मेरठ: नीले ड्रम हत्याकांड में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को फांसी की सजा हो गई है. सजा सुनाने वाले जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा अब चर्चाओं में हैं. सजा सुनाते के बाद उन्होंने पेन को डस्टबिन में फेंक दिया. उन्होंने महाभारत का भी जिक्र किया और कहा कि अपराध करने वालों को उनके अपराध की सजा देना भी धर्म है.
खास बात यह है कि अरविंद कुमार मिश्रा को मेरठ में तैनात हुए अभी करीब पांच महीने ही हुए हैं. इससे पहले वह मिर्जापुर में जिला जज की जिम्मेदारी संभाल रहे थे.
126 सुनवाई और 22 गवाहों के बाद आया फैसला
सौरभ राजपूत हत्याकांड में अदालत ने 30 सितंबर 2026 को मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को दोषी ठहराया था. इसके बाद 14 अक्टूबर को दोनों को फांसी की सजा सुनाई गई. करीब 13 महीने चले मुकदमे में 126 सुनवाई हुईं और अभियोजन पक्ष ने 22 गवाह पेश किए.
महाभारत और जंगल का दिया उदाहरण
सजा पर फैसला सुनाने से पहले जज अरविंद कुमार मिश्रा ने महाभारत का जिक्र करते हुए कहा कि अपराधी ने जैसा अपराध किया है, उसके अनुसार उसे दंड देना न्यायिक धर्म है. इसके बाद उन्होंने बाघ और जंगल का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर बाघ जंगल में है, तो जंगल सुरक्षित है और अगर जंगल बचा है, तो बाघ भी सुरक्षित है. कानून मनुष्य के लिए बनाया गया है मनुष्यों की सुरक्षा करता है उनके व्यवहार को नियंत्रित करता है, ये समाज मे संदेश जाना बहुत आवश्यक है. जज साहब की इस बात को न्याय और व्यवस्था के बीच संतुलन के संदेश के तौर पर देखा जा रहा है.
सौरभ की साल 2025 को हुई थी हत्या
यह मामला मार्च 2025 में सामने आया था. सौरभ राजपूत की हत्या के बाद उनके शव को नीले ड्रम में छिपाने की बात सामने आई थी. मामले की जांच और सुनवाई के दौरान जुटाए गए सबूतों के आधार पर अदालत ने दोनों को दोषी माना. हालांकि, फांसी की सजा पर अंतिम मुहर लगने के लिए हाई कोर्ट की पुष्टि जरूरी होती है. इसलिए निचली अदालत का फैसला सुनाए जाने के बाद भी कानूनी प्रक्रिया आगे जारी रहती है.
कौन हैं जज अरविंद कुमार मिश्रा?
अरविंद कुमार मिश्रा ने मिर्जापुर कोर्ट में 14 नवंबर 2024 से 19 मई 2026 तक काम किया. इसके बाद 21 मई 2026 को उन्होंने मेरठ में जिला जज की जिम्मेदारी संभाली. मेरठ में उनकी तैनाती को अभी करीब पांच महीने ही हुए हैं.
मऊ के रहने वाले हैं जज अरविंद
अरविंद कुमार मिश्रा का जन्म 2 जुलाई 1971 को हुआ था. उनका गृह जिला मऊ है. उनके पिता का नाम बीपी मिश्रा था. उन्होंने साल 1990 में बीए, 1994 में एलएलबी और 1996 में एलएलएम की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद 31 मई 2003 को उन्होंने न्यायिक सेवा में कदम रखा. करीब 23 साल के अपने न्यायिक करियर में उन्होंने अलग-अलग जगहों पर जिम्मेदारी निभाई है.
उत्तर प्रदेश सरकार में संभाल चुके कई जिम्मेदारियां
उनकी तैनाती सुल्तानपुर, अलीगढ़, गोरखपुर और कानपुर नगर में भी रही. इसके अलावा उन्होंने परिवार न्यायालय में प्रधान न्यायाधीश के तौर पर काम किया. वह उत्तर प्रदेश सरकार में विशेष सचिव और अतिरिक्त विधि परामर्शी की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं. बाद में उन्हें लखनऊ में राज्य परिवहन अपीलीय न्यायाधिकरण का अध्यक्ष बनाया गया.
काफी हंसमुख हैं जज अरविंद मिश्रा
मेरठ जिला अदालत में उन्हें मिलनसार और हंसमुख स्वभाव का जज बताया जाता है. मेरठ जिला कोर्ट के सरकारी वकील के.के. चौबे के मुताबिक, जज अरविंद कुमार मिश्रा कई गंभीर मामलों और विवादों में वकीलों के बीच पहुंचकर आपसी सुलह कराने के लिए भी जाने जाते रहे हैं. मेरठ बार एसोसिएशन से जुड़े मामलों में भी उनके इस व्यवहार की चर्चा होती रही है.
मेरठ कोर्ट में 23 साल बाद सुनाई गई फांसी की सजा
मेरठ में 23 साल बाद फांसी की सजा सुनाई गई है. मेरठ के कोर्ट ने अब तक तीन और दोषियों को फांसी की सजा सुनाई थी. नीला ड्रम हत्याकांड में साहिल और मुस्कान को सुनाई गई फांसी की सजा के बाद मेरठ में करीब 23 साल बाद मृत्युदंड का फैसला चर्चा में है. इससे पहले साल 2003 में मेरठ में एक डॉक्टर को फांसी की सजा सुनाई गई थी.
सजा सुनाने के बाद इसलिए चर्चा में हैं जज अरविंद
नीला ड्रम हत्याकांड का फैसला जहां अपराध की गंभीरता को लेकर चर्चा में है, वहीं जज अरविंद कुमार मिश्रा के फैसले सुनाने के अंदाज, महाभारत के संदर्भ और पेन डस्टबिन में डालने की घटना ने भी मेरठ कचहरी में लोगों का ध्यान खींचा है.

