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लता मंगेशकर ने अपने करियर में हर तरह के गाने गाए हैं. लता मंगेशकर ने अपने करियर में मधुबाला से लेकर मीना कुमारी, नूतन, नरगिस, माला सिन्हा, वहीदा रहमान, हेमा मालिनी और श्रीदेवी हर एक्ट्रेस को हिट गाने दिए हैं. लेकिन जब वह पहली बार दिलीप कुमार से मिली तो उन्होंने गायिका को कुछ ऐसी कमी बताई कि लता ने उस कमी को दूर करने का फैसला कर लिया था.बाद में उन्होंने दिलीप कुमार की बात सुनकर उस कमी को दूर भी किया.
नई दिल्ली. लता मंगेशकर की आवाज से भला कौन वाकिफ नहीं था. हिंदी सिनेमा में अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेरने वाली लता दीदी ने हिंदी के साथ-साथ मराठी, बंगाली और कई दूसरी भाषाओं में भी गाने गाए. उनके गानों में सिर्फ आवाज की मिठास ही नहीं, बल्कि शब्दों का सही उच्चारण और भावनाओं की गहराई भी साफ सुनाई देती थी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि उर्दू शब्दों के सही उच्चारण के लिए लता मंगेशकर ने बाकायदा इस भाषा की तालीम ली थी. इसके पीछे एक दिलचस्प किस्सा मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार से जुड़ा हुआ है.
लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर 1929 को इंदौर में हुआ था. बचपन से ही उनका रुझान संगीत की तरफ था. उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर ने उन्हें संगीत की शुरुआती शिक्षा दी. आगे चलकर लता ने अपनी मेहनत और शानदार आवाज के दम पर फिल्म इंडस्ट्री में ऐसा मुकाम बनाया, जिसे हासिल करना हर कलाकार का सपना होता है.
कहा जाता है कि साल 1947 में संगीतकार अनिल विश्वास ने लता मंगेशकर की मुलाकात दिलीप कुमार से कराई थी. उस वक्त लता अपने करियर की शुरुआत कर रही थीं, जबकि दिलीप कुमार इंडस्ट्री में अपनी पहचान बना चुके थे.
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मुलाकात के दौरान जब दिलीप कुमार को पता चला कि लता महाराष्ट्र से हैं, तो उन्होंने उनके उर्दू उच्चारण को लेकर एक टिप्पणी की. उन्होंने कहा था कि जिन गायकों को उर्दू भाषा की अच्छी समझ नहीं होती, उन्हें उर्दू के शब्दों का सही उच्चारण करने में परेशानी हो सकती है.
दिलीप कुमार की यह बात लता मंगेशकर को चुभ गई. लेकिन उन्होंने इसे दिल पर लेकर बैठने के बजाय अपनी कमी सुधारने का फैसला किया. घर लौटने के बाद लता मंगेशकर ने उर्दू सीखने का मन बनाया. इसके लिए उन्होंने एक विद्वान मौलाना से उर्दू की बाकायदा तालीम लेना शुरू किया. उन्होंने भाषा के शब्दों को सही तरीके से बोलने के साथ-साथ उनके उच्चारण और बारीकियों पर भी ध्यान दिया.
लता मंगेशकर के लिए यह सिर्फ एक भाषा सीखने की बात नहीं थी. वह चाहती थीं कि जब वह उर्दू के शब्द किसी गाने में गाएं, तो उनका उच्चारण बिल्कुल सही हो और सुनने वाले को उसमें कोई कमी महसूस न हो. बाद में लता मंगेशकर ने अपनी आत्मकथा ‘द सब्सटेंस एंड द शैडो: एन ऑटोबायोग्राफी’ में इस किस्से का जिक्र किया. उन्होंने दिलीप कुमार के साथ हुई उस मुलाकात और उर्दू सीखने के अपने अनुभव को याद किया.
लता मंगेशकर ने माना कि उस वक्त दिलीप कुमार की बात उन्हें जरूर चुभी थी, लेकिन उसी टिप्पणी ने उन्हें अपनी कमी पहचानने और उसे दूर करने की प्रेरणा दी. उन्होंने इस बात को अपने लिए एक तरह का ‘अनजाना तोहफा’ माना.
यही वजह है कि लता मंगेशकर की गायकी में उर्दू शब्दों का उच्चारण भी बेहद साफ और असरदार सुनाई देता था. एक छोटी सी टिप्पणी को उन्होंने आलोचना मानकर छोड़ने के बजाय उसे खुद को बेहतर बनाने की वजह बना लिया.

