जिस नेता ने भारत की राजनीति में ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का नारा देकर सत्ता की चाबी शोषितों-वंचितों के हाथों में सौंपी, उनका अपना परिवार आज कहां है? क्या उनके परिवार का कोई सदस्य राजनीति में आया? उनके अंतिम दिनों से जुड़े वे कौन-से सवाल हैं जो आज भी अनसुलझे हैं? यूपी चुनाव 2027 से पहले एक बार फिर दलित राजनीति की बात होने लगी है. ऐसे में कांशीराम का नाम लिए बिना यूपी की दलित राजनीति की बात अधूरी रह जाएगी. मायावती हों, चंद्रशेखर आजाद हों या फिर बीजेपी, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी सब कांशीराम की विरासत को आगे बढ़ाने की बात करते हैं. आज के परिवारवादी राजनीति में एक शख्स ने पूरी राजनीति बदल दी. जिस व्यक्ति ने 1984 में बहुजन समाज पार्टी खड़ी की, जिसने उत्तर भारत की दलित राजनीति का पूरा राजनीतिक नक्शा बदल दिया, उसके अपने परिवार की कहानी बिल्कुल अलग है. आइए जानते हैं कांशीराम का परिवार कहां और किस हालात में रह रहा है?
कांशीराम का जन्म पंजाब के रोपड़ इलाके में हुआ था. आज भी कांशीराम का परिवार रोपड़ में ही रहता है. परिवार के कुछ सदस्य सार्वजनिक जीवन में या यूं कहें कि चुनाव के मौके पर या फिर किसी बड़े मंच पर बड़े नेता के साथ कभी-कभार दिखाई देते हैं. लेकिन कांशीराम के परिवार को कोई भी सदस्य इस समय और पहले बीएसपी में कभी सदस्य नहीं रहा. यही कांशीराम की कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू है. कांशीराम शादी नहीं की, इसलिए उनके भाई और बहन उनके अस्वस्थ होने या मौत के बाद कभी-कभार मीडिया में अलग-अलग कारणों से चर्चा में रहे.
15 मार्च 1934 को पंजाब के रोपड़ अब रूपनगर जिले के खवासपुर गांव में कांशीराम का जन्म हुआ.
कांशीराम के परिवार में कौन-कौन थे?
15 मार्च 1934 को पंजाब के रोपड़ अब रूपनगर जिले के खवासपुर गांव में जन्मे कांशीराम का परिवार आज भी खवासपुर में साधारण जिंदगी बिता रहा है. उनके पिता हरि सिंह और माता बिसन कौर का निधन काफी पहले ही हो चुका है. कांशीराम अपने आठ भाई-बहनों में सबसे बड़े थे. उनके भाइयों और बहनों में से कई का निधन हो चुका है. कांशीराम के परिजनों का आरोप रहा है कि कांशीराम ने अपने जीवन में किसी को संपत्ति नहीं दी, लेकिन जब वे बीमार पड़े तो उन्हें उनके अपने ही परिवार से मिलने नहीं दिया गया.
‘न शादी करूंगा, न घर जाऊंगा’
1964 में पुणे की एक सरकारी प्रयोगशाला में काम करते समय जब कांशीराम ने डॉ. बी.आर. आंबेडकर और बुद्ध जयंती की छुट्टी रद्द होने के खिलाफ लड़ाई शुरू की, तब उन्होंने एक ऐतिहासिक शपथ ली थी. उन्होंने तब कहा, ‘मैं कभी शादी नहीं करूंगा, कभी संपत्ति नहीं बनाऊंगा, कभी अपने घर-परिवार वापस नहीं जाऊंगा और अपना पूरा जीवन बहुजन समाज के सामाजिक परिवर्तन आंदोलन को समर्पित करूंगा.’ कांशीराम ने 24 पेज का की प्रतिज्ञा को ताउम्र निभाया. उन्होंने अपने परिवार को न केवल राजनीति से दूर रखा, बल्कि खुद भी परिवार से दूरी बना ली ताकि परिवारवाद के आरोप बहुजन आंदोलन की साख को नुकसान न पहुंचाए.
