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Ghaziabad News : गाजियाबाद की हाईटेक कॉलोनियों और ऊंची-ऊंची इमारतों के बीच 97 साल पुराना एक प्राइमरी स्कूल जर्जर हालत में खड़ा है. टूटी छत, बदहाल कमरे और सुविधाओं के अभाव में यहां पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य अध…और पढ़ें
करीब 97 साल पुराने इस स्कूल में फिलहाल केवल 4 कमरे हैं. यहां कक्षा 1 से 5 तक की पढ़ाई होती है. तीन सहायक अध्यापक और 80 बच्चे हर दिन यहां आते हैं. आसपास के मोहल्लों पंजाब लाइन, कीर्तन वाली गली, माधवपुरा और सुंदरपुरी से बच्चे पहुंचते हैं. तंग जगह, छोटे कमरे और सीमित संसाधनों के बावजूद बच्चे पूरे उत्साह से पढ़ाई करते हैं.
स्कूल की शिक्षिकाओं का कहना है कि पढ़ाई कराने में कई मुश्किलें आती हैं. बरसात में टीन शेड से पानी टपकता है, कमरे बहुत छोटे हैं और बाहर की दीवारें भी टूटी-फूटी हालत में हैं. उनका कहना है कि अगर सरकार मदद करे तो यहीं पर अतिरिक्त कमरे बनाए जा सकते हैं. विद्यालय की अध्यापक रीना सिंह का कहना है कि कहीं और नया स्कूल बना दिया गया तो छोटे-छोटे बच्चों के लिए वहां तक पहुंचना बहुत कठिन होगा. वे दूर जाने से स्कूल छोड़ भी सकते हैं. इसलिए बदलाव यहीं होना चाहिए. यही स्कूल उनकी पहचान है और बच्चे भी यहीं पढ़ना चाहते हैं. यह अपील सिर्फ पढ़ाई की मजबूरी नहीं बल्कि बच्चों के भविष्य से जुड़ी जिम्मेदारी है.
अतीत की झलक दिखाता बजरिया का स्कूल
गाजियाबाद आज बड़े-बड़े मॉल और ऊंची-ऊंची इमारतों से भले ही चमक रहा हो लेकिन बजरिया का यह स्कूल अब भी अतीत की झलक दिखाता है. यह सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं बल्कि शहर की विरासत का हिस्सा है. 1928 से शुरू हुआ यह सफर आज भी जारी है. फर्क बस इतना है कि कभी यहां पढ़ाई के लिए जगह और सुकून था और अब बच्चे छोटे-छोटे कमरों में सिमटकर पढ़ने को मजबूर हैं.
स्कूल और विरासत बचाने के लिए पहल जरूरी
स्कूल के बाहर से गुजरते वक्त शायद ही कोई उस टूटी दीवार या जर्जर टीन शेड पर गौर करे. लेकिन अंदर बैठकर पढ़ते बच्चों के लिए यही रोज की हकीकत है. जरूरत है कि इस ऐतिहासिक स्कूल की ओर ध्यान दिया जाए. यह ध्यान सिर्फ बच्चों की पढ़ाई के लिए ही नहीं बल्कि उस इतिहास और विरासत को बचाने के लिए भी जरूरी है जो हमें यह याद दिलाती है कि गाजियाबाद कभी चार दरवाजों के अंदर बसने वाला शहर हुआ करता था.

