उत्तर प्रदेश की सियासत में जब भी बहुजन समाज पार्टी की बात होती है, तो एक बात हमेशा तय मानी जाती है कि बीएसपी सुप्रीमो मायावती कब क्या फैसला लेंगी, इसका अंदाजा राजनीति के बड़े-बड़े धुरंधर भी नहीं लगा पाते. लेकिन 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बीएसपी के भीतर जिस तरह का सियासी नाटक और परिवार के इर्द-गिर्द बदलाव देखने को मिल रहा है, उसने आम जनता और राजनीतिक विश्लेषकों दोनों को सोचने पर मजबूर कर दिया है, और सभी के दिमाग में इन दिनों सिर्फ एक ही सवाल घूम रहा हैं कि आखिर मायावती चाहती क्या हैं? कभी बड़े भतीजे आकाश आनंद को अपना एकमात्र उत्तराधिकारी घोषित करना, फिर अचानक किनारे लगा देना.
और फिर एक लंबा-चौड़ा बयान जारी कर यह ऐलान कर देना कि आनंद कुमार के किसी भी बेटे को पार्टी में कोई जगह नहीं मिलेगी, बल्कि उनकी इकलौती बेटी दीपिका आनंद जरूरत पड़ने पर मदद करेंगी. आखिर चुनाव के मुहाने पर खड़ी बीएसपी के भीतर यह सब चल क्या रहा है? क्या यह सिर्फ घर की कलह है या 2027 के लिए कोई बहुत सोची-समझी बिसात बिछाई जा रही है?
दीपिका आनंद कौन हैं और उनकी अचानक एंट्री के मायने क्या हैं?
बसपा की अंदरूनी राजनीति में ‘दीपिका आनंद’ का नाम अचानक सामने आया है. इससे पहले पार्टी के पोस्टर, बैनर, रैलियों या किसी भी आधिकारिक मंच पर उनका नामोनिशान तक नहीं था. दीपिका आनंद दरअसल मायावती के सबसे छोटे भाई और बसपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आनंद कुमार की इकलौती बेटी हैं. यानी वह आकाश आनंद और ईशान आनंद की सगी बहन हैं. लगभग 22-23 साल की दीपिका आनंद इस समय कानून (वकालत) की पढ़ाई कर रही हैं. अब तक वह पूरी तरह से राजनीतिक चकाचौंध से दूर, एक सामान्य छात्रा के रूप में अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे रही थीं.
मीडिया की चकाचौंध और चुनावी रैलियों की गहमागहमी से मीलों दूर रहीं दीपिका आनंद का नाम अचानक मायावती ने सार्वजनिक चर्चा में ला दिया. मायावती ने उन्हें कोई सीधा राष्ट्रीय अध्यक्ष या चीफ कोऑर्डिनेटर जैसा भारी-भरकम पद नहीं दिया है, बल्कि एक बेहद सधे हुए अंदाज में आनंद कुमार के जरिए पार्टी के दरवाजे उनके लिए खोले हैं. मायावती के आधिकारिक बयान के मुताबिक, आनंद कुमार अपनी सांगठनिक और निजी देखरेख के कामों में सहयोग के लिए केवल अपनी बेटी दीपिका की मदद ले सकते हैं. मायावती ने यह भी जोड़ा कि आगे चलकर यदि दीपिका की ईमानदारी, वफादारी और कार्यक्षमता पार्टी की कसौटी पर खरी उतरती है, तो उन्हें संगठन में कोई जिम्मेदारी दी जा सकती है. यानी दीपिका को सीधे लॉन्च करने के बजाय एक ‘वेट एंड वॉच’ वाले बैकडोर रूट से एंट्री दी गई है.
आकाश से ईशान और फिर दीपिका… बीएसपी में यह खींचतान क्यों हुई?
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा. साल 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान आकाश आनंद बीएसपी के आक्रामक युवा चेहरे के तौर पर उभरे थे. लंदन से एमबीए करके लौटे आकाश ने जिस तरह से तीखे भाषण दिए, उससे लगने लगा था कि बीएसपी को अपना नया युवा नेता मिल गया है. मायावती ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी तक घोषित कर दिया था. लेकिन चुनाव के बीच में ही सीतापुर में दिए गए एक भाषण के बाद आकाश पर मुकदमे दर्ज हुए और मायावती ने उन्हें अपरिपक्व बताते हुए सभी पदों से हटा दिया. बाद में उन्हें फिर मौका दिया गया, लेकिन उनके ससुर और पूर्व राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ के साथ पार्टी के रिश्तों में आई कड़वाहट और आकाश की कथित अनुशासनहीनता ने बात बिगाड़ दी. मायावती को लगा कि आकाश पार्टी के मिशन से ज्यादा पारिवारिक रिश्तों को तरजीह दे रहे हैं. नतीजा यह हुआ कि आकाश को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से ही बाहर कर दिया गया.
