UP 2027: का कहत बा यूपी? | Part 24
ओवैसी का ‘मास्टरस्ट्रोक’ या विपक्ष के लिए सबसे बड़ा खतरा?
ओवैसी की इस रणनीति को समझने के लिए मुस्लिम मतदाताओं की नई सोच को डिकोड करना जरूरी है. ओवैसी जिस ‘अपने नेता’ की बात कर रहे हैं, वह सीधे तौर पर सपा और कांग्रेस की दुखती रग है. जानें कैसे.
वोट बैंक बनाम हिस्सेदारी: ओवैसी का सीधा तर्क है कि आजादी के बाद से मुस्लिमों ने नेहरू-गांधी (कांग्रेस) और मुलायम-अखिलेश (सपा) को सिर्फ इसलिए एकतरफा वोट दिया ताकि भाजपा को सत्ता से दूर रखा जा सके. लेकिन इसके बदले में मुस्लिम समाज को न तो आनुपातिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिला और न ही उनके सामाजिक-आर्थिक हालात सुधरे.
नेतृत्व का शून्य: ओवैसी यह नैरेटिव सेट कर रहे हैं कि जब तक मुस्लिमों का अपना कोई मजबूत स्वतंत्र दल या नेता नहीं होगा, तब तक ये पारंपरिक पार्टियां उन्हें केवल ‘प्रतीकात्मक’ अहमियत देंगी.
अगर यह लाइन काम कर गई: यदि मुस्लिम मतदाता इस बात को मानकर सपा-कांग्रेस के पाले से छिटकते हैं, तो सपा का मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण और कांग्रेस का अल्पसंख्यक आधार पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगा, जिससे इन दोनों दलों की राजनीति पर अस्तित्व का संकट आ खड़ा होगा.
क्या वाकई खत्म हो जाएगी सपा-कांग्रेस की राजनीति?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओवैसी की यह लाइन जितनी आकर्षक दिखती है, जमीनी धरातल पर सपा और कांग्रेस को पूरी तरह खत्म कर पाना उतना आसान नहीं है. इसके पीछे तीन मुख्य कारण हैं.
मुस्लिमों का ‘रणनीतिक मतदान’ (Strategic Voting): यूपी का अल्पसंख्यक मतदाता बेहद व्यावहारिक राजनीति करता है. उसका प्राथमिक लक्ष्य उस उम्मीदवार या दल को चुनना होता है जो भाजपा को हराने का माद्दा रखता हो. 2024 के लोकसभा चुनाव ने यह साबित किया कि मुस्लिम मतदाताओं ने ओवैसी के बजाय सपा-कांग्रेस गठबंधन पर भरोसा जताया क्योंकि वे जमीन पर सबसे मजबूत लड़ाई लड़ रहे थे.
केवल एक जाति या समुदाय से सत्ता नहीं मिलती: उत्तर प्रदेश में सिर्फ मुस्लिम वोटों (20-22%) के दम पर कोई भी दल सरकार नहीं बना सकता. सपा के पास यादव और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का मजबूत आधार है, जबकि कांग्रेस के पास एक राष्ट्रीय स्वीकार्यता है. ओवैसी की पार्टी केवल मुस्लिम केंद्रित राजनीति करती है, जिससे बहुसंख्यक वोटों के ध्रुवीकरण का खतरा बढ़ जाता है.
क्षेत्रीय नेताओं का अपना प्रभाव: पश्चिमी यूपी में इकरा हसन और इमरान मसूद जैसे नेता हों या पूर्वांचल के बड़े मुस्लिम चेहरे, वे सीधे तौर पर अखिलेश यादव और राहुल गांधी के नेतृत्व से जुड़े हुए हैं. स्थानीय स्तर पर मुस्लिम समाज इन स्थापित चेहरों को छोड़कर अचानक किसी नए मोर्चे पर दांव लगाने से बचता है.
ओवैसी की लाइन से किसे होगा सीधा फायदा?
यदि ओवैसी मुस्लिम समाज के एक हिस्से (विशेषकर युवाओं) को यह समझाने में कामयाब हो जाते हैं कि उन्हें ‘अपना नेता’ चाहिए, तो इसका सीधा असर त्रिकोणीय मुकाबले के रूप में दिखेगा.
विपक्ष के वोटों में बिखराव: ओवैसी की पार्टी जितने ज्यादा मुस्लिम वोट हासिल करेगी, सपा-कांग्रेस गठबंधन का वोट शेयर उतना ही कम होगा.
भाजपा को रणनीतिक बढ़त: भारतीय राजनीति का यह पुराना नियम है कि जब भी भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव होता है, उसका सीधा फायदा सत्तारूढ़ दल (BJP) को मिलता है. यही कारण है कि सपा और कांग्रेस हमेशा ओवैसी पर ‘वोट कटवा’ या ‘भाजपा की बी-टीम’ होने का आरोप लगाते हैं.
छोटे दलों के साथ ‘तीसरा मोर्चा’: ओवैसी अकेले चुनाव लड़ने के बजाय यूपी के दलित और अत्यंत पिछड़े वर्ग के छोटे दलों के साथ मिलकर एक नया सामाजिक मोर्चा बनाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि वह खुद को किंगमेकर की भूमिका में ला सकें.
