तीसरे उम्मीदवार पर सपा ने क्यों खींचे कदम?
मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, सपा तीसरे उम्मीदवार को मैदान में उतारने की तैयारी कर रखी थी. पार्टी की तरफ से इसके संकेत भी लगातार मिल रहे थे. सपा पार्टी के नेता तो यह भी कह रहे थे कि ऐसा उम्मीदवार सामने होगा जिसके नाम आने से लोग हैरान होंगे, लेकिन नामांकन के आखिरी दिन 6 अक्टूबर को संख्या के गणित और क्रॉस-वोटिंग के खतरे ने पूरी तस्वीर बदल दी. यूपी विधानसभा में सपा-कांग्रेस के पास दो उम्मीदवार जिताने लायक संख्या थी, लेकिन तीसरी सीट के लिए दूसरे दलों के समर्थन या क्रॉस-वोटिंग की जरूरत पड़ती. ऐसे में मुकाबला सपा के लिए जोखिम भरा हो सकता था. और अखिलेश ने अपने पैर खींच लिए.
संख्या बल का अभाव और ‘क्रॉस वोटिंग’ का गहरा डर
उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 सीटों के मौजूदा गणित को देखा जाए तो समाजवादी पार्टी के पास अपने दो उम्मीदवारों राम गोपाल यादव और धनराज परिमल नाथवानी को आसानी से जिताने के लिए पर्याप्त वोट थे. लेकिन तीसरे उम्मीदवार के लिए सपा के पास आवश्यक संख्या बल (लगभग 37 विधायकों का वोट) नहीं था. सपा आलाकमान को अच्छी तरह भान था कि यदि वे तीसरा प्रत्याशी उतारते हैं, तो उन्हें चुनाव जीतने के लिए सत्ता पक्ष (NDA) या अन्य निर्दलीय विधायकों में सेंधमारी करनी पड़ती. इसके विपरीत, भाजपा की मजबूत घेराबंदी और आक्रामक रणनीति के चलते सपा को अपने ही विधायकों में क्रॉस वोटिंग (भीतरघात) का गहरा डर सता रहा था.
इधर बीजेपी ने कुर्मी के साथ ‘महिला कार्ड’ का रचा अचूक ‘चक्रव्यूह’
इधर बीजेपी ने अपने आठवें उम्मीदवार के तौर पर श्रुति गंगवार को उतारा था. श्रुति गंगवार झारखंड के राज्यपाल और बीजेपी के सीनियर नेता संतोष गंगवार की बेटी हैं. उनका राजनीतिक संबंध बरेली और रुहेलखंड से जुड़ा है. मीडिया रिपोर्टों में उनके चयन को गंगवार परिवार की राजनीतिक विरासत, कुर्मी समाज और महिला प्रतिनिधित्व से जोड़कर देखा गया. बीजेपी की आठ उम्मीदवारों की सूची में तीन OBC, दो दलित, दो ब्राह्मण और एक ठाकुर चेहरा था. श्रुति गंगवार के नाम के साथ बीजेपी ने एक तीर से दो अचूक निशाने साधे. पहला ‘कुर्मी (OBC) कार्ड’ और दूसरा ‘महिला कार्ड’. श्रुति गंगवार न सिर्फ एक बड़े राजनीतिक घराने से आती हैं, बल्कि वे कुर्मी समाज का एक बेहद प्रतिष्ठित, उच्च शिक्षित और प्रभावी महिला चेहरा हैं. राजनीति के जानकारों के मुताबिक, यदि अखिलेश यादव तीसरा उम्मीदवार खड़ा करते, तो उनका मुकाबला सीधे बीजेपी के श्रुति गंगवार से होता. चूंकि सपा के पास पर्याप्त वोट नहीं थे, इसलिए उनका तीसरा प्रत्याशी तो वैसे भी चुनाव हार जाता. ऐसी स्थिति में बीजेपी को एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक नैरेटिव (संदेश) गढ़ने का मौका मिल जाता कि अखिलेश यादव ने संख्या बल न होने के बावजूद एक प्रतिष्ठित कुर्मी समाज की बेटी (महिला) को राज्यसभा जाने से रोकने के लिए अपना उम्मीदवार उतार दिया. यह संदेश आगामी चुनावों में आधी आबादी (महिला वोटर्स) और कुर्मी समाज के बीच सपा के लिए बेहद आत्मघाती साबित हो सकता था.
यूपी में कुर्मी जाति का भारी राजनीतिक प्रभाव
उत्तर प्रदेश की राजनीति में यादवों के बाद कुर्मी जाति को गैर-यादव ओबीसी (Non-Yadav OBC) ब्लॉक में सबसे अधिक संगठित और प्रभावशाली मतदाता वर्ग माना जाता है:
• वोट बैंक की ताकत: राज्य की कुल आबादी में कुर्मी समाज की हिस्सेदारी करीब 5 से 6 प्रतिशत है.
• सीटों पर दबदबा: रुहेलखंड (बरेली, पीलीभीत), अवध (बाराबंकी, बेलाप्रतापगढ़) और पूर्वांचल (मिर्जापुर, जौनपुर, वाराणसी के आस-पास) के जिलों की लगभग 30 से 40 विधानसभा सीटों पर कुर्मी मतदाता किसी भी दल की जीत-हार तय करते हैं.
• यदि राज्यसभा चुनाव की एक सीट के चक्कर में समाजवादी पार्टी पर “कुर्मी विरोधी” और “महिला विरोधी” होने का ठप्पा लग जाता, तो आगामी विधानसभा चुनाव में यह पूरा वोट बैंक सपा से पूरी तरह छिटक जाता.