आकाश के हटते ही मायावती ने आनंद कुमार के दूसरे बेटे ईशान आनंद को मंच दिया. ईशान को कई राज्यों का सेक्टर प्रभारी बनाया गया और सोशल मीडिया पर आधिकारिक तौर पर लॉन्च किया गया. लगा कि अब बीएसपी की कमान ईशान संभालेंगे. लेकिन यह व्यवस्था भी कुछ ही दिन टिक सकी. अचानक मायावती ने अपने दोनों भतीजों पर पूर्ण विराम लगा दिया. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मायावती अपनी पूरी राजनीति में कभी भी सत्ता के दो केंद्र बर्दाश्त नहीं कर सकी हैं. आकाश आनंद जिस तेजी से लोकप्रिय हो रहे थे और जिस तरह से उनके फैसले पार्टी की परंपरागत कार्यशैली से अलग जा रहे थे, उसने बीएसपी के पुराने कैडर और मायावती के मन में असहजता पैदा कर दी थी.
दूसरा बड़ा कारण यह था कि विपक्षी पार्टियां बीएसपी पर लगातार ‘परिवारवाद’ का आरोप मढ़ रही थीं. मायावती हमेशा यह दावा करती रही हैं कि उन्होंने कांशीराम के सिद्धांतों पर चलकर अपने परिवार को सत्ता और संगठन के बड़े पदों से दूर रखा. आकाश और ईशान के उभार से बीएसपी भी उसी परिवारवादी सांचे में ढलती दिख रही थी जिसका विरोध मायावती जीवन भर करती रहीं. ऐसे में दोनों भतीजों को एक झटके में बाहर का रास्ता दिखाकर मायावती ने खुद को फिर से एक कठोर और मिशनरी नेता के तौर पर पेश करने की कोशिश की है.
मायावती का ‘मजबूरी’ वाला तर्क और कांशीराम की विरासत
अपने हालिया बयान में मायावती ने एक बेहद भावुक और निजी बात खुलकर जनता के सामने रखी. उन्होंने कहा कि एक अविवाहित महिला होने के नाते अपनी सुरक्षा, देखरेख और मान-सम्मान के साथ आंदोलन को आगे बढ़ाने की मजबूरी में उन्हें अपने छोटे भाई आनंद कुमार को साथ रखना पड़ा. उन्होंने साफ कहा कि अगर वह पुरुष होतीं, तो मान्यवर कांशीराम की तरह अपने परिवार के किसी भी सदस्य को अपने पास तक नहीं फटकने देतीं. लेकिन अब जब आनंद कुमार के बच्चे बड़े हो गए, उनकी शादियां हो गईं, तो पारिवारिक महत्वाकांक्षाएं टकराने लगीं और इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है.
यह बयान मायावती की उस अंदरूनी बेचैनी को दिखाता है जो पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के भीतर पैदा हुई. मायावती यह संदेश देना चाहती हैं कि बीएसपी किसी एक परिवार की बपौती नहीं बल्कि अंबेडकरवादी आंदोलन की अमानत है. दीपिका आनंद का नाम आगे करके भी उन्होंने एक सुरक्षात्मक दायरा खींचा है-पहला यह कि दीपिका राजनीति की मुख्यधारा से बाहर हैं और दूसरा यह कि अगर वह नहीं आती हैं, तो किसी मिशनरी कार्यकर्ता को आगे किया जाएगा. इस तरह उन्होंने परिवारवाद के ठप्पे को भी हल्का करने की कोशिश की और घर के भीतर चल रही खींचतान पर भी कड़ा ताला जड़ दिया.