अगर मुस्लिम वोट सपा और कांग्रेस से हट जाए फिर सपा और कांग्रेस का यूपी में क्या होगा? आंकड़ाें के साथ समझें
यदि उत्तर प्रदेश का मुस्लिम वोट बैंक (जो राज्य की कुल आबादी का लगभग 19-20% है) पूरी तरह से समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस गठबंधन से हट जाता है तो चुनावी आंकड़ों के लिहाज से सपा और कांग्रेस के लिए राज्य की सत्ता में वापसी करना तो दूर विपक्ष में अपनी मजबूत स्थिति बचाना भी लगभग असंभव हो जाएगा. जानिए इसके पीछे की कहानी क्या है.
वोट शेयर का सीधा गणित (सपा सीधे 20% से नीचे आ जाएगी): 2022 विधानसभा चुनाव का डेटा के मुताबिक इस चुनाव में समाजवादी पार्टी को 32.13% वोट शेयर और 111 सीटें मिली थीं. राजनीतिक विश्लेषकों (जैसे CSDS-Lokniti) के अनुसार, इस 32% वोट शेयर में से लगभग 75 से 80 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं ने एकतरफा सपा को वोट दिया था.
2024 लोकसभा चुनाव का डेटा: लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस (INDIA गठबंधन) को 43% से अधिक वोट मिले, जिसमें 87% मुस्लिम वोट इस गठबंधन के खाते में गए थे.
नुकसान का आकलन: यदि कुल मतदान का लगभग 15 से 16% हिस्सा (जो मुस्लिम आबादी के एकतरफा वोट से आता है) सपा-कांग्रेस से पूरी तरह अलग हो जाता है. तो सपा का कोर वोट शेयर 32% से घटकर सीधे 15% से 17% के आसपास आ जाएगा. इस वोट शेयर पर उत्तर प्रदेश में 30 सीटें जीतना भी बड़ी चुनौती बन जाएगा.
सपा का ‘M-Y’ और ‘PDA’ फॉर्मूला पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगा
अखिलेश यादव जिस M-Y (मुस्लिम-यादव) या PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के दम पर राजनीति करते हैं, उसका सबसे बड़ा आधार अल्पसंख्यक ही हैं. उत्तर प्रदेश में यादवों की आबादी लगभग 9-10% है. यदि केवल यादव वोट बैंक सपा के साथ बचता है. तो सपा सिर्फ एक ‘क्षेत्रीय या जाति विशेष की पार्टी’ बनकर रह जाएगी. दलितों और गैर-यादव ओबीसी (OBC) वोटों को जोड़ने की उनकी ‘PDA’ रणनीति बिना अल्पसंख्यक वोटों के पूरी तरह फेल हो जाएगी.
कांग्रेस के वजूद पर संकट
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस लंबे समय से जमीन तलाश रही है (2022 में कांग्रेस को केवल 2 सीटें मिली थीं). 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को जो 9.53% वोट और 6 सीटें मिलीं, उसके पीछे सपा के साथ-साथ मुस्लिम मतदाताओं का एकतरफा समर्थन था. यदि यह वोट बैंक छिटका, तो कांग्रेस दोबारा 1 से 2% वोट शेयर वाले अपने सबसे बुरे दौर में पहुंच जाएगी.
165 से अधिक सीटों पर सपा-कांग्रेस रेस से बाहर हो जाएगी
उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से कितनी सीटों का होगा नुकसान.
- 110 से अधिक सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम मतदाता 30 से 39 प्रतिशत हैं.
- 44 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी 40 से 49 प्रतिशत है.
- 11 सीटें ऐसी हैं जहां यह आबादी 50 से 65 प्रतिशत (बहुसंख्यक) है. रोहिलखंड (रामपुर, मुरादाबाद, संभल, बिजनौर), पश्चिमी यूपी (सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ) और पूर्वांचल के कई जिलों की इन 165 सीटों पर सपा और कांग्रेस की जीत की पूरी उम्मीद सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम वोटों पर टिकी होती है. इस वोट के हटते ही इन सभी सीटों पर विपक्षी गठबंधन की जमानत बचाना भी मुश्किल हो जाएगा.
भाजपा (BJP) को मिलेगा ‘अजेय’ बहुमत
2022 में भाजपा ने 41.39% वोट शेयर के साथ 255 सीटें जीती थीं. यदि मुस्लिम वोट सपा-कांग्रेस से हटकर ओवैसी, बसपा (BSP) या किसी तीसरे मोर्चे में बंट जाता है, तो भाजपा विरोधी वोटों का ऐसा बिखराव होगा कि भाजपा बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के 300 से 350+ सीटें जीत सकती है.
कुल मिलाकर देखें तो हाल जमीन पर क्या होगा?
डेटा के आईने में देखें तो मुस्लिम वोट बैंक सपा और कांग्रेस के लिए केवल एक समर्थन नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक ‘लाइफलाइन’ है. इसके हटते ही उत्तर प्रदेश की राजनीति एकतरफा हो जाएगी और सपा-कांग्रेस वैसी ही स्थिति में पहुंच जाएगी जैसी स्थिति में आज बहुजन समाज पार्टी (BSP) पहुंच चुकी है (वोट शेयर तो होगा, लेकिन सीटें शून्य के बराबर होंगी). यही कारण है कि अखिलेश यादव और राहुल गांधी ओवैसी के हर छोटे से छोटे दांव को लेकर बेहद सतर्क रहते हैं.
