Last Updated:
जोधपुर की बी.जे.एस. कॉलोनी में रहने वाले दिव्यांग दंपति मूल सिंह राठौड़ और किरण कंवर ने 80% शारीरिक चुनौती के बावजूद खेलों में इतिहास रच दिया. श्रीगंगानगर के महाराजा गंगासिंह स्टेडियम में आयोजित 15वीं राज्य स्तरीय पैरा एथलेटिक्स प्रतियोगिता में मूल सिंह ने जैवलिन थ्रो में कांस्य पदक और किरण कंवर ने जैवलिन एवं डिस्कस थ्रो में दो स्वर्ण पदक जीते. यह दंपति खेल के साथ-साथ परिवार का पालन-पोषण भी कर रहे हैं और अपने साहस व आत्मनिर्भरता से दूसरों के लिए प्रेरणा बन गए हैं.
उदयपुर. कहते हैं अगर ज़िंदगी में सच्चा साथ मिल जाए, तो हर मुश्किल आसान लगने लगती है. यही पंक्तियां मूल रूप से जोधपुर की बी.जे.एस. कॉलोनी में रहने वाले दिव्यांग दंपति मूल सिंह राठौड़ और किरण कंवर की ज़िंदगी पर बिल्कुल सटीक बैठती है. बचपन से करीब 80 प्रतिशत शारीरिक चुनौतियों के साथ जी रहे इस दंपति ने न सिर्फ एक-दूसरे का हाथ थामा, बल्कि उसी हाथ को ताकत बनाकर खेलों में ऐसा इतिहास रच दिया, जो आज हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुका है.
उनकी कहानी किसी फिल्मी प्रेमकथा से कम नहीं. जहां हालात बार-बार रोकने की कोशिश करते हैं, वहीं दोनों एक-दूसरे की आंखों में देखकर बस इतना कहते हैं “तेरा साथ है, तो मुझे क्या कमी है”. यही भरोसा उन्हें रोज मैदान तक ले गया, पसीने की हर बूंद में सपने बोए गए और फिर मेहनत ने रंग दिखाया.
पति-पत्नी दोनों ने जीता मेडल
श्रीगंगानगर के महाराजा गंगासिंह स्टेडियम में आयोजित 15वीं राज्य स्तरीय पैरा एथलेटिक्स प्रतियोगिता में यह प्रेम और परिश्रम पदकों में तब्दील हो गया. मूल सिंह ने जैवलिन थ्रो में कांस्य पदक जीता, तो किरण कंवर ने जैवलिन और डिस्कस थ्रो में दो स्वर्ण पदक अपने नाम किए. स्टेडियम की तालियों में सिर्फ जीत की आवाज़ नहीं थी, बल्कि उस साथ की गूंज थी, जो हर मुश्किल में एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रखकर खड़ा रहा. मूल सिंह वर्ष 2017 से लगातार पैरा खेलों में पदक जीतते आ रहे हैं. सम्मान मिले, तालियां बजीं, लेकिन घर की ज़िम्मेदारी निभाने के लिए वे आज भी मेहनत से पीछे नहीं हटे.
मूल सिंह सिर्फ खिलाड़ी नहीं उम्मीद की मिशाल हैं
जोमैटो के माध्यम से काम कर परिवार का पालन-पोषण करते हुए उन्होंने साबित किया कि आत्मनिर्भरता भी संघर्ष की सबसे खूबसूरत जीत है. वहीं किरण कंवर ने भी खेलों में अपनी अलग पहचान बनाई. पैरा स्विमिंग से लेकर एथलेटिक्स तक, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने यह दिखाया कि अगर जीवनसाथी साथ हो, तो हौसले कभी डूबते नहीं. तीन साल के बेटे के माता-पिता बने यह दंपति आज सिर्फ खिलाड़ी नहीं, बल्कि उम्मीद की मिसाल है. उनके कोच और क्षेत्रवासी गर्व से कहते हैं कि यह कहानी सिर्फ खेल की नहीं, बल्कि उस प्रेम की है जो कहता है. तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है, हर दर्द भी अब जीत की खुशी लगती है.
About the Author

दीप रंजन सिंह 2016 से मीडिया में जुड़े हुए हैं. हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, ईटीवी भारत और डेलीहंट में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 2022 से News18 हिंदी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. एजुकेशन, कृषि, राजनीति, खेल, लाइफस्ट…और पढ़ें