कांशीराम के परिवार का कोई भी सदस्य कभी सक्रिय चुनावी राजनीति या बसपा के किसी पद पर स्थापित नहीं हो सका.
क्या कभी कांशीराम के परिवार से कोई राजनीति में आया?
कांशीराम के परिवार का कोई भी सदस्य कभी सक्रिय चुनावी राजनीति या बसपा के किसी पद पर स्थापित नहीं हो सका. हालांकि, कांशीराम के निधन के बाद उनकी बहन स्वर्ण कौर और भतीजे लखबीर सिंह ने कई बार मीडिया के सामने आकर बयान दिए और कुछ मौकों पर मायावती के खिलाफ चुनावी रैलियों व मंचों का समर्थन किया. लेकिन वे स्वयं कोई राजनीतिक दल बनाकर या उम्मीदवार बनकर चुनावी राजनीति में अपनी जगह नहीं बना पाए.
कांशीराम के जीवन और निधन से जुड़े 3 अनसुलझे सवाल
साल 2003 में ब्रेन स्ट्रोक के बाद कांशीराम दिल्ली में मायावती के आवास पर रहे. परिवार खासकर बहन स्वर्ण कौर का आरोप था कि उन्हें कांशीराम से मिलने नहीं दिया गया और उन्हें जबरन दूर रखा गया. 9 अक्टूबर 2006 को कांशीराम के निधन के बाद परिवार ने वसीयत की वैधता पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि बसपा की पूरी विरासत और संपत्ति पर एकतरफा कब्जा किया गया.
बहन स्वर्ण कौर क्यों चर्चा में आईं?
कांशीराम की बहन स्वर्ण कौर लंबे समय तक अपने भाई की विरासत को लेकर सार्वजनिक रूप से बोलती रही हैं. वह कांशीराम फाउंडेशन से भी जुड़ी रही हैं. 2016 में कांग्रेस के नेताओं ने स्वर्ण कौर से संपर्क किया था. उस समय उनके जरिए कांशीराम की विरासत और दलित वोटरों तक पहुंच बनाने की राजनीतिक कोशिश की खबर सामने आई थी. 2025 में भी स्वर्ण कौर राहुल गांधी के एक कार्यक्रम में मंच पर नजर आईं और उन्होंने संविधान की रक्षा की लड़ाई में राहुल गांधी के प्रति समर्थन जताया. उनके साथ कांशीराम के भतीजे लखबीर सिंह भी मौजूद थे.
चंद्रशेखर आजाद, ईशान आनंद और आकाश आंद जैसे नेता अब बहुजन राजनीति की बात करते हैं.
कांशीराम के परिवार से कोई राजनीति में क्यों नहीं आया?
कांशीराम के भतीजे लखबीर सिंह भी कई बार मीडिया में सामने आए हैं. 2019 में उन्होंने कांशीराम की मौत को लेकर उठे सवालों पर परिवार का पक्ष रखा था. उस समय उन्होंने साफ कहा था कि परिवार राजनीतिक मोहरा नहीं बनना चाहता. 2025 में वह अपनी बुआ स्वर्ण कौर के साथ राहुल गांधी के कार्यक्रम में भी मौजूद थे. इससे एक बात स्पष्ट होती है कांशीराम के परिवार के कुछ सदस्य राजनीति के संपर्क में जरूर रहे, लेकिन कांशीराम की बनाई बीएसपी की कमान उनके परिवार के हाथ में नहीं आई.
परिवार और मायावती के बीच क्यों बिगड़े रिश्ते?
