नई दिल्ली. फिल्म ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्जवल निकम’ 26/11 के भयानक मुंबई टेरर अटैक के बाद देश की सबसे बड़ी कानूनी लड़ाई और गुनहगारों को सजा दिलाने के लंबे प्रोसेस पर आधारित है. फिल्ममेकर इस कहानी को सिर्फ एक टेररिस्ट अटैक के डर तक सीमित नहीं रखते, बल्कि कोर्ट के बंद कमरों में सच और झूठ के बीच लंबी लड़ाई पर फोकस करते हैं, जहां हर सबूत और तर्क देश का भविष्य तय करते हैं. राजकुमार राव जैसे अनुभवी एक्टर की दमदार परफॉर्मेंस और एक सीरियस सब्जेक्ट के साथ यह फिल्म थिएटर में गहरा असर छोड़ती है. तो आइए, इस फिल्म के सभी पहलुओं को डिटेल में एनालाइज करते हैं.
कहानी
‘प्रहार’ की कहानी 26/11 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद शुरू होती है, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. फिल्म का मेन फोकस स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर उज्ज्वल निकम की ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई है, जो अजमल कसाब को सजा दिलाने के लिए लड़ी गई थी, जो अकेला जिंदा पकड़ा गया आतंकवादी था. डायरेक्टर की कहानी सबूत इकट्ठा करने और उसे कोर्ट में कानून के दायरे में साबित करने के मुश्किल काम को दिखाती है, न कि भावनाओं में बहकर. कसाब के डिफेंस लॉयर अब्बास काजमी और उज्ज्वल निकम के बीच कानूनी लड़ाई फिल्म की रीढ़ है. निकम की प्रोफेशनल जिंदगी और उनके निजी पारिवारिक संघर्ष (खासकर उनके बेटे अनिकेत के साथ उनके खराब रिश्ते) भी कहानी में बुने गए हैं, हालांकि यह सबप्लॉट कभी-कभी मुख्य केस से ध्यान भटका देता है.
एक्टिंग
राजकुमार राव (उज्ज्वल निकम के रूप में): राजकुमार राव ने एक बार फिर एक मुश्किल किरदार को गहराई के साथ निभाने की अपनी काबिलियत साबित की है. कोर्टरूम में तीखे डायलॉग में उज्ज्वल निकम का प्रोफेशनल अंदाज, कॉन्फिडेंस और शांत स्वभाव साफ दिखता है. हालांकि उनका एक्सेंट कभी-कभी थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन उनकी ओवरऑल परफॉर्मेंस फिल्म को एक मजबूत बेस देती है.
ललित प्रभाकर (अजमल कसाब के रोल में): फिल्म का सबसे बड़ा और डरावना सरप्राइज ललित प्रभाकर की परफॉर्मेंस है. कसाब के रोल में उनके चेहरे के एक्सप्रेशन, एंग्जायटी और हिंसक नेचर उस डरावने दौर की यादें ताजा कर देते हैं.
सपोर्टिंग कास्ट: सिकंदर खेर और जयदीप अहलावत अपने छोटे लेकिन दमदार रोल से कहानी में वजन डालते हैं. वामिका गब्बी और ऋत्विक साहोरे भी अपने कम स्क्रीन टाइम में अपनी मौजूदगी का एहसास कराते हैं.
डायरेक्शन
अविनाश अरुण का डायरेक्शन फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है. जिस सेंसिटिविटी के साथ वह CST स्टेशन हमले को दिखाते हैं, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है. एक छोटी लड़की की नजर से उस दुखद घटना को दिखाना, जिसने अपनी मां को खो दिया था, कहानी को एक गहरी इमोशनल गहराई देता है. अविनाश अरुण ने कोर्टरूम सीन और इंसानी भावनाओं के बीच एकदम सही बैलेंस बनाए रखा है. हालांकि कुछ कोर्टरूम बहसें थोड़ी लंबी खिंचती हैं और इंटरवल से पहले फिल्म की रफ्तार थोड़ी धीमी हो जाती है, फिर भी डायरेक्टर अपनी पकड़ बनाए रखने में कामयाब रहते हैं.
म्यूजिक
फिल्म का म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर इसके गंभीर और तनावपूर्ण टोन को पूरी तरह से कॉम्प्लिमेंट करते हैं. म्यूजिक कहानी को बेवजह नहीं खींचता, बल्कि कोर्टरूम बहसों और हमले के भयानक सीन के असर को बढ़ाता है. धीमा और गंभीर बैकग्राउंड म्यूजिक दर्शकों को उस समय पूरे देश के मानसिक तनाव का एहसास कराता है.
कमियां
लंबी और धीमी रफ्तार: कुछ कोर्टरूम सीक्वेंस और डायलॉग बेवजह लंबे हैं, जिससे फिल्म की रफ्तार पर असर पड़ता है.
कमजोर फैमिली ट्रैक: उज्ज्वल निकम और उनके बेटे के बीच का टेंशन वाला फैमिली ट्रैक मेन कोर्ट केस से थोड़ा ध्यान भटकाता है और स्क्रीनप्ले को कमजोर करता है.
इमोशनल भारीपन: फिल्म का सब्जेक्ट मैटर बहुत सीरियस और वजनदार है, जिसे हर देखने वाले के लिए एक बार में समझना आसान नहीं होगा.
अंतिम फैसला
‘प्रहार’ एक ऐसी फिल्म है, जो अपनी छोटी-मोटी कमियों के बावजूद दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ती है. राजकुमार राव की अच्छी परफॉर्मेंस, ललित प्रभाकर का जबरदस्त अडैप्टेशन और 26/11 की दुखद घटना को बहुत सेंसिटिव तरीके से दिखाना इसकी सबसे बड़ी खूबियां हैं. यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि किसी बड़े नेशनल क्राइम के बाद इंसाफ का रास्ता कितना लंबा, मुश्किल और सब्र का इम्तिहान लेने वाला हो सकता है. अगर आपको सीरियस, इंटेलेक्चुअल और असली घटनाओं पर आधारित कोर्टरूम ड्रामा पसंद हैं, तो ‘प्रहार’ आपकी वॉचलिस्ट में जरूर होनी चाहिए. मेरी ओर से फिल्म को 5 में 3.5 स्टार.

