@जे0 के0…..
— स्वर्ण जयंती चौक के बदलते स्वरूप पर जनता का सवाल—जिस शहर की गलियां बदहाल हैं, वहां विकास की प्राथमिकता आखिर तय कौन कर रहा है?

Sonbhadra। कुछ जगहें सिर्फ ईंट-पत्थर से नहीं बनतीं, वे शहर की यादों का हिस्सा चौराहा चमकाने की तैयारी, गलियां अब भी इंतजार में!होती हैं। राबर्ट्सगंज स्वर्ण जयंती चौक भी ऐसा ही एक स्थान है। वर्षों से इस चौक ने शहर की धड़कन को महसूस किया है। सुबह की पहली हलचल से लेकर देर रात तक गुजरते वाहन, दुकानों की रौनक, लोगों की भीड़ और तमाम सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियां इस चौक को रॉबर्ट्सगंज की पहचान बनाती रही हैं।

लेकिन आज इसी चौक के बदलते स्वरूप को लेकर शहर में सवाल उठ रहे हैं, सवाल यह नहीं कि चौक सुंदर क्यों बनाया जा रहा है। सवाल यह है कि जब शहर की आम जनता रोज अपनी छोटी-बड़ी समस्याओं से जूझ रही है, तब विकास की प्राथमिकता किस आधार पर तय हो रही है?

नगर की कई गलियों में सड़क की हालत लोगों को परेशान करती है। कहीं नाली की समस्या है, कहीं जलनिकासी का संकट और कहीं रात होते ही अंधेरा लोगों की मुश्किल बढ़ा देता है। ऐसे में उस परिवार से पूछिए, जिसके घर के सामने की सड़क लंबे समय से खराब है और जिसे हर बरसात में कीचड़ और पानी से होकर गुजरना पड़ता है—उसके लिए शहर का चमकता हुआ चौराहा आखिर कितनी बड़ी राहत है?

उस बुजुर्ग से पूछिए, जिसे टूटी सड़क पर चलने में परेशानी होती है। उस महिला से पूछिए, जिसे अंधेरी गली से गुजरते समय हर कदम संभलकर रखना पड़ता है। उस परिवार से पूछिए, जिसकी गली में नाली की समस्या महीनों से बनी हुई है। क्या उनके लिए भी विकास का कोई बजट है, या उन्हें अगली घोषणा का इंतजार करना होगा?

जनता का दर्द यहीं खत्म नहीं होता। लोग कहते हैं कि यदि स्वर्ण जयंती चौक की मरम्मत जरूरी थी तो मरम्मत होती, व्यवस्था सुधारी जाती। लेकिन जब लाखों रुपये खर्च कर नया स्वरूप देने की बात सामने आती है तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि क्या यही इस समय नगर की सबसे बड़ी जरूरत थी?
सरकारी धन किसी एक व्यक्ति की जेब का पैसा नहीं है। यह उसी जनता से आता है जो टैक्स देती है, बाजार में खरीदारी करती है और हर दिन किसी न किसी रूप में व्यवस्था को चलाने में अपना योगदान देती है। इसलिए जनता यह जानना चाहती है कि उसके पैसे का इस्तेमाल कहां और किस प्राथमिकता से हो रहा है।

एक तरफ चौराहा अपनी नई चमक का इंतजार कर रहा है, दूसरी तरफ नगर की गलियां अपने हिस्से की रोशनी, सड़क और नाली का।
विडंबना यही है कि जिस जनता के नाम पर विकास की बातें होती हैं, वही जनता अपने मोहल्ले की छोटी-सी समस्या के समाधान के लिए बजट का इंतजार करती रह जाती है। जरूरत विकास रोकने की नहीं है। जरूरत सिर्फ इतनी है कि विकास की चमक चौराहे से निकलकर उन गलियों तक भी पहुंचे, जहां आम आदमी रहता है।

क्योंकि जनता को सिर्फ सुंदर चौराहा नहीं चाहिए—उसे रहने लायक शहर चाहिए। और यही वह सवाल है जिसका जवाब शायद स्वर्ण जयंती चौक से ज्यादा नगर की उन गलियों में मिलेगा, जहां आज भी लोग विकास का इंतजार कर रहे हैं।