कांशीराम की मृत्यु के बाद उनके परिवार और मायावती के बीच रिश्ते बेहद खराब हो गए. परिवार के सदस्यों ने कई मौकों पर आरोप लगाया कि मायावती ने कांशीराम की राजनीतिक विरासत पर कब्जा कर लिया और परिवार को किनारे कर दिया. 2014 में स्वर्ण कौर और परिवार के दूसरे सदस्यों ने बीएसपी से दूरी की बात कही थी. 2021 में भी स्वर्ण कौर और लखबीर सिंह ने मायावती और बीएसपी के खिलाफ नाराजगी जाहिर की थी. उन्होंने आरोप लगाया था कि कांशीराम की बनाई पार्टी को उनके मूल विचारों से दूर कर दिया गया है. यह परिवार का आरोप था.
कांशीराम की मौत से जुड़ा सबसे बड़ा अनसुलझा सवाल?
कांशीराम की मृत्यु 9 अक्टूबर 2006 को हुई थी. उनकी मौत के बाद परिवार और मायावती के बीच विवाद सार्वजनिक हो गया. परिवार ने उनकी मौत को लेकर संदेह जताया और पोस्टमार्टम की मांग की. मामला इतना बढ़ा कि अंतिम संस्कार को लेकर भी कानूनी विवाद हुआ. दिल्ली हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार किया गया. बाद के वर्षों में कांशीराम की बहन स्वर्ण कौर और परिवार के अन्य सदस्यों ने उनकी मौत की जांच की मांग को लेकर सवाल उठाए. परिवार द्वारा उठाए गए सवाल आज भी उनकी विरासत की कहानी का एक विवादित अध्याय बने हुए हैं.
यूपी चुनाव 2027 से पहले एक बार कांशीराम को लेकर राजनीति गर्म हो सकती है?
फिर 2027 से पहले कांशीराम क्यों याद आ रहे हैं?
यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है. उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं. कांशीराम की विरासत को लेकर भी कई दलों और नेताओं की दिलचस्पी दिखाई दे रही है. कांशीराम ने जिस संगठनात्मक ढांचे और सामाजिक इंजीनियरिंग की नींव रखी, उसी के आधार पर मायावती उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री बनीं. इसीलिए आज भी जब बीएसपी अपने पुराने सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश करती है तो कांशीराम का नाम सबसे आगे रहता है. 2025 में कांशीराम की पुण्यतिथि पर मायावती और उनके भतीजे आकाश आनंद ने भी उनकी विरासत को आगे बढ़ाने की बात कही थी. आकाश आनंद ने कांशीराम के सपनों को पूरा करने को बीएसपी की राजनीति का लक्ष्य बताया था.
कांशीराम की विरासत का असली सवाल
कांशीराम ने दलित राजनीति को सिर्फ चुनावी राजनीति नहीं माना था. उन्होंने पहले कर्मचारियों को संगठित किया, फिर BAMCEF बनाया, उसके बाद DS-4 और फिर 1984 में बहुजन समाद पार्टी की स्थापना की. उनका मॉडल था पहले सामाजिक चेतना, फिर संगठन और उसके बाद सत्ता. आज 2027 के यूपी चुनाव से पहले लगभग हर प्रमुख राजनीतिक दल दलित समाज तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है. ऐसे में कांशीराम का नाम फिर चर्चा में आना सिर्फ श्रद्धांजलि या जन्म-मृत्यु दिवस की राजनीति नहीं है. यह उस वोट और उस सामाजिक चेतना तक पहुंचने की कोशिश भी है जिसे कांशीराम ने दशकों की मेहनत से राजनीतिक शक्ति में बदला था.
कुलमिलाकर जिस कांशीराम के नाम पर आज मायावती से लेकर चंद्रशेखर आजाद और बीजेपी-कांग्रेस तक अपनी-अपनी राजनीति का रास्ता तलाश रहे हैं, क्या कभी उनके अपने परिवार की आवाज फिर उस राजनीतिक मंच के केंद्र में लौटेगी? 2027 के यूपी चुनाव में इसका जवाब शायद कांशीराम की विरासत की अगली कहानी लिखेगा.

