ओबरा/सोनभद्र. @सौरभ गोस्वामी…….

जनपद के औद्योगिक नगर ओबरा के मुख्य चौराहे पर स्थित हनुमान मंदिर के सामने रोजाना बड़ी संख्या में मासूमों को भिक्षा के लिए देखा जा सकता है, जो सामाजिक व्यवस्था और प्रशासनिक दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। आस्था के केंद्र इस मंदिर पर जहाँ भक्त शीश झुकाने आते हैं, वहीं बाहर बैठे 3 से 13 वर्ष के लगभग 20 से 25 बच्चे बुनियादी सुविधाओं से वंचित होकर भिक्षा मांगकर जीवन यापन करने को मजबूर हैं।
सामाजिक तानाबाना से इतर इनका पारिवारिक और सामाजिक स्तर अत्यंत दयनीय है। इनमें से कई बच्चों के सिर से माता-पिता का साया उठ चुका है, तो कई के माता-पिता कबाड़ बीनकर किसी तरह गुजर-बसर करने को मजबूर हैं। गरीबी और अशिक्षा के कारण ये बच्चे बचपन से ही शिक्षा से दूर हो गए हैं और समाज में इनका अनादर हो रहा है। विशेषकर मंगलवार और शनिवार को जब मंदिर में भीड़ होती है, तो ये बच्चे प्रसाद और चंद सिक्कों की आस में कतारों में और आसपास मंडराते नजर आते हैं।
बाकी दिनों में ये पूरे नगर में घूम-घूम कर भिक्षावृत्ति करते देखे जाते हैं।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह दृश्य नगर के सबसे प्रमुख चौराहे का है, जहाँ से हर शाम जिले और शासन-प्रशासन के बड़े अधिकारियों का आवागमन होता है। बावजूद इसके इन बच्चों की दुर्दशा और बदहाल स्थिति न तो शासन को दिखाई देती है और न ही प्रशासन को।
नगर का प्रबुद्ध वर्ग और आम जनमानस जब इन बच्चों को देखता है, तो मन में यही सवाल उठता है कि क्या इनके बेहतर भविष्य के लिए शासन-प्रशासन की कोई जिम्मेदारी नहीं है? यह दृश्य कतई शोभनीय नहीं है और समाज के लिए चिंता का विषय है।
संविधान और कानून में बाल अधिकारों को लेकर तमाम व्यवस्थाएं होने के बाद भी ओबरा में बचपन का यूँ सड़क पर होना, सोई हुई प्रशासनिक व्यवस्था को जगाने और सवाल पूछने के लिए विवश करता है।