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Supreme Court on Allahabad High Court: सुप्रीम कोर्ट ने 2003 के एक हत्या के प्रयास के मामले में दो दोषियों को प्रोबेशन पर रिहा करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कहा कि अपराध की क्रूरता को नजरअंदाज किया गया. कोर्ट ने कहा कि गलत सहानुभूति की वजह से दोषी एक दिन भी जेल नहीं गए. सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों को दो हफ्ते के भीतर सरेंडर करने का आदेश दिया है.
इलाहाबाद कोर्ट के किस फैसले पर गुस्सा हुआ सुप्रीम कोर्ट.
Supreme Court On Allahabad High Court: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले पर नाराजगी जताई. साल 2003 के एक चर्चित मामले में हाईकोर्ट के फैसले पर नराजगी जताई. दरअसल, चाकू और बंदूक से जानलेवा हमला करने वाले दो दोषियों को अच्छे आचरण के आधार पर प्रोबेशन दे दिया गया था. हिंदुस्तान टाइम्स में लिखी रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की. अदालत ने कहा कि अपराध की क्रूरता को नजरअंदाज करने और गलत सहानुभूति की वजह से दोषी बिना एक भी दिन जेल की सजा काटे खुलेआम घूमते रहे.
यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले का है जहां व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता यानी बिजनेस राइवलरी के चलते आरोपियों ने शिकायतकर्ता की दुकान के पास ही विवाद के बाद उस पर जानलेवा हमला कर दिया था. घटना के दिन एक आरोपी धारदार हथियार और दूसरा आरोपी बंदूक से लैस होकर आया था जिन्होंने मिलकर पीड़ित पर ताबड़तोड़ वार किए और उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया था. पीड़ित को लहूलुहान और बेहोशी की हालत में बहराइच अस्पताल में भर्ती कराया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने इस बात पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया कि पीड़ित पिछले कई सालों से इस हमले के दर्द और परिणामों को झेल रहा है.
ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली पर उठाए गए सवाल
शीर्ष अदालत ने न केवल हाईकोर्ट बल्कि ट्रायल कोर्ट के रवैये पर भी कड़ी आपत्ति जताई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा हत्या के प्रयास यानी धारा 307 आईपीसी के बजाय हल्की धारा यानी धारा 308 आईपीसी के तहत आरोप तय करना भी गलत था. बेंच ने कहा कि यह समझ से परे है कि हाईकोर्ट ने यह कैसे मान लिया कि पिछले 22 सालों से आरोपी भुगत रहे हैं जबकि हकीकत यह थी कि जमानत पर बाहर होने के बाद वे मजे से अन्य आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त थे. अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल पहली बार अपराधी होने यानी फर्स्ट ऑफेंडर का मतलब यह नहीं है कि प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट की धारा 4 का आंख मूंदकर इस्तेमाल किया जाए.
दोषियों को दो हफ्ते में सरेंडर करने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के आदेश को पूरी तरह से रद्द करते हुए सभी दोषियों को दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण यानी सरेंडर करने का निर्देश दिया है. अदालत ने साफ किया है कि यदि निर्धारित समय के भीतर आरोपी सरेंडर नहीं करते हैं तो बहराइच के अतिरिक्त सत्र न्यायालय द्वारा उन्हें तुरंत गिरफ्तार करने की कार्रवाई की जाएगी. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि जब तक आरोपी हिरासत में नहीं लिए जाते तब तक हाईकोर्ट इस मामले की अपील पर आगे सुनवाई नहीं करेगा.
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सिविल सर्विसेज की तैयारी करते-करते कब 4 साल पहले पत्रकारिता की ओर झुकाव हो गया पता ही नहीं चला. नाम दीप राज दीपक है. वर्तमान में News18 हिंदी के साथ जुड़े हुए हैं. पद सब-एडिटर …