अखिलेश के ‘403 सीटों’ वाले बयान पर छिड़ा घमासान: आलोचना और पक्ष में तर्क
इस पूरे चक्रव्यूह और विपक्ष के हमलों के बीच, अखिलेश यादव ने भले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट के जरिए अपनी रणनीति को कवर करने की कोशिश की. और लिखा भी कि अब हमारी नजर तीन (राज्यसभा) पर नहीं, बल्कि चार सौ तीन (403 विधानसभा) पर है. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. इस बयान के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में लोग उनके पक्ष और विपक्ष में खुलकर अपनी राय रख रहे हैं. एक तरफ अखिलेश के फैसले का समर्थन करने वालों का कहना है कि यह एक बेहद समझदारी भरा और परिपक्व कदम है. समर्थकों के अनुसार, राज्यसभा की महज एक सीट के लिए भाजपा के साथ विधायकों की खरीद-फरोख्त की कीचड़ वाली राजनीति में फंसने से बेहतर है कि पार्टी अपनी पूरी ताकत 2027 के विधानसभा चुनाव की सभी 403 सीटों की तैयारी पर केंद्रित करे. दूसरी तरफ आलोचक इस बयान को अखिलेश यादव की राजनीतिक बेबसी और हार का खौफ बता रहे हैं. तभी तो बीजेपी के कुछ नेताओं ने तंज कसते हुए कहा भी कि अखिलेश यादव के हाथ में “न तीन आएगा और न ही 403”. आलोचकों का मानना है कि अखिलेश ने लड़ाई शुरू होने से पहले ही मैदान छोड़ दिया है.
क्रॉस वोटिंग का बड़ा खतरा: कहीं दो सीटों के भी न पड़ जाते लाले!
सोशल मीडिया पर चल रही बहसों के बीच एक बेहद चौंकाने वाला और तार्किक एंगल भी सामने आया है. कुछ सीनियर पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अखिलेश यादव ने तीसरा उम्मीदवार न उतारकर वास्तव में एक बहुत बड़ा आत्मघाती खतरा टाल दिया है. लोग यह भी कह रहे हैं कि “अच्छा हुआ जो अखिलेश ने तीसरा उम्मीदवार नहीं उतारा, वरना कहीं पहले से सुरक्षित दो सीटों के लिए भी लाले न पड़ जाते.” यदि सपा तीसरा प्रत्याशी मैदान में उतारती, तो चुनाव में अनिवार्य रूप से वोटिंग (मतदान) की नौबत आती. वोटिंग की स्थिति बनने पर बीजेपी के रणनीतिक दबाव और अंदरूनी असंतोष के चलते सपा के कई विधायक खुलकर क्रॉस वोटिंग (भीतरघात) कर सकते थे. यदि क्रॉस वोटिंग का यह आंकड़ा उम्मीद से ज्यादा बड़ा हो जाता, तो सपा के तीसरे उम्मीदवार की हार तो तय थी ही. साथ ही पहले और दूसरे नंबर के मूल उम्मीदवारों (राम गोपाल यादव और धनराज परिमल नाथवानी) की जीत के लिए जरूरी न्यूनतम वोटों का आंकड़ा भी डगमगा सकता था. ऐसे में सपा अपने सुरक्षित कोटे की सीटें भी गंवा सकती थी.
तीसरा उम्मीदवार उतारते तो राज्यसभा और विधानसभा दोनों हारते?
राजनीतिक विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि अखिलेश यादव ने एक बड़े और दोहरे राजनीतिक नुकसान से बचने के लिए कदम पीछे खींचे हैं:
• राज्यसभा का नुकसान: पर्याप्त वोट न होने, सुरक्षित उम्मीदवारों पर मंडराते संकट और विधायकों की संभावित टूट के कारण तीसरा प्रत्याशी मैदान में औंधे मुंह गिरता और पार्टी की भारी किरकिरी होती.
• विधानसभा चुनाव पर वज्रपात: उत्तर प्रदेश में 2027 की शुरुआत में ही विधानसभा चुनाव होने हैं. यदि राज्यसभा के चलते पार्टी के भीतर फूट पड़ती या विधायक बागी हो जाते, तो ऐन चुनाव से पहले सपा का मनोबल टूट जाता. जनता में यह संदेश जाता कि अखिलेश अपने विधायकों को एकजुट नहीं रख पा रहे हैं. साथ ही, कुर्मी समाज और महिला वर्ग की नाराजगी के कारण पार्टी का सोशल इंजीनियरिंग का पूरा ताना-बाना बिखर जाता. इसलिए यह तो साफ है कि बीजेपी की रणनीतिक घेराबंदी और श्रुति गंगवार के रूप में फेंके गए कुर्मी व महिला कार्ड ने अखिलेश यादव को एक ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया था, जहां पैर पीछे खींचना ही एकमात्र रास्ता बचा था. तीसरा उम्मीदवार न उतारकर अखिलेश ने राज्यसभा की एक सीट तो जरूर गंवाई, लेकिन उन्होंने खुद को एक ऐसे बड़े जातीय बवंडर और क्रॉस वोटिंग के उस आत्मघाती जाल से बचा लिया जो उनके सुरक्षित उम्मीदवारों को हराने के साथ-साथ 2027 में उनकी पूरी राजनीतिक जमीन खिसका सकता था. ये आंकलन है, असली परिणाम क्या होता और आगे क्या होगा यह समय बताएगा.

