हॉकी अंपायरिंग को बेहद कठिन और संघर्षपूर्ण करियर बताते हुए भारतीय दिग्गजों ने विश्व कप में करीब तीन दशक बाद एक भी भारतीय अंपायर नहीं होने पर निराशा जताई है। उनका कहना है कि हमें गुणवत्ता पर फोकस करना होगा।
हॉकी विश्व कप 2026 की शुरुआत 15 अगस्त से हो रही है। नीदरलैंड और बेल्जियम की मेजबानी में टूर्नामेंट खेला जाना है। भारतीय टीम का ऐलान हो चुका है, लेकिन इस गेम का एक दूसरा पहलू यह भी है कि कोई भी भारतीय अंपायर इस विश्व कप में अंपायरिंग नहीं करेगा। यही कारण है कि हॉकी अंपायरिंग को बेहद कठिन और संघर्षपूर्ण करियर बताते हुए भारतीय दिग्गजों ने विश्व कप में करीब तीन दशक बाद एक भी भारतीय अंपायर नहीं होने पर निराशा व्यक्त की है और कहा कि अंपायरों की संख्या बढाने की बजाय गुणवत्ता पर फोकस करना होगा।
नीदरलैंड के यूट्रेक्ट में 1998 में हुए विश्व कप के बाद पहली बार टूर्नामेंट के अंपायरों या तकनीकी अधिकारियों में किसी भारतीय को जगह नहीं मिली है और सूची में यूरोपीय देशों का बोलबाला है। आधिकारिक तौर पर तो नहीं, बल्कि हॉकी को भारत का नेशनल गेम कहा जाता है, लेकिन अंपायरिंग में यह हालात अच्छे नहीं हैं। भारत के आरवी रघु प्रसाद (2010, 2014, 2018, 2023) , सतिंदर शर्मा (2002, 2006, 2010) , तरलोक सिंह भुल्लर (1994) और अमरजीत सिंह बावा (1990) विश्व कप में अंपायरिंग कर चुके हैं।
क्या होता है अंपायर के लिए मानदंड?
पिछले साल 47 वर्ष की उम्र होने पर रिटायर होने से पहले ओलंपिक समेत 200 मैचों में अंपायरिंग करने वाले पहले एशियाई रघुप्रसाद ने भाषा से बातचीत में कहा, ”बड़े टूर्नामेंटों में अंपायरों की नियुक्तियां एफआईएच अंपायरिंग समिति करती है, जिसके लिये पिछले बड़े टूर्नामेंटों, प्रो लीग वगैरह में प्रदर्शन मानदंड रहता है।”
वहीं, कई ओलंपिक और विश्व कप में अंपायरिंग कर चुके शर्मा ने कहा, ”बावा सर, भुल्लर सर के बाद मैंने और रघु ने यह सिलसिला कायम रखा था। हमने यूरोपीयों के बीच जाकर अपनी पहचान बनाई थी जो आसान नहीं थी। बीजिंग ओलंपिक 2008 में हमारी टीम क्वालीफाई नहीं कर सकी थी, लेकिन मैं अकेला अधिकारी था जो भारतीय हॉकी का प्रतिनिधि था। चयन के लिए प्रदर्शन में निरंतरता और अनुभव काफी मायने रखता है, जहां मुझे लगता है कि अब हम पिछड़ रहे हैं।”
100 से अधिक अंपायर हैं हॉकी इंडिया में
हॉकी इंडिया की वेबसाइट पर मई 2025 में अपडेट की गई सूची के अनुसार अंपायरों की चार श्रेणियां ‘कोर लीडिंग पैनल’, ‘लीडिंग पैनल’, ‘हाई पोटेंशियल’ और ‘नेशनल अंपायर’ हैं, जिनमें मेंस कैटेगरी में क्रमश: 100 से अधिक और महिला वर्ग में 70 से अधिक नाम दर्ज हैं। मेंस कैटेगरी में छह एफआईएच पैनल के अंपायर हैं, जिनमें से रघुप्रसाद पिछले साल रिटायर हो चुके हैं। वहीं, वुमेंस कैटेगरी में एफआईएच पैनल की चार अंपायर हैं।
