नई दिल्ली. टीवी की दुनिया में अपनी दमदार अदाकारी और अलग-अलग किरदारों से पहचान बनाने वाली सुधा चंद्रन एक बार फिर नए अंदाज में दर्शकों के सामने आने वाली हैं. इस बार वह माइक्रो-ड्रामा ‘हिसाब बराबर’ में आशा नाम की एक ऐसी मां का किरदार निभा रही हैं, जो अपने बेटे के बेहतर भविष्य के लिए जिंदगीभर संघर्ष करती है. वक्त बदलता है और उसका बेटा देश के सबसे अमीर कारोबारियों में शामिल हो जाता है, लेकिन मां को उसकी हैसियत के कारण अपमान झेलना पड़ता है. इस शो में मां की ममता, त्याग और स्वाभिमान की कहानी देखने को मिलेगी. सुधा चंद्रन ने खास बातचीत में अपने नए किरदार, मां के साथ रिश्ते और माइक्रो-ड्रामा के अनुभव पर खुलकर बात की.
टेलीवजन, फिल्म और डिजिटल फॉमेंट में काम करने के बाद, माइक्रो-ड्रामा पर काम करने का आपका एक्सपीरयंस आपके पछले प्रोजेक्ट्स से कैसे अलग था?
सबसे बड़ा अंतर रफ्तार और सटीकता का है. टेलीवजन में कसी किरदार के साथ लंबे समय तक जीने और उसके अलग-अलग पहलुओं को धीरे-धीरे उभारने का मौका मिलता है. सिनेमा में भी किरदार को गढ़ने के लिए पर्याप्त समय होता है. लेकन माइक्रो-ड्रामा में सब कुछ बेहद सटीक और समाप्त होना चाहिए. आपके पास अपनी बात रखने, भावनाएं पहुंचाने और प्रभाव छोड़ने के लिए बहुत कम समय होता है. हर अभिव्यिक्त और संवाद का कहानी में योगदान होना जरूरी होता है, जिससे यह अनुभव चुनौतीपूर्ण और रोमांचक बन जाता है.
’हिसाब बराबर’ में मां अपने बेटे के बेहतर भविष्य के लए सब कुछ कुबान कर देती है. आपकी जिंदगी में भी आपकी मां का बहुत बड़ा योगदान रहा है. क्या इस किरदार को समझने में आपका अपना रिश्ता मां के साथ कहीं न कहीं काम आया?
बिल्कुल, जब आप कसी किरदार की भावनात्मक गहराई को छूते हैं, तो आपकी अपनी जिंदगी के अनुभव अपने आप उसमें ढल जाते हैं. मेरी जिंदगी में मेरी मां का योगदान अटूट रहा है और उनसे सीखी हुई भावनाएं जैसे नि:स्वार्थ प्यार, त्याग और कठिन से कठिन परिस्थितियों में खड़े रहने की ताकत ने मुझे हमेशा हिम्मत दी है. ‘हिसाब बराबर’ में आशा का किरदार भी एक ऐसी ही मां का है जो अपने बच्चे के लिए सब कुछ न्योछावर कर देती है. अपने निजी जीवन के उन पलों और मां के साथ के रिश्ते की गहराई ने मुझे आशा के दर्द, उसकी ममता और उसकी हिम्मत को पद पर स्वाभिमानी तरीके से पेश करने में बहुत मदद की.
’हिसाब बराबर’ की कहानी में आशा को सिर्फ उसके साधारण पहनावे और हैसियत देखकर जज किया जाता है. असल जिंदगी में भी आपने कई तरह के पूर्वाग्रहों और जजमेंट का सामना किया है. क्या कभी कसी ने आपको आपकी पहचान या परिस्थितियों के आधार पर कम आंकने की कोशिश की?
हां, मैंने अपने जीवन और करियर में कई बार ऐसे दौर का सामना किया है. ‘मयूरी’ के समय से ही मैंने यह सीखा कि परिस्थितियां आपका भविष्य तय नहीं करतीं. नेशनल अवॉर्ड जीतने के बावजूद एक ऐसा समय आया जब मेरे पास सालों तक काम नहीं था. लोग अकसर आपको आपकी वर्तमान स्थिति, उम्र या छवि के दायरे में बांधकर आंकने लगते हैं. मेरा मानना है कि किसी भी कलाकार या महिला का करियर उम्र या परिस्थितियों के कारण सीमित नहीं होना चाहिए. जब मैंने ‘रमूला सिकंद’ का रोल चुना, तो लोगों का मुझे देखने का नजरिया पूरी तरह बदल गया.
फैंस आपको टीवी पर ‘रमोला सिकंद’ जैसे पावरफुल और कड़क नेगेटिव रोल्स के लिए भी याद रखते हैं और अब आप इस शो में एक बेहद सीधी-साधी, पीड़ित लेकिन स्वाभिमानी मां के रूप में दिखेंगी. एक एक्टर के तौर पर इन दोनों मोर्चों को इतनी सहजता से कैसे संभालती हैं?
एक कलाकार के रूप में मैंने खुद को कभी कसी एक दायरे में नहीं बांधा. अगर मैंने ‘मयूरी’ के बाद सोच लिया होता कि मुझे सफ एक ही तरह का काम करना है तो शायद मेरा करियर इतना लंबा नहीं होता. मैंने सकारात्मक, नकारात्मक, भावनात्मक और कॉमिक… हर तरह के शेड्स निभाए हैं. ‘मयूरी’ के बाद ‘रमूला सिकंद’ लोगों की उम्मीदों से एकदम अलग था, फिर ‘नागिन’ में ‘यामिनी’ का अलग अंदाज था और अब ‘हिसाब बराबर’ में ‘आशा’ एक बेहद सीधी, पीड़ित पर स्वाभिमानी मां का नया पहलू सामने लाती है. बदलाव तब सहज होता है जब आप लगातार नया सीखने और खुद को नया रूप देने के लए तैयार रहते हैं.
आज के दौर में बड़े कलाकारों के लिए माइक्रो-ड्रामा जैसे नए फॉमट में काम करना कतना जरूरी है? और अगर आपको ‘हिसाब बराबर’ को सिर्फ तीन शब्दों में बताना हो, तो वे क्या होंगे?
समय के साथ खुद को बदलना और नए माध्यमों को अपनाना हर कलाकार के लिए बहुत जरूरी है. आज दशकों के पास विकल्प बहुत हैं, इसलिए कहानी कहने का अंदाज भी ज्यादा तेज और शार्प होना चाहिए. जिस पल एक कलाकार यह सोच लेता है क उसे सब कुछ आता है, उसका विकास रुक जाता है. नई पीढ़ी और नए फॉर्मेंट्स के साथ काम करने से आप हमेशा प्रासंगिक बने रहते हैं.

