चंदौली: जिले के एक सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले नन्हे बच्चे अपनी प्रतिभा से लोगों को हैरान कर रहे हैं. पीएमश्री कंपोजिट प्राथमिक विद्यालय, चंदौली की छात्रा आस्था कुमारी अपनी कल्पनाशक्ति से कहानियां लिखती हैं, तो उनके भाई अभिमान चौधरी ने इलेक्ट्रॉनिक सामान और मोटर की मदद से ड्रोन का मॉडल तैयार किया है. बच्चों की इस रचनात्मकता के पीछे शिक्षकों के प्रयास, प्रयोग आधारित शिक्षा और सही मार्गदर्शन की अहम भूमिका है. इन बच्चों की प्रतिभा देखकर शिक्षकों, अभिभावकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी उम्मीद है कि यही नन्हे कदम भविष्य में बड़े बदलाव की नींव बनेंगे.
बच्चों को सवाल पूछने का मिल रहा मौका
स्विट्जरलैंड के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे का मानना था कि बच्चा अपने आसपास की दुनिया को समझने के लिए प्रयोग करता है और एक छोटे वैज्ञानिक की तरह सीखता है. चंदौली के इन बच्चों की गतिविधियां इस विचार को समझने का एक अच्छा उदाहरण पेश करती हैं. यहां बच्चों को केवल किताबों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें सवाल पूछने, पहेलियां सुलझाने, नई कहानियां गढ़ने और अपने विचारों को व्यवहार में उतारने के लिए प्रेरित किया जा रहा है.
इस पहल से जुड़े धनंजय कुमार ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि वह पहले विश्व बैंक में सीनियर इंडस्ट्रियल इकोनॉमिस्ट के रूप में काम कर चुके हैं. दुनिया को करीब से देखने और समाज की समस्याओं को समझने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि बदलाव की शुरुआत बच्चों की सोच विकसित करने से हो सकती है. उन्होंने कहा कि यदि बच्चे शुरुआत से ही समस्याओं को पहचानना और उनके समाधान के बारे में सोचना सीखें, तो भविष्य में समाज को बेहतर दिशा दी जा सकती है.
पजल गेम से बच्चों की सोच को मिल रही धार
विद्यालय की सहायक अध्यापिका प्रिया रघुवंशी ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि आस्था और अभिमान उनके स्कूल के विद्यार्थी हैं. करीब 3 से 4 साल पहले बच्चों के बीच प्रयोग आधारित शिक्षा और रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देने की पहल शुरू हुई. इसी क्रम में विद्यालय को पजल गेम, शैक्षणिक सामग्री और कहानियों की किताबें उपलब्ध कराई गईं.
प्रिया रघुवंशी ने बताया कि जब पहली बार बच्चों को पजल गेम हल करने के लिए दिया गया, तो उन्हें इसे पूरा करने में करीब एक घंटा लगा. अभ्यास बढ़ने के साथ बच्चों की गति में सुधार हुआ. धीरे-धीरे वे आधे घंटे और फिर 10 मिनट में पहेली सुलझाने लगे. अब कुछ बच्चे उसी पहेली को महज 2 मिनट में पूरा कर लेते हैं. शिक्षिका ने बताया कि इस प्रक्रिया में बच्चे केवल पहेली के टुकड़े जोड़ना नहीं सीखते, बल्कि धैर्य, तर्क, समस्या का समाधान ढूंढने और बार-बार प्रयास करने का महत्व भी समझते हैं.
अधूरी कहानी से बच्चों में विकसित हो रही कल्पनाशक्ति
प्रिया रघुवंशी बच्चों को कहानियां सुनाते समय कई बार जानबूझकर उनका अंत अधूरा छोड़ देती हैं. इसके बाद बच्चों से पूछा जाता है कि कहानी आगे कैसे बढ़ सकती है, किसी पात्र ने ऐसा क्यों किया और अगर वे उस परिस्थिति में होते, तो क्या करते. इन सवालों का जवाब देते हुए बच्चे अपनी कल्पना से नई कहानियां तैयार करते हैं और उन्हें लिखना भी सीखते हैं. बच्चों की लिखी कहानियों को संकलित करने की पहल भी की गई है. शिक्षिका ने बताया कि बच्चों को अपनी बात कहने और स्वतंत्र रूप से सोचने का अवसर मिलने से उनके आत्मविश्वास में वृद्धि होती है.
अभिमान का ड्रोन बना चर्चा का विषय
आस्था कुमारी अपनी कहानियों और कविता सुनाने की प्रतिभा से लोगों का ध्यान खींच रही हैं. वहीं उनके भाई अभिमान चौधरी ने इलेक्ट्रॉनिक सामान की मदद से ड्रोन का मॉडल तैयार किया है. अभिमान ने बताया कि इसे बनाने के लिए उन्होंने मोटर, बैटरी, पंखे और अन्य जरूरी पुर्जों का इस्तेमाल किया. उसने बताया कि मोबाइल पर ड्रोन को देखने के बाद उन्हें भी इसे बनाने का विचार आया. बच्चे की इस कोशिश ने दिखाया कि सीमित संसाधनों के बावजूद जिज्ञासा और प्रयोग करने की इच्छा से नई चीजें बनाने की शुरुआत की जा सकती है. हालांकि, इस मॉडल की तकनीकी क्षमता और वास्तविक उपयोगिता का आकलन अलग से किया जाना जरूरी है.
बच्चों की उपलब्धियों पर गर्व
विद्यालय के प्रधानाचार्य विजय शंकर सिंह ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि उन्होंने आस्था को पहले भी कविता और कहानियां सुनाते देखा था. उनकी प्रतिभा और सीखने की लगन से वह प्रभावित हैं. आस्था की मां मिमांसा कुमारी ने भी शिक्षकों की भूमिका की सराहना करते हुए लोकल 18 से कहा कि बच्चे स्कूल में पढ़ाई के साथ नई चीजें सीख रहे हैं और खुश रहते हैं.
उन्होंने बताया कि विद्यालय में बच्चों को मिल रहा प्रोत्साहन उनके विकास में मददगार है. वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार ने बताया कि बच्चों की सोच को आगे बढ़ाने वाली ऐसी शिक्षा देश के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है. चंदौली के इन बच्चों की कहानी यही संदेश देती है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि बच्चों में सवाल पूछने, कल्पना करने और खुद कुछ नया करने की क्षमता विकसित करना भी है.

