नई दिल्ली. द ग्रेट गामा की कहानी मह एक पहलवान की कहानी नहीं है. यह दृढ़ संकल्प, कठोर अनुशासन और इंसानी क्षमता की उस पराकाष्ठा की दास्तान है, जिसे आज के मॉडर्न युग में भी कोई पार नहीं कर पाया है. पचास साल के पेशेवर कुश्ती करियर में एक भी मुकाबला न हारने वाला यह पांच फीट सात इंच का पंजाबी पहलवान आधुनिक खेल इतिहास का सबसे बड़ा अनसुलझा रहस्य है.
साल 1878 में अमृतसर के एक पारंपरिक कुश्ती परिवार में जन्मे गामा (Gama) ने बहुत कम उम्र में ही अखाड़े की धूल फांकना शुरू कर दिया था. महज दस साल की उम्र में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर के कुश्ती टूर्नामेंट्स में अपनी छाप छोड़नी शुरू कर दी थी. भारतीय कुश्ती परंपरा का वह दौर अखाड़ों के नाम था, जहां आधुनिक जिम या मशीनों का कोई अस्तित्व नहीं था. केवल लाल मिट्टी, कसरत और देसी खुराक ही पहलवान की दुनिया होती थी.
लोहे जैसा शरीर बनाने का खौफनाक ट्रेनिंग रूटीन
गामा की रोज की ट्रेनिंग किसी आम इंसान के लिए असंभव थी. वह रोज सुबह और शाम मिलाकर पांच हजार ‘बैठक’ यानी डीप स्क्वैट और तीन हजार ‘दंड’ यानी डिपिंग पुश-अप्स लगाते थे. यह कसरत शरीर को लोहे जैसा मजबूत बनाने के लिए काफी थी, लेकिन असली चुनौती इसके बाद शुरू होती थी. इसके बाद वे अखाड़े में अपने समय के चालीस बेहतरीन पहलवानों के साथ एक-एक करके कुश्ती लड़ते थे. तब तक मुकाबला जारी रहता था जब तक सामने वाला आखिरी पहलवान चित न हो जाए. इस खौफनाक ट्रेनिंग रूटीन ने उनके शरीर को एक ऐसे यंत्र में बदल दिया था, जिसे भेदना नामुमकिन था.
देसी घी और दूध से बनी अजेय ताकत
इस कठोर तपस्या का ईंधन उनकी डाइट थी, जो पूरी तरह से देसी और भारी-भरकम थी. गामा रोजाना दस लीटर दूध पीते थे, जिसमें बादाम की कुटी हुई लुगदी का टॉनिक मिलाया जाता था. इसके अलावा आधा किलो घी और छह पाउंड मक्खन उनके रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा था. मुर्गा, मटन और शुद्ध डेयरी उत्पादों से भरपूर यह खुराक उनके शरीर की ऊर्जा को बनाए रखती थी. इस डाइट और वर्कआउट के दम पर उनका शरीर दूध, मक्खन और घी से गढ़ी हुई एक ऐसी मूरत बन गया था, जिसे कोई गिरा नहीं सका.
लंदन के अखाड़े में दुनिया के चैंपियंस को दी चुनौती
वर्ष 1910 में गामा ने लंदन की ओर रुख किया और दुनिया भर के पहलवानों को खुली चुनौती दी. उस समय पश्चिमी देशों के पहलवान खुद को दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान मानते थे. गामा ने वहां पहुंचकर चंद मिनटों में ही अमेरिकी चैंपियन को धूल चटा दी. इसके बाद उनका मुकाबला पोलैंड के विश्व चैंपियन स्टैनिस्लाव जिब्सको से हुआ. यह मुकाबला कुश्ती इतिहास का सबसे लंबा और चर्चित मुकाबला बन गया. गामा के खौफ से जिब्सको तीन घंटे तक जमीन पर लेटकर मैट से टस से मस नहीं हुए ताकि हार से बचा जा सके. जब दोबारा मुकाबले की बारी आई, तो जिब्सको रिंग में उतरे ही नहीं, जिसके बाद गामा को अजेय विश्व चैंपियन घोषित कर दिया गया. उस दौर के महान पहलवान फ्रैंक गॉच और हैकेंसमीड को भी गामा ने ललकारा, लेकिन किसी की भी उनसे मुकाबला करने की हिम्मत नहीं हुई.
दंगों के बीच इंसानियत की मिसाल और आखिरी सफर
गामा का जीवन केवल अखाड़े तक सीमित नहीं था, बल्कि उनका दिल भी उनके शरीर जितना ही विशाल था. साल 1947 में जब देश का विभाजन हुआ और चारों तरफ नफरत की आग सुलग रही थी, तब गामा ने लाहौर की एक सड़क पर खड़े होकर अकेले एक उग्र भीड़ का सामना किया था. उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना अपने हिंदू पड़ोसियों की रक्षा की, जो उनकी इंसानियत और महानता का सबसे बड़ा सबूत था. पचास की उम्र पार करने के बाद भी वे अखाड़े में उतरते रहे और जीवनभर अपराजित रहे. 1960 में लाहौर में चौरासी वर्ष की आयु में इस महान योद्धा ने अंतिम सांस ली.
ब्रूस ली भी थे गामा की ट्रेनिंग के मुरीद
उनकी महानता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मार्शल आर्ट्स के लीजेंड ब्रूस ली (Bruce Lee) ने भी गामा की ट्रेनिंग और उनके स्क्वैट्स के तरीकों का बारीकी से अध्ययन किया था और उन्हें अपनी दिनचर्या में शामिल किया था. आज के आधुनिक पहलवान अपनी डाइट के लिए सप्लीमेंट्स और प्रोटीन पाउडर का सहारा लेते हैं, लेकिन गामा ने जो मुकाम हासिल किया, वह शुद्ध देसी घी, मक्खन और दूध की ताकत से बना था.
खेल इतिहास का सबसे बड़ा अनसुलझा रहस्य
द ग्रेट गामा (The Great Gama) ने साबित कर दिया कि असाधारण सफलता शॉर्टकट से नहीं, बल्कि बेदाग अनुशासन और अटूट मेहनत से मिलती है. खेल जगत ने उनके बाद एक सदी बिता दी है, लेकिन आज भी वह अजेय हैं और खेल विज्ञान आज भी उनके इस अमानवीय अनुशासन के सामने हैरान खड़ा है.