जेन-ज़ी (Gen-Z) कार्ड और 50 फीसदी युवाओं की भागीदारी का गणित
इस पूरे पारिवारिक फेरबदल के बीच मायावती ने एक और बड़ा ऐलान किया है, जिस पर गहराई से गौर करने की जरूरत है. वह है संगठन में ‘जेन-ज़ी’ और युवाओं को 50 प्रतिशत तक की सीधी भागीदारी देना. उत्तर प्रदेश की सियासत अब 90 के दशक वाली नहीं रही. आज का युवा वोटर न तो पुराने नारों से बंधा है और न ही सिर्फ जातिगत वफादारी के नाम पर वोट देता है. 18 से 25 साल का नया मतदाता रोजगार, तकनीक, शिक्षा और आक्रामक विमर्श चाहता है. मायावती इस बात को अच्छी तरह समझ रही हैं कि बीएसपी का कैडर बूढ़ा हो रहा है और नए दौर का दलित व पिछड़ा युवा चंद्रशेखर आजाद जैसे आक्रामक नेताओं की तरफ या फिर समाजवादी पार्टी के ‘पीडीए’ और बीजेपी के लाभार्थी वर्ग की तरफ आकर्षित हो रहा है.
यही वजह है कि मायावती ने ऐलान किया है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में युवाओं को प्राथमिकता दी जाएगी. टिकट बंटवारे में नए चेहरों और महिलाओं को आगे लाया जाएगा. दीपिका आनंद को आगे रखने का एक पहलू यह भी है कि वह खुद जेन-ज़ी पीढ़ी से आती हैं, उच्च शिक्षित हैं और कानून की पढ़ाई कर रही हैं. मायावती शायद यह जताना चाहती हैं कि बीएसपी सिर्फ पारंपरिक राजनीति नहीं कर रही, बल्कि वह एक पढ़ी-लिखी, आधुनिक और कानून को समझने वाली युवा पीढ़ी को संगठन से जोड़ना चाहती है. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या केवल प्रेस नोट जारी करने और सोशल मीडिया पर 50 फीसदी भागीदारी की बात लिखने से नया युवा बीएसपी से जुड़ जाएगा? आकाश आनंद युवाओं के बीच अपनी पैठ बना रहे थे, उनकी भाषा और तेवर युवाओं को अपील कर रहे थे. उन्हें हटाने के बाद जो खालीपन पैदा हुआ है, क्या उसे पर्दे के पीछे रहने वाली दीपिका या संगठन के पुराने चेहरे भर पाएंगे? यह एक बड़ा और अनुत्तरित सवाल है.
2027 की सियासी जमीन: बीएसपी कहां खड़ी है?
मायावती के इन तमाम फैसलों की असली परीक्षा 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में होनी है. अगर पिछले चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें तो बीएसपी की हालत बेहद चिंताजनक रही है:
- 2017 विधानसभा चुनाव: बीएसपी को करीब 22.24% वोट मिले थे और पार्टी ने 19 सीटें जीती थीं.
- 2022 विधानसभा चुनाव: पार्टी का वोट शेयर घटकर 12.88% पर आ गया और 403 सदस्यों वाली विधानसभा में बीएसपी सिर्फ 1 सीट (रसड़ा, बलिया) पर सिमट कर रह गई.
- 2024 लोकसभा चुनाव: उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से बीएसपी एक भी सीट नहीं जीत सकी और उसका वोट शेयर घटकर सिंगल डिजिट के करीब पहुंच गया.
यह आंकड़े साफ बताते हैं कि बीएसपी का कोर वोटर भी धीरे-धीरे छिटक रहा है. गैर-जाटव दलित वोटर पहले ही काफी हद तक बीजेपी के पाले में जा चुका है, जबकि संविधान बचाने की लड़ाई और आरक्षण के मुद्दे पर जाटव वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा 2024 में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन की तरफ मुड़ता दिखाई दिया. वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नगीना से सांसद बने चंद्रशेखर आजाद लगातार बीएसपी के विकल्प के रूप में खुद को स्थापित करने में जुटे हैं. चंद्रशेखर ने तो आकाश आनंद के निष्कासन के बाद उन्हें अपनी पार्टी में आने तक का खुला न्योता दे डाला है.
ऐसे नाजुक दौर में पार्टी के भीतर लगातार हो रहे फैसलों ने जमीनी कार्यकर्ताओं को भारी भ्रम में डाल दिया है. जो कार्यकर्ता कल तक आकाश आनंद जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे, फिर ईशान आनंद के समर्थन में पोस्ट लिख रहे थे, आज उन्हें समझ नहीं आ रहा कि पार्टी का भविष्य किस चेहरे के पीछे खड़ा है.
