहारनपुर देहात’ और ढह गया दुर्ग
साल 2012 के परिसीमन में हरोड़ा विधानसभा सीट का स्वरूप बदला और यह सीट सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित होकर ‘सहारनपुर देहात’ के नाम से जानी जाने लगी. 2012 में पूरे प्रदेश में समाजवादी पार्टी की लहर होने के बावजूद बसपा के जगपाल सिंह ने यहां से लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की और पार्टी का झंडा बुलंद रखा. हालांकि, 2017 का विधानसभा चुनाव बसपा के लिए सहारनपुर में बड़ा झटका साबित हुआ. जिले की सभी सीटों पर पार्टी का खाता नहीं खुला. सहारनपुर देहात सीट पर जगपाल सिंह कांग्रेस के मसूद अख्तर से चुनाव हार गए. 2017 में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने बेहट, सहारनपुर देहात और सहारनपुर शहर सीट पर कब्जा जमाया, जबकि भाजपा ने गंगोह, नकुड़, रामपुर मनिहारान और देवबंद में जीत दर्ज की.
2017 के बाद से ही बसपा के भीतर भारी उथल-पुथल देखने को मिली. 2022 के चुनाव में भी बसपा खाता खोलने में नाकाम रही. वर्तमान में सहारनपुर देहात सीट पर समाजवादी पार्टी का कब्जा है और आशु मलिक यहां से विधायक हैं. वहीं, तीन बार के पूर्व विधायक जगपाल सिंह के हाल ही में बसपा छोड़कर भाजपा में शामिल हो जाने से जिले में बसपा के संगठन को एक और तगड़ा झटका लगा है. हरोड़ा की सियासी जमीन आज गवाही देती है कि जिस सीट ने कभी मायावती को सत्ता के शिखर तक पहुंचाया था, वहां आज बसपा अपने वजूद को बचाने के लिए नए सिरे से संघर्ष कर रही है.


