लखनऊ. यूपी चुनाव 2027 से पहले बीएसपी एक बाद एक चाल रही हैं. पहले भतीजे ईशान आनंद को बड़ी जिम्मेदारी दी और अब अपने पुराने वफादार को भी खुश कर दिया. मायावती ने बड़ा दाव खेलते हुए अपने सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार राजाराम को बसपा का नया कोऑर्डिनेटर नियुक्त किया है. समाजवादी पार्टी के ’27 हजार वोट बढाओ और घटाव’ फॉर्मूले और बीजेपी के आक्रामक प्रचार अभियान के बीच मायावती ने अपनी पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में बड़ा फेरबदल किया है. मायावती ने बहुजन आंदोलन के बेहद पुराने, शांत और विश्वस्त रणनीतिकार राजाराम को बसपा का नया राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर नियुक्त किया है. आइए राजराम किस जाति से आते हैं और यूपी चुनाव 2027 में जाटव-दलित वोटबैंक पर इसका क्या असर पड़ेगा?
मायावती का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दो दिन पहले ही उन्होंने अपने भतीजे ईशान आनंद को बड़ी जिम्मेदारी दी थी. मायावती ने तब स्पष्ट तौर पर कहा था कि ईशान आनंद, राजाराम के मार्गदर्शन में पार्टी की नीतियों, बहुजन विचारधारा और कैडर प्रबंधन के बारीक दांव-पेंच सीखेंगे.
राजाराम का ट्रैक रिकॉर्ड और संसदीय इतिहास
राजाराम बसपा के उन गिने-चुने वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं, जो लंबे समय से मीडिया की चकाचौंध से दूर रहकर जमीनी स्तर पर कैडर और संगठन को मजबूत करने में यकीन रखते हैं. राजाराम उत्तर प्रदेश से दो बार राज्यसभा के सदस्य रह चुके हैं. संसद में उनकी 89 प्रतिशत की उपस्थिति बता रही है कि वह कितने समर्पित और काम के प्रति निष्ठावान हैं. राजाराम की संसदीय अनुशासन और कर्तव्यों के प्रति निष्ठा को देखकर ही मायावती ने उन्हें बड़ी जिम्मेदारी दी है.
मायावती ने क्यों जताया ‘भूत, वर्तमान और भविष्य’ पर इतना भरोसा?
अगस्त 2026 में ही मायावती ने उन पर भरोसा जताते हुए मध्य प्रदेश, केरल, गुजरात और कर्नाटक राज्यों का संगठनात्मक प्रभार सौंपा था. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती द्वारा राजाराम को राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर बनाए जाने और ईशान आनंद के ‘राजनीतिक गुरु’ का दर्जा दिए जाने के पीछे तीन बड़े कारण हैं. पहला, बहुजन मूवमेंट और कैडर की गहरी समझ. राजाराम मान्यवर कांशीराम के दौर से बसपा के संगठन और विचारधारा से जुड़े रहे हैं. वे जानते हैं कि बसपा के पारंपरिक वोट बैंक और बामसेफ से जुड़े कैडर को कैसे दोबारा एकजुट किया जाए.
संगठनात्मक संतुलन और युवा नेतृत्व की ग्रूमिंग
दूसरा, मायावती अपने भतीजे आकाश आनंद और ईशान आनंद जैसे युवा चेहरों को आगे तो बढ़ा रही हैं, लेकिन उन्हें किसी भी प्रशासनिक या राजनीतिक गलती से बचाने के लिए राजाराम जैसे अनुभवी मेंटोर को उनके साथ लगाया गया है. राजाराम पार्टी के भीतर किसी गुटबाजी का हिस्सा नहीं रहे हैं. वे राज्यों में स्थानीय इकाइयों के बीच तालमेल बैठाने में माहिर माने जाते हैं.
यूपी चुनाव 2027 पर क्या पड़ेगा असर?
राजाराम की नियुक्ति का असर कैडर पर भी पड़ेगा. राजाराम दलित वर्ग से आते हैं. वह निष्क्रिय पड़े बसपा कैडर को दोबारा सक्रिय करने के लिए गांव-गांव ‘कैडर कैंप’ आयोजित करते रहे हैं. अन्य राज्यों से समन्वय मध्य प्रदेश, राजस्थान और दक्षिण भारत के राज्यों में बहुजन वोट बैंक को एकजुट कर राष्ट्रीय साख बचाना भी राजाराम के लिए बड़ी चुनौती होगी.
राजाराम बसपा के मूल दलित-पिछड़े जनाधार को सहेजने की जिम्मेदारी होगी. राजाराम को राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर की कमान सौंपकर मायावती ने साफ संदेश दे दिया है कि 2027 के यूपी चुनाव में बसपा केवल नारों पर नहीं, बल्कि अपने पुराने भरोसेमंद कैडर और अनुभवी रणनीतिकारों के दम पर मैदान में उतरेगी. अब देखना यह होगा कि राजाराम का यह अनुभव और संगठन कौशल बसपा को दोबारा मुख्य मुकाबले में कैसे वापस लाता है.
