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Ballia Pottery Board: सरकारी मदद और पक्के इरादे से तकदीर कैसे बदली जाती है, इसकी मिसाल पेश की है बलिया के राजकुमार प्रजापति ने. कभी हाथ से मिट्टी के दीये-कुल्हड़ बनाकर गुजर-बसर करने वाले राजकुमार ने उत्तर प्रदेश माटी कला बोर्ड योजना के सहयोग से न केवल 35 लाख रुपये सालाना टर्नओवर वाला कारोबार खड़ा कर दिया, बल्कि 30 ग्रामीण महिलाओं और पुरुषों को आत्मनिर्भर बनाकर रोजगार की नई राह भी दिखाई है. आइए विस्तार से जानिए उनकी पूरी सफलता की कहानी…
Ballia Pottery Board: उत्तर प्रदेश के जनपद बलिया के मनियर थाना क्षेत्र अंतर्गत बिशुनपुरा गांव के रहने वाले राजकुमार प्रजापति ने सरकारी योजनाओं का लाभ उठाकर अपनी और कई अन्य परिवारों की तकदीर बदल दी है. कभी हाथों से मिट्टी के बर्तन बनाने वाले राजकुमार आज एक सफल उद्यमी बन चुके हैं और उत्तर प्रदेश माटी कला बोर्ड योजना की मदद से उन्होंने अपने कारोबार को एक बड़े स्तर पर पहुंचा दिया है. इस योजना के तहत मिलने वाली आधुनिक मशीनरी और 50 हजार रुपये के लोन ने उनके जीवन की दिशा और दशा दोनों पूरी तरह से बदल दी और वे आज दर्जनों लोगों के लिए रोजगार का जरिया बन गए हैं.
13 आधुनिक मशीनें और 30 लोगों को मिला सीधा रोजगार
शुरुआत में राजकुमार अकेले ही हाथ से मिट्टी के कुल्हड़ और अन्य बर्तन बनाते थे, लेकिन सरकारी सहायता मिलने के बाद उन्होंने मशीनों का उपयोग शुरू किया. आज उनके पास लगभग 13 आधुनिक मशीनें हैं, जिनकी मदद से वे विभिन्न प्रकार के आकर्षक मिट्टी के बर्तन तैयार करते हैं. उनके इस छोटे से प्रयास ने अब एक बड़े कारखाने का रूप ले लिया है, जहां आसपास के ग्रामीण इलाकों से आए लगभग 30 महिला और पुरुष काम करके अपनी आजीविका चला रहे हैं, जिसमें अधिकतर महिलाएं हैं.
आजमगढ़ से छपरा तक भारी मांग, समय पर ऑर्डर पूरा करना चुनौती
राजकुमार की इस फैक्ट्री में बनने वाले मिट्टी के कुल्हड़, कटोरियां और दीये इत्यादि अपनी उच्च गुणवत्ता और आकर्षण के कारण खासे लोकप्रिय हैं. उनके उत्पादों की मांग केवल बलिया तक ही सीमित नहीं है, बल्कि आजमगढ़, निजामाबाद, छपरा, मऊ और बेल्थरा तक गाड़ियों के जरिए इनकी आपूर्ति की जाती है. चाय के लिए कुल्हड़ और छोले, दही-बड़ा व मिठाइयों के लिए मिट्टी की कटोरियों की बाजार में इतनी भारी मांग रहती है कि कई बार समय पर ऑर्डर पूरे करना भी मुश्किल हो जाता है.
सालाना टर्नओवर ₹35 लाख, 40 ट्रॉली मिट्टी की होती है सालाना खपत
उत्पादन बड़े पैमाने पर होने के कारण कारखाने में हर साल लगभग 40 ट्रॉली मिट्टी की खपत होती है. मिट्टी की भारी मांग और उपलब्धता की कमी के चलते कई बार काम प्रभावित भी हो जाता है, फिर भी वे हरसंभव प्रयास करके उत्पादन जारी रखते हैं. इस पूरे कारोबार का सालाना टर्नओवर 30 से 35 लाख रुपये के बीच है और मासिक कारोबार भी 5 से 6 लाख रुपये तक पहुंच जाता है. थोक बाजार में कुल्हड़ डेढ़ सौ रुपये सैकड़ा और कटोरियां 200 से 250 रुपये सैकड़ा के भाव से बिकती हैं.
ग्रामीण महिलाओं को हर महीने ₹10 हजार से ₹13 हजार तक की कमाई
इस कारखाने से जुड़कर काम करने वाली स्थानीय महिलाओं के जीवन में भी बड़ा आर्थिक बदलाव आया है. प्रमिला देवी पिछले 4 साल से इस कारखाने में मिट्टी के कुल्हड़ बनाने का काम कर रही हैं और हर महीने लगभग साढ़े 10 हजार रुपये कमा लेती हैं. उनका कहना है कि खेती से होने वाली आय की तुलना में यहां काम करना उनके परिवार के लिए बहुत बेहतर साबित हुआ है.
कारखाने में मिट्टी के गिलास बनाने वाली श्वेता भी हर महीने लगभग 13 हजार रुपये की कमाई कर रही हैं. यहां काम करने वाली महिलाओं को उनके काम के अनुसार 100, 150 से लेकर 200 रुपये सैकड़ा के हिसाब से भुगतान किया जाता है. उत्पाद बिकने के बाद मिलने वाली राशि से राजकुमार हर महीने समय पर इन सभी मजदूरों का भुगतान करते हैं. सरकारी योजनाओं का सही उपयोग करके आत्मनिर्भर बनने की यह कहानी आज के युवाओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा बन चुकी है.
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Rahul Goel is a senior journalist with over 15 years of experience in print and digital media. He currently serves as a Coordinator and Publisher at News18 Hindi, managing State and Local18 content operations a…
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