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सहारनपुर कलक्ट्रेट मस्जिद प्रकरण में मस्जिद पक्ष को झटका, जिला कोर्ट ने भी मानी सरकारी जमीन, Uttar-pradesh Hindi News

Admin by Admin
September 4, 2026
in उत्तर प्रदेश
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सहारनपुर कलक्ट्रेट मस्जिद प्रकरण में मस्जिद पक्ष को झटका, जिला कोर्ट ने भी मानी सरकारी जमीन, Uttar-pradesh Hindi News


उत्तर प्रदेश में सहारनपुर कलक्ट्रेट मस्जिद प्रकरण में मस्जिद पक्ष को झटका लगा है। जिला कोर्ट ने मस्जिद पक्ष की ओर से दाखिल याचिका को निरस्त कर दिया। अदालत के आदेश में भूमि को सरकारी भूमि माना गया है।

यूपी के सहारनुर कलक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद से जुड़े भूमि विवाद में जिला जज सतेंद्र कुमार की अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सिटी मजिस्ट्रेट अदालत के 16 जुलाई 2026 के आदेश को बरकरार रखा है। जिला अदालत ने मस्जिद पक्ष की ओर से दाखिल याचिका को निरस्त कर दिया। अदालत के आदेश में भूमि को सरकारी भूमि माना गया है। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने भूमि के स्वामित्व, पुराने राजस्व अभिलेखों, वक्फ संपत्ति के दावे और 1991 के वर्शिप एक्ट को लेकर अपनी-अपनी दलीलें और साक्ष्य अदालत के सामने रखे।

मस्जिद पक्ष की ओर से जिला जज की अदालत में याचिका दाखिल कर सिटी मजिस्ट्रेट न्यायालय के 16 जुलाई 2026 के आदेश को चुनौती दी गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि सिटी मजिस्ट्रेट अदालत ने मामले से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को दरकिनार करते हुए आदेश पारित किया। मस्जिद पक्ष ने अदालत में दलील दी कि संबंधित मस्जिद सुन्नी वक्फ बोर्ड में पंजीकृत है और इसलिए इसे वक्फ संपत्ति माना जाना चाहिए। पक्ष की ओर से यह भी कहा गया कि वक्फ संपत्ति से जुड़े विवाद की सुनवाई का अधिकार सुन्नी वक्फ सेंट्रल बोर्ड, लखनऊ को है।

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मस्जिद पक्ष ने दीं दलीले

सुनवाई के दौरान मस्जिद पक्ष ने 1991 के वर्शिप एक्ट का भी हवाला दिया। दलील दी गई कि इस कानून के तहत 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में रहे धार्मिक ढांचों की धार्मिक स्थिति को यथावत रखने का प्रावधान है। इसके अलावा मस्जिद पक्ष ने खेवट नंबर 10/1 का उल्लेख करते हुए कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में यह भूमि वाहिद खान और याकूब खान के नाम दर्ज है और संपत्ति 1947 से पहले की है। अपने दावे के समर्थन में पक्ष की ओर से एक जनवरी 1911 के बिजली बिल, नगर पालिका परिषद में दर्ज नाम सहित अन्य दस्तावेज भी अदालत के समक्ष पेश किए गए।

सरकारी पक्ष ने पुराने राजस्व रिकॉर्ड को बनाया आधार

शासकीय अधिवक्ता विनय चौहान और सहायक शासकीय अधिवक्ता अविनाश त्यागी ने सरकार की ओर से पक्ष रखा। सरकारी अधिवक्ताओं ने मस्जिद पक्ष की ओर से पेश किए गए दस्तावेजों और भूमि संबंधी दावों पर सवाल उठाए। सरकारी पक्ष की ओर से अदालत में दलील दी गई कि जिस बिजली बिल को साक्ष्य के तौर पर प्रस्तुत किया गया है, वह रविवार के अवकाश वाले दिन का है। साथ ही बिजली व्यवस्था के इतिहास से जुड़े तथ्यों का हवाला देते हुए कहा गया कि महानगर में वर्ष 1922 में बिजली पहुंची थी और उसका वितरण वर्ष 1928 से शुरू हुआ था।

शासकीय अधिवक्ताओं ने भूमि के पुराने राजस्व रिकॉर्ड का हवाला देते हुए बताया कि खसरा नंबर 539, रकबा 5.780 हेक्टेयर, ग्राम पठानपुरा, तहसील और जिला कचहरी कलक्ट्रेट क्षेत्र में स्थित है। उनके अनुसार फसली वर्ष 1296, जो 1888-89 के बराबर है, के रिकॉर्ड में यह भूमि केसर-ए-हिंद के नाम दर्ज है। साथ ही रिकॉर्ड में कलक्ट्रेट-कचहरी का भी उल्लेख है। सरकारी पक्ष ने अदालत को बताया कि बाद में यह भूमि भारत सरकार को हस्तांतरित हो गई।



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