मास्टरस्ट्रोक या पार्टी के बीच भटकाव?
अगर निष्पक्ष नजरिए से देखें, तो मायावती के इस फैसले के दो पहलू हैं:
- पहला पहलू: मायावती ने यह कड़ा संदेश देकर अपनी पार्टी पर अपनी मुकम्मल पकड़ साबित कर दी है. उन्होंने साफ कर दिया कि पार्टी में वही रहेगा जो पूरी तरह उनके अनुशासन और बीएसपी के सिद्धांतों के तहत चलेगा, चाहे वह उनका सगा भतीजा ही क्यों न हो. परिवार के बेटों को सत्ता की दौड़ से बाहर करके उन्होंने बीजेपी, सपा और कांग्रेस के उन हमलों की धार कुंद कर दी है जो बीएसपी को पारिवारिक जागीर बताते थे. एक युवा, कानून की छात्रा दीपिका आनंद को संभावित विकल्प बनाकर उन्होंने भविष्य में एक स्वच्छ और महिला नेतृत्व की खिड़की भी खोल दी है.
- दूसरा पहलू: जमीनी राजनीति केवल आदर्शों और कड़े बयानों से नहीं चलती, वह मजबूत चेहरों और लगातार सक्रियता से चलती है. 2027 का चुनाव बीएसपी के अस्तित्व की लड़ाई है. ऐसे समय में जब पार्टी को लखनऊ की सड़कों से लेकर गांव-गांव तक धरने, प्रदर्शन और जनसंपर्क अभियान चलाने चाहिए थे, तब पार्टी अपने ही घर के भीतर उत्तराधिकारी की खोज और निष्कासन के चक्रव्यूह में उलझी दिख रही है. आकाश आनंद को बाहर करने से उन युवाओं में निराशा फैली है जो बीएसपी में एक नया, आक्रामक तेवर देखना चाहते थे. कांग्रेस और सपा जैसी पार्टियां इसका फायदा उठाने के लिए गिद्ध दृष्टि गड़ाए बैठी हैं. अगर आकाश किसी दूसरे दल का रुख करते हैं या अपनी अलग राह चुनते हैं, तो वह बीएसपी के कैडर वोट में एक और सेंध लगा सकते हैं.
मायावती की उलझन और बसपा का भविष्य
कुल मिलाकर देखें तो यह पूरा घटनाक्रम मायावती की गहरी राजनीतिक और व्यक्तिगत उलझन को उजागर करता है. एक तरफ वह अपनी उम्र और स्वास्थ्य के इस पड़ाव पर किसी ऐसे शख्स को अपने पास चाहती हैं जिस पर वह आंख मूंदकर भरोसा कर सकें और यह भरोसा उन्हें परिवार से बाहर किसी पर नहीं होता. दूसरी तरफ, वह यह भी नहीं चाहतीं कि परिवार का कोई युवा सदस्य इतना ताकतवर हो जाए कि वह पार्टी के फैसलों में उनके एकाधिकार को चुनौती देने लगे या उनके फैसलों पर सगे-संबंधियों का प्रभाव दिखे. मायावती का यह फैसला उनके सख्त अनुशासन और पार्टी पर उनकी पूरी पकड़ को तो साबित करता है, लेकिन 2027 की सियासी लड़ाई के लिहाज से यह बेहद जोखिम भरा है. उत्तर प्रदेश की राजनीति इस समय जिस ध्रुवीकरण और आक्रामकता के दौर में है, वहां सिर्फ सोशल मीडिया पर लंबे पोस्ट लिखने या परिवार के भीतर नए चेहरों की म्यूजिकल चेयर खेलने से चुनाव नहीं जीते जा सकते।
यदि बसपा को 2027 में वाकई खुद को प्रासंगिक बनाए रखना है, तो पार्टी को इन पारिवारिक पहेलियों से बाहर निकलना होगा। दीपिका आनंद आएं या कोई सामान्य मिशनरी कार्यकर्ता, जब तक पार्टी लखनऊ के बंगले से निकलकर यूपी के गांवों, कस्बों और दलित बस्तियों में अपनी पुरानी ‘कैडर कैंप’ वाली शैली में खड़ी नहीं होगी, तब तक न तो ‘हाथी’ की चाल तेज हो पाएगी और न ही सत्ता की वह मास्टर चाबी मिल पाएगी जिसका सपना बाबा साहेब और कांशीराम ने देखा था।

