इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानपुर विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष, सचिव और प्रवर्तन जोन-4 प्रभारी को नोटिस जारी कर अवैध कॉलोनी के निर्माण पर जवाब मांगा है। कोर्ट ने पूछा कि बिना स्वीकृत ले-आउट प्लान के कॉलोनी कैसे बनी और अवैध निर्माण क्यों नहीं रोका गया। अगली सुनवाई 29 सितंबर को होगी।

Allahabad High Court
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानपुर विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष, सचिव और प्रवर्तन जोन-4 के प्रभारी अधिकारी को नोटिस जारी कर पूछा है कि कानपुर नगर के गंगापुर, मौजा देहली सुजानपुर स्थित नेहरू स्मारक सहकारी गृह निर्माण समिति लिमिटेड की कॉलोनी अवैध है, तो वह स्वीकृत ले-आउट प्लान के बगैर कैसे बन गई। कोर्ट ने यह भी पूछा है कि प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण को बिना रोक-टोक कैसे और किन परिस्थितियों में होने दिया गया।यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर एवं न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ रवि कुमार व एक अन्य की याचिका पर याची के अधिवक्ता अमित सिंह परिहार व ओंकार नाथ और प्राधिकरण व सरकारी वकील को सुनकर दिया है।
हाईकोर्ट ने केडीए से जवाब-तलब किया
कोर्ट ने प्राधिकरण को आदेश दिया कि जिस अवधि में यह अवैध कॉलोनी विकसित हुई, उस दौरान पद पर रहे सभी उपाध्यक्ष और सचिवों के नाम भी उजागर किए जाएं। उपाध्यक्ष, सचिव और प्रवर्तन जोन-4 के प्रभारी अधिकारी को 29 सितंबर तक व्यक्तिगत हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई भी 29 सितंबर को तय की गई है।
45 साल पुराने जमीन विवाद की दूसरी अपील खारिज
इसके अलावा इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महोबा की 18.14 एकड़ जमीन को मुस्लिम कब्रिस्तान बताए जाने से जुड़े करीब 45 साल पुराने विवाद में दाखिल दूसरी अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि वाद में आदेश एक नियम आठ सीपीसी के तहत प्रतिनिधिक वाद दायर करने का उल्लेख तो किया गया था, लेकिन इसके लिए अदालत से अनुमति मांगी ही नहीं गई। ऐसे में वाद को पूरी मुस्लिम बिरादरी की ओर से दायर प्रतिनिधिवाद नहीं माना जा सकता। इसका प्रभाव केवल मुकदमे के पक्षकारों तक सीमित रहेगा।
विवादित जमीन का 300 साल से हो रहा इस्तेमाल
यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने बाबूलाल बनाम शाहाबुद्दीन व अन्य की दूसरी अपील पर दिया। विवाद वर्ष 1970 में दाखिल मूल वाद से जुड़ा है। वादियों का कहना था कि महोबा के फतेहपुर बजरिया स्थित विवादित जमीन का इस्तेमाल करीब 300 वर्षों से मुस्लिम समुदाय के कब्रिस्तान के रूप में होता आ रहा है। वहां लगातार शव दफन किए जाते रहे हैं और बड़ी संख्या में कब्रें मौजूद हैं।
21 साल पुराने हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा निरस्त
वहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के करीब 21 साल पुराने मामले में अभियोजन साक्ष्य में गंभीर और सामूहिक खामियां पाए जाने पर तीन आरोपियों की उम्रकैद की सजा निरस्त कर दी। कोर्ट ने कहा कि मृतक की मौत गोली लगने से हुई, यह चिकित्सकीय साक्ष्य से साबित है, लेकिन अभियोजन यह संदेह से परे साबित नहीं कर सका कि वारदात अंजाम देने वाले यही आरोपी थे। संदेह का लाभ आरोपियों को दिया जाना जरूरी है। यह फैसला न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने सुखराम व अन्य की ओर से दाखिल आपराधिक अपील पर सुनाया।


