जौनपुर: देवी तोरी सांवली बा सुरतिया, बसी गयु विंध्याचल पहाड़… फुहार पड़ते ही जब गांव की पगडंडियों पर मिट्टी की सोंधी खुशबू उठती थी. आम की डालियों पर झूले पड़ते थे और नईहर आई बेटियों की हंसी आंगन में गूंजती थी. तब इन्हीं देवी गीतों से कजरी की महफिल सजती थी. विंध्याचल की धरती पर मां विंध्यवासिनी की स्तुति से शुरू होने वाली यह कजरी महज गीत नहीं, बल्कि पूर्वांचल की सदियों पुरानी स्मृतियों, आस्था, प्रेम, विरह और लोकजीवन की जीवित तस्वीर है. इसकी धुन में सावन है, शब्दों में गांव है और भावों में पीढ़ियों से चली आ रही संस्कृति की गहरी छाप.
मनोरंज ही नहीं हमारी सांस्कृतिक पहचान है कजरी
कजरी की इसी पुरातन परंपरा, लोकगीतों और लोक प्रथाओं को सहेजने के लिए वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के संकायाध्यक्ष डॉ. मनोज मिश्रा लगातार सजगता से काम कर रहे हैं. लोक संस्कृति के अध्येता के तौर पर वह पुरानी पीढ़ियों से चले आ रहे गीतों, रीति-रिवाजों और सामूहिक लोक परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत पर जोर देते हैं. उनका मानना है कि लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि किसी समाज की स्मृति और उसकी सांस्कृतिक पहचान होते हैं. यही वजह है कि वह विलुप्त होती लोक परंपराओं को दर्ज करने और उनके महत्व को सामने लाने के लिए लगातार प्रयासरत हैं.
अकबर के दौर तक जाती है कजरी की लोककथा
डॉ. मनोज मिश्रा ने बाताया केि कजरी की परंपरा बेहद प्राचीन मानी जाती है. लोक मान्यताओं में इसका संबंध मुगल बादशाह अकबर के काल से भी जोड़ा जाता है. कहा जाता है कि जब अकबर चुनार की ओर बढ़ रहे थे, उस दौरान उन्हें रास्ते में अनेक विपत्तियों और प्राकृतिक परेशानियों का सामना करना पड़ा. स्थानीय लोगों ने उन्हें मां विंध्यवासिनी की आराधना करने की सलाह दी. इसी लोककथा में आगे देवी की स्तुति और राजा-रानी द्वारा मां के दरबार में नारियल, चुनरी और हार चढ़ाने का प्रसंग आता है. समय के साथ यही धार्मिक आस्था लोकस्वर में ढलती गई और सावन की कजरी का हिस्सा बन गई. हालांकि यह प्रसंग लोकमान्यता और लोकइतिहास के रूप में प्रचलित है, लेकिन इसने कजरी की सांस्कृतिक स्मृति में एक खास स्थान बना लिया है.
विंध्याचल से बनारस तक बिखरी कजरी की मिठास
कजरी का संसार केवल एक गांव या एक जिले तक सीमित नहीं रहा. पूर्वांचल से लेकर हिंदी भाषी क्षेत्रों तक इसकी अलग-अलग शैलियां विकसित हुईं. मिर्जापुर, विंध्याचल और बनारस की कजरी ने अपनी खास मिठास और गायकी के कारण अलग पहचान बनाई. डॉ. मिश्रा बताते हैं कि कजरी में जीवन के अनेक रंग दिखाई देते हैं. कहीं प्रिय के बिछड़ने का विरह है, कहीं मायके आई बेटी की खुशी, कहीं प्रेम और श्रृंगार है तो कहीं मां-बेटी और सखी-सहेलियों के रिश्तों की आत्मीयता. कजरी दरअसल गीत भर नहीं, बल्कि उस दौर के पूरे ग्रामीण जीवन का संगीत थी.
जब कजरी गाने के लिए जुटता था पूरा गांव
पुराने समय में कजरी अकेले सुनने का गीत नहीं थी. यह सामूहिक गायन की परंपरा थी. महिलाएं समूह बनाकर गीत गाती थीं. आंगन से लेकर खेतों की मेड़ तक और झूले से लेकर गांव की चौपाल तक कजरी की आवाज सुनाई देती थी. रात-रात भर धुनमुनिया कजरी और कजरी दंगल की परंपरा चलती थी. दो दल आमने-सामने होते और सवाल-जवाब की तर्ज पर गीतों का मुकाबला होता. शब्दों की चतुराई, सुर की मिठास और तत्काल रचना की क्षमता ही गायक की असली पहचान मानी जाती थी. डॉ. मनोज मिश्रा ने कहा कि डिजिटल युग ने लोगों के बीच भौतिक दूरी जरूर कम कर दी है, लेकिन लोकगीतों की सामूहिक परंपरा पर इसका असर पड़ा है.
पहले बेटियां सावन में मायके आती थीं और कई दिनों तक परिवार और सखियों के साथ रहती थीं. आज मोबाइल पर वीडियो कॉल के जरिए रोज बातचीत हो जाती है. ऐसे में वह इंतजार, वह मिलने की बेचैनी और वह भावनात्मक हूक पहले जैसी नहीं रही. युवा पीढ़ी कजरी सुनती जरूर है, सोशल मीडिया पर इसे पसंद भी करती है, लेकिन खुद समूह में बैठकर गाने की परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है.
