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साल 1988 में एक फिल्म रिलीज हुई, जिसमें न कोई गाना था और न ही कोई बड़ा स्टार, मगर कहानी बड़ी दमदार थी. फिल्म दर्शकों को सच के इतना करीब ले जाती है, जहां सिनेमा और जिंदगी का फासला कम हो जाता है. मगर फिल्म में खरीदारों की कोई दिलचस्पी नहीं थी. हालांकि, जब फिल्म रिलीज हुई, तो इसे दुनिया भर में सराहा गया. यह ऑस्कर तक गई. हम मीरा नायर की फिल्म ‘सलाम बॉम्बे’ की बात कर रहे हैं, जो सड़क पर रहने वाले बच्चों की जिंदगी को बयां करती है.
नई दिल्ली: फिल्ममेकर मीरा नायर ने अपनी फिल्मों के जरिए उन लोगों की जिंदगी को पर्दे पर उतारा है, जिनकी कहानियां अक्सर बड़े पर्दे से दूर रह जाती हैं. उनकी पहली फीचर फिल्म ‘सलाम बॉम्बे!’ भी ऐसी ही एक फिल्म थी. फिल्म मुंबई की सड़कों पर रहने वाले बच्चों की जिंदगी पर बनी थी. इस फिल्म को तैयार करने के लिए मीरा ने उन बच्चों के बीच वक्त बिताया, जिनकी दुनिया को वह पर्दे पर दिखाना चाहती थीं. (फोटो साभार: IMDb)
15 अक्टूबर 1957 को ओडिशा के राउरकेला में जन्मीं मीरा नायर के लिए ‘सलाम बॉम्बे!’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी. यह उनकी डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकिंग से फीचर फिल्मों की ओर बढ़ने की शुरुआत भी थी. फिल्म की कहानी कृष्णा नाम के एक बच्चे के इर्द-गिर्द घूमती है, जो घर से निकाले जाने के बाद मुंबई की सड़कों पर जिंदगी गुजारने को मजबूर है.
(फोटो साभार: IMDb)
‘सलाम बॉम्बे!’ में मीरा ने दिखाया कि बच्चे को गरीबी, अपराध और शोषण से भरी दुनिया का सामना करना पड़ता है. मीरा चाहती थीं कि फिल्म में बच्चों की असल जिंदगी और उनके अनुभवों की झलक दिखाई दे. फिल्म की तैयारी के दौरान मीरा और उनकी टीम ने मुंबई की सड़कों पर रहने वाले बच्चों से संपर्क किया. (फोटो साभार: IMDb)
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मीरा ने साल 1988 में दिए एक इंटरव्यू में बताया था कि शुरुआत में करीब 130 बच्चे वर्कशॉप में शामिल हुए थे. इनमें से कुछ बच्चों को चुनकर आगे की ट्रेनिंग दी गई. करीब सात हफ्तों तक वर्कशॉप में बच्चों को सिर्फ एक्टिंग नहीं सिखाई गई, बल्कि उन्हें एक्सरसाइज, डांस और अपने अनुभवों को खुलकर जाहिर करने के मौके भी दिए गए. (फोटो साभार: IMDb)
मीरा नायर ने बच्चों के साथ समय बिताकर उनकी जिंदगी को समझने की कोशिश की. वह जानना चाहती थीं कि घर से भागने, नए शहर में आने, गैंग के बीच रहने और रोजमर्रा की मुश्किलों से जूझने जैसे अनुभवों ने उनकी सोच को किस तरह बदला था. इन बातचीत और एक्टिविटीज से कहानी को ज्यादा असरदार बनाने में मदद मिली. स्क्रिप्ट लिखने में मीरा का साथ उनके दोस्त सूनी तारापोरवाला ने भी दिया. बच्चों के साथ किए गए रिसर्च से मिले अनुभवों को कहानी और डायलॉग में जगह दी गई. (फोटो साभार: IMDb)
मीरा की एक खास कोशिश यह भी थी कि फिल्म में उन बच्चों को मौका दिया जाए, जो वास्तव में सड़कों पर रहते थे. उनका मानना था कि इन बच्चों के चेहरे और हावभाव में उनकी जिंदगी के अनुभव दिखाई देते हैं, जिन्हें सिर्फ एक्टिंग की ट्रेनिंग से पैदा करना मुश्किल है.
(फोटो साभार: IMDb)
फिल्म ‘सलाम बॉम्बे’ में शफीक सैयद ने कृष्णा का मुख्य किरदार निभाया. उनके साथ नाना पाटेकर, रघुबीर यादव और अनीता कंवर जैसे कलाकार भी नजर आए. सड़क पर रहने वाले बच्चों की जिंदगी पर बनी इस फिल्म में डिस्ट्रीब्यूटर्स भी कम दिलचस्पी दिखा रहे थे.
(फोटो साभार: IANS)
मीरा ने एक इंटरव्यू में बताया था कि कई लोगों को बिना बड़े सितारों और गानों वाली ऐसी फिल्म पर भरोसा नहीं था. लेकिन, फिल्म को ग्लोबल लेवल पर पहचान मिली. ‘सलाम बॉम्बे!’ ने 1988 में कान्स फिल्म फेस्टिवल में कैमरा डी’ओर अवॉर्ड जीता और इसे ऑस्कर में बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फिल्म की कैटेगरी में भी नॉमिनेशन मिला. (फोटो साभार: IMDb)