तकनीकी अधिकारियों में महिला वर्ग में इन्हीं चार श्रेणियों में 50 से अधिक नाम हैं, लेकिन एफआईएच पैनल में सिर्फ दो अधिकारी रोहिणी बोपन्ना और सोनिया बाथला हैं। पुरुष वर्ग में करीब 70 नाम हैं, लेकिन एफआईएच पैनल के चार ही अधिकारी इसमें शामिल हैं। शर्मा ने कहा कि संख्या की बजाय गुणवत्ता पर फोकस करना जरूरी है और इसके लिये अंपायरों को अधिक एक्सपोजर देना होगा।
उन्होंने कहा, ”घरेलू अंपायर बड़े टूर्नामेंटों में अंपायरिंग नहीं करेंगे तो अंतरराष्ट्रीय स्तर का अनुभव कैसे मिलेगा। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय अंपायरिंग में जमीन आसमान का फर्क है। भारतीय टीमों के शिविर में भी अंपायरों को साथ रखा जाना चाहिये। हमारे पास प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन अंपायरों को भी मेहनत करनी होगी और महासंघ को इसमें सहयोग देना होगा।”
उन्होंने कहा, ”अंपायरों के विकास के लिए सही प्लानिंग और ढांचे की जरूरत है, ताकि अगले विश्व कप या ओलंपिक में हमारा प्रतिनिधित्व रहे।” 1994 में अंपायरिंग से विदा ले चुके बावा भारतीय टीम के साथ दौरों पर जाते थे, जिसमें 1981 का यूरोप दौरा और 1983 में पाकिस्तान में टेस्ट श्रृंखला शामिल है। लाहौर विश्व कप 1990 और सियोल ओलंपिक 1988 में अंपायरिंग कर चुके बावा ने कनाडा से भाषा से कहा, ”उस दौर में अंपायरों को खेल का हिस्सा नहीं माना जाता था, लेकिन मैंने हालात बदलने की कोशिश की। जब मैंने शुरुआत की जब 20 रुपये रोज भत्ता मिलता था, जिसे केपीएस गिल के दौर में मैंने बढवाकर 100 रुपये कराया।”
उन्होंने बताया, ”तब अंपायरों को कोई पदक या सोवेनियर नहीं दिये जाते थे, लेकिन 1977 में अमृतसर में रणजीत सिंह टूर्नामेंट के दौरान हमने सुनिश्चित कराया कि अंपायरों को भी सम्मान और स्मृति चिन्ह दिये जायें।” तीनों दिग्गजों ने कहा कि इस पेशे में वित्तीय सुरक्षा नहीं है और महज जुनून के लिये वे इससे जुड़े रहे। शर्मा ने कहा, ”हमारे समय में 150 या 200 रुपये रोज और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में 40 से 50 डॉलर भत्ता मिलता था जो हमारा महासंघ ही देता था। अगर आप किसी टूर्नामेंट में तटस्थ हैं तो टूर्नामेंट का मेजबान बोर्डिंग, लॉजिंग और 40-50 डॉलर दैनिक भत्ता देता है। हमारे अधिकांश अंपायरों के पास नौकरी नहीं है और घरेलू टूर्नामेंटों पर ही काम चल रहा है।”
पिछले साल संन्यास के बाद काफी प्रयासों के बाद निजी नौकरी कर रहे रघु ने कहा, ”जब तक अंपायरिंग की, उसी पर फोकस रहा और नौकरी के बारे में सोचा नहीं। केएसएचए में नौकरी निजी कारणों से छोड़नी पड़ी। अभी अपने प्रयासों से एक निजी नौकरी शुरू की है, लेकिन उतनी कमाई नहीं है। कोई भी मां बाप ऐसे हालात में बच्चे को अंपायर क्यो बनाना चाहेंगे।”
उन्होंने कहा ,”खिलाड़ियों को उत्कृष्ट प्रदर्शन के बाद पुरस्कार और सरकारी नौकरी मिल जाती है, लेकिन अंपायरों को कोई पुरस्कार या वेतन नहीं मिलता। जो अंपायर नौकरी कर रहे हैं, उन्हें कभी कभार टूर्नामेंटों के लिये छुट्टी नहीं मिलती। एक महिला अधिकारी ने तो यह भी कहा कि कई बार महासंघ से सहयोग नहीं मिलता और पक्षपात के कारण आगे की संभावना खत्म हो जाती है।









