नई दिल्ली: ‘What’s in a name’ नाम में क्या रखा है… अंग्रेजी नाटककार विलियम शेक्सपियर की यह लाइन अमर है. उनके इसी कथन को बिहार के झंडू कुमार ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में मेडल जीतकर चरितार्थ कर दिया है. झंडू ने पैरा वेटलिफ्टिंग में ब्रॉन्ज मेडल जीता है. झंडू कुमार की आज हर जगह चर्चा हो रही है. अखबार के पहले पन्ने पर झंडू कुमार की तस्वीर के साथ बड़े-बड़े अक्षरों में उनका नाम लिखा जा रहा है, लेकिन इसी नाम के कारण झंडू कुमार को न जाने कितने ही तानों और उपहास का सामना करना पड़ा है.
ग्लासगो में जारी कॉमनवेल्थ गेम्स में जब झंडू कुमार नाम गूंजा, तो यह अब ऐसा नाम नहीं था जो मजाक बने. यह वह नाम था जिसने भारत को कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में मेडल दिलाया था. झंडू कुमार बिहार के नालंदा जिले के हरनौत गांव के रहने वाले हैं. उन्होंने 181 किग्रा और 190 किग्रा के सफल प्रयासों से हैवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग में ब्रॉन्ज़ मेडल अपने नाम किया.
CWG मेडलिस्ट झंडू कुमार
झंडू ने बताई अपने नाम के पीछे की दर्दनाक कहानी
कॉमनवेल्थ गेम्स में मेडल जीतने के बाद झंडू कुमार ने भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के साथ बातचीत में कहा, “खुशी की कोई सीमा नहीं है. मैं कल रात से सो नहीं पाया हूं. जब मैं लेटता भी हूं तो नींद ही नहीं आती.” इसके साथ ही उन्होंने अपने नाम के पीछे की दर्दनाक कहानी भी बताई. झंडू ने बताया कि जब वह 5 साल के थे, तब उन्हें पोलियो हो गया था. इसी वजह से उनका नाम झंडू पड़ गया.
उन्होंने अपने नाम की कहानी बताते हुए कहा, “मेरे परिवार का कहना है कि मुझे 5 साल की उम्र में पोलियो हो गया था. मुझे घिसट-घिसट कर चलना पड़ता था. लोग मुझे ताने मारते थे. वे कहते थे कि अब जब यह विकलांग हो गया है तो क्या करेगा? मेरे घरवालों ने मेरे इलाज में अपनी पूरी जमापूंजी खत्म कर दी. रिश्तेदार और पड़ोसी मजाक उड़ाते हुए कहते थे कि आपके बेटे ने सब झंडू कर दिया, सब पैसा खत्म कर दिया.” समाज के इस ताने से मिला यह झंडू नाम हमेशा के लिए उनसे चिपक गया.
झंडू ने की थी नाम बदलने की कोशिश
झंडू कुमार ने कुछ समय के लिए अपना नाम बदलकर अविनाश कुमार कर लिया था, लेकिन एक सरकारी दफ्तर में जब वे किसी काम से गए, तो अधिकारियों ने बार-बार झंडू कुमार कहकर आवाज लगाई. उस घटना को याद करते हुए उन्होंने बताया, “अधिकारियों ने बार-बार झंडू कुमार पुकारने के बाद मुझे अंदर बुलाया और जब उन्होंने मेरे नाम की पुष्टि की, तो वे ठहाके मारकर हंस पड़े. फिर मैंने इससे भागने के बजाय इसे अपनाने का फैसला किया.”
झंडू कुमार
उन्होंने कहा, “मुझे लगा कि अगर मेरे नाम पर सब हंस रहे हैं तो यह नाम अच्छा ही है. अब हमारे सभी दस्तावेजों में यह झंडू कुमार ही है. इसलिए, अब अविनाश कुमार का कोई अस्तित्व नहीं रह गया है.”
ई-रिक्शा चलाकर की कॉमनवेल्थ की तैयारी
झंडू कुमार सिर्फ अपने नाम के कारण ही नहीं, अपनी आर्थिक स्थिति से भी परेशान रहे. सप्लीमेंट्स का खर्च उठाने और अपनी ट्रेनिंग जारी रखने के लिए झंडू ने करीब एक साल तक ई-रिक्शा चलाया. उन्होंने बताया, “मैंने अपनी डाइट के लिए ई-रिक्शा चलाया. मैंने सोचा कि मैं 200-400 रुपये कमाऊंगा और उससे सप्लीमेंट्स लेकर अपना जिम जारी रखूंगा.”
उन्होंने आगे बताया, “मैं शाम को जिम जाता था, लेकिन समस्या यह थी कि दिन भर ई-रिक्शा चलाने के बाद मैं थक जाता था, जिससे जिम का समय कम हो रहा था.” पोलियो के असर के कारण गाड़ी चलाना उनके लिए काफी कठिन था.
वेटलिफ्टर नहीं, शॉट पुटर बनना चाहते थे झंडू
झंडू कुमार के खेल करियर की शुरुआत भी लगभग इत्तेफाक से हुई थी. शुरुआत में वे एक शॉट पुटर थे, लेकिन बिहार के कोच कुंदन पांडे ने उनकी ताकत को पहचाना और उन्हें पैरा पावरलिफ्टिंग में जाने के लिए प्रेरित किया.
2022 में सुधीर को कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतते देखकर उनके मन में एक सपना जागा.
उन्होंने कहा, “जब हमारे जिम मालिक ने मुझे बताया कि सुधीर भाई ने 212 किग्रा वजन उठाकर कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीता है, तो मैंने कहा कि मैं भी ऐसा करूंगा. मैंने सोचा कि मुझे अपने देश के लिए यह करना है.” उन्होंने कहा, “मेरी शुरुआत हो चुकी है. आगे मेरे पास पैरा एशियन गेम्स और पैरालिंपिक हैं, जिनके लिए मुझे तैयारी करनी है. 232 किग्रा का एक रिकॉर्ड है, मैं उस रिकॉर्ड को तोड़ना चाहता हूं.”